एसआईआर पर सियासी शोर, अदालत की नजर अब मूल रिकॉर्ड पर

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Delhi News : भारत में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता का सवाल हमेशा मतदाता सूची की शुद्धता से जुड़ा रहा है। इसी संदर्भ में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को देखा जाना चाहिए। लेकिन हाल के दिनों में एसआईआर को लेकर हुई बहस में कानूनी सवालों के साथ राजनीतिक आरोप और संस्थागत विवाद भी जुड़ गए हैं। नतीजा यह है कि कई अलगअलग मुद्दे एक ही बहस का हिस्सा दिखाई देने लगे हैं। ऐसे में जरूरी है कि राजनीतिक दावों और सार्वजनिक बहस से कुछ देर अलग हटकर उस न्यायिक रिकॉर्ड को देखा जाए, जिस पर आने वाले…

Delhi News : भारत में चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता का सवाल हमेशा मतदाता सूची की शुद्धता से जुड़ा रहा है। इसी संदर्भ में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को देखा जाना चाहिए। लेकिन हाल के दिनों में एसआईआर को लेकर हुई बहस में कानूनी सवालों के साथ राजनीतिक आरोप और संस्थागत विवाद भी जुड़ गए हैं। नतीजा यह है कि कई अलगअलग मुद्दे एक ही बहस का हिस्सा दिखाई देने लगे हैं।

ऐसे में जरूरी है कि राजनीतिक दावों और सार्वजनिक बहस से कुछ देर अलग हटकर उस न्यायिक रिकॉर्ड को देखा जाए, जिस पर आने वाले समय में इस पूरे विवाद की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी। सबसे पहले प्रपत्र संख्या 6 का सवाल आता है। यही वह प्रपत्र है जिसके जरिए मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन किया जाता है। एसआईआर के दौरान इसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र लगाए जाने को लेकर विवाद खड़ा हुआ। निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर की अपनी विज्ञप्ति में कहा कि इस घोषणा-पत्र को सर्वोच्च न्यायालय ने बरकरार रखा है। इसके बाद इस बात की व्याख्या शुरू हुई कि क्या अदालत ने प्रपत्र संख्या 6 के किसी बदले हुए स्वरूप को भी मंजूरी दे दी है।

यहीं से विवाद की पहली बड़ी गलतफहमी पैदा होती है।किसी वैधानिक प्रपत्र के साथ अतिरिक्त घोषणा-पत्र लगाना और स्वयं उस प्रपत्र में बदलाव करना दो अलग बातें हैं। प्रपत्र संख्या 6 मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए निर्धारित कानूनी प्रपत्र है। दूसरी ओर, किसी विशेष पुनरीक्षण अभियान की जरूरत के अनुसार उसके साथ अतिरिक्त जानकारी या घोषणा मांगना अलग प्रशासनिक कदम हो सकता है। इन दोनों को एक ही मान लेना कानूनी स्थिति को जरूरत से ज्यादा सरल बना देता है।

बिहार एसआईआर मामले में सर्वोच्च न्यायालय के सामने भी मूल प्रश्न यही था कि क्या निर्वाचन आयोग विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान अतिरिक्त दस्तावेज मांग सकता है। अदालत ने इस बात को स्वीकार किया कि सामान्य मतदाता सूची पुनरीक्षण और विशेष गहन पुनरीक्षण की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। बड़े पैमाने पर शहरीकरण, लगातार हो रहा पलायन और पिछले वर्षों में हुए जनसांख्यिकीय बदलाव मतदाता सूचियों की जांच को अधिक जटिल बनाते हैं।
इसी आधार पर अदालत ने माना कि विशेष पुनरीक्षण के लिए निर्वाचन आयोग अतिरिक्त दस्तावेज निर्धारित कर सकता है। लेकिन इसका मतलब आयोग को असीमित अधिकार मिल जाना नहीं है। ऐसी कोई भी व्यवस्था कानून और संविधान की निर्धारित सीमाओं के भीतर ही होनी चाहिए।

अदालत ने दस्तावेजी व्यवस्था की वैधता पर भी विचार किया। सवाल था कि क्या अतिरिक्त दस्तावेज मांगने की व्यवस्था मनमानी है। अदालत ने माना कि मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना निर्वाचन आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है और संबंधित दस्तावेजी व्यवस्था का मतदाता सूची की शुचिता से सीधा संबंध है। इसलिए इसे मनमाना नहीं माना गया। लेकिन यहीं एक दूसरी बात को अलग रखना जरूरी है। इस निष्कर्ष को यह कहकर नहीं पढ़ा जा सकता कि प्रपत्र संख्या 6 के हर संभावित बदले हुए स्वरूप को अदालत की मंजूरी हासिल है।

5 अक्टूबर की सुनवाई इसी अंतर को सामने लाती है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली को लेकर दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि एसआईआर से जुड़े कुछ फैसले अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। इसी संदर्भ में प्रपत्र संख्या 6 के किसी संभावित बदलाव का सवाल भी अदालत के सामने आया।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने संकेत दिया कि अदालत ने किसी बदले हुए प्रपत्र संख्या 6 को मंजूरी नहीं दी थी और वह मूल रिकॉर्ड देखकर यह समझना चाहती है कि वास्तव में क्या बदला गया और वह बदलाव किसके स्तर पर हुआ।
यही वह बिंदु है जहां पूरे विवाद को आरोप और निष्कर्ष के बीच के अंतर को समझते हुए देखना चाहिए।याचिकाकर्ताओं ने अपने आरोपों के समर्थन में एक प्रमुख समाचार पत्र की जांच रिपोर्ट का भी हवाला दिया।

अदालत ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया, लेकिन तत्काल मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने या उनके कामकाज पर रोक लगाने से इनकार किया। प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी का सार यही था कि समाचार रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन अदालत का फैसला केवल उस रिपोर्ट पर आधारित नहीं हो सकता। मूल रिकॉर्ड और निर्वाचन आयोग का पक्ष देखना जरूरी है। यह रुख आरोपों को खारिज करना नहीं है। लेकिन इसे आरोपों की पुष्टि भी नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह रास्ता खुला रखा है कि यदि रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि निर्णय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के विपरीत लिए गए थे, तो आगे आवश्यक कार्रवाई की जा सकती है।

निर्वाचन आयोग का अपना पक्ष भी स्पष्ट है। उसका कहना है कि बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में विचारों का अंतर होना अपने आप में असामान्य नहीं है। आयोग के अनुसार, एसआईआर से जुड़े अंतिम फैसले आवश्यक संस्थागत सहमति के बाद लिए गए। 26 सितंबर की विज्ञप्ति में आयोग ने बिहार एसआईआर आदेश और उसके बाद जारी कार्यक्रम को सर्वसम्मत मंजूरी मिलने की बात कही थी।

इस पूरे मामले में शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यही है किअसहमति और अंतिम फैसला एक ही चीज नहीं होते। आरोप और न्यायिक निष्कर्ष भी एक नहीं होते। उसी तरह अतिरिक्त घोषणा-पत्र और मूल प्रपत्र में बदलाव को भी समान नहीं माना जा सकता। यह फर्क केवल कानूनी तकनीकीता नहीं है। इसका सीधा संबंध चुनावी संस्थाओं पर जनता के भरोसे से है। निर्वाचन आयोग के फैसलों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूरी तरह जायज है। किसी भी संवैधानिक संस्था को जांच और सार्वजनिक सवालों से ऊपर नहीं माना जा सकता। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि किसी संस्था के खिलाफ गंभीर निष्कर्ष ठोस दस्तावेजों और प्रमाण के आधार पर निकाले जाएं।

एसआईआर का मूल उद्देश्य भी इसी भरोसे से जुड़ा है—ऐसी मतदाता सूची तैयार करना जिस पर चुनाव की पूरी प्रक्रिया टिकी हो। अगर मतदाता सूची में गलत, दोहराए गए या अयोग्य नाम हैं, तो उनकी पहचान जरूरी है। लेकिन यह काम किस तरीके से किया जाता है, उसकी पारदर्शिता और कानूनी वैधता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसलिए इस पूरे विवाद को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के चश्मे से देखना अधूरा होगा। असली सवाल यह नहीं है कि किस पक्ष का बयान ज्यादा जोरदार है। असली सवाल यह है कि अदालत के सामने रखे जाने वाले दस्तावेज क्या बताते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने अब उसी रिकॉर्ड की ओर ध्यान केंद्रित किया है। और शायद यही इस विवाद को समझने का सबसे सही रास्ता भी हैबयानों से आगे बढ़कर दस्तावेजों को देखा जाए, आरोपों से आगे बढ़कर प्रक्रिया को समझा जाए और निष्कर्ष रिकॉर्ड के आधार पर निकाला जाए।

Sumant Chaudhary