सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर प्रतिबंध को सख्ती से लागू करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि वायु प्रदूषण के स्तर को देखते हुए त्वरित उपाय किए जाने चाहिए और पटाखों की ऑनलाइन बिक्री पर भी प्रतिबंध रहेगा। उत्तर प्रदेश और राजस्थान को दो सप्ताह में अनुपालन हलफनामा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सभी एनसीआर राज्यों को पटाखों पर प्रतिबंध को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए मशीनरी तैयार करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि उल्लंघन करने वालों के खिलाफ निवारक और दंडात्मक कदम उठाए जाएं। जस्टिस अभय एस ओका और उज्जल भुइयां की पीठ ने एनसीआर राज्यों से कहा कि वे पटाखों पर प्रतिबंध के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रस्तावित मशीनरी के बारे में हलफनामा दाखिल करें। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि भारत संघ द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि हरित पटाखे जलाए जाते हैं, तो पारंपरिक पटाखों की तुलना में उत्सर्जन 30 प्रतिशत कम होता है।
पीठ ने कहा कि जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि “तथाकथित ग्रीन पटाखों” से होने वाला प्रदूषण न्यूनतम है, तब तक उन्हें छूट देने का कोई सवाल ही नहीं है। पीठ ने दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में ग्रीन पटाखों सहित पटाखों पर प्रतिबंध के अपने आदेश में ढील देने से इनकार कर दिया। पीठ ने टिप्पणी की, पटाखों से होने वाले ध्वनि प्रदूषण पर अभी तक किसी ने विचार नहीं किया है। पीठ ने कहा कि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए त्वरित उपाय किए जाने की आवश्यकता है। पीठ ने कहा कि पटाखों की ऑनलाइन बिक्री पर भी प्रतिबंध रहेगा। इस मामले में न्याय मित्र के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की सहायता कर रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने पीठ को बताया कि दिल्ली और हरियाणा ने पटाखों की ऑनलाइन बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के न्यायालय के आदेश को लागू कर दिया है, लेकिन उत्तर प्रदेश और राजस्थान ने अभी तक इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया है।
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सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश और राजस्थान को पटाखों की ऑनलाइन बिक्री पर प्रतिबंध लगाने और दो सप्ताह के भीतर अनुपालन हलफनामा प्रस्तुत करने का आदेश दिया। पीठ ने कहा, “वायु प्रदूषण का स्तर काफी लंबे समय तक चिंताजनक बना रहा। आम आदमी पर वायु प्रदूषण के प्रभाव की कल्पना की जा सकती है, क्योंकि हर कोई अपने घर या काम की जगह पर एयर प्यूरीफायर नहीं लगवा सकता। आबादी का एक वर्ग ऐसा है जो सड़कों पर काम करता है और वे इस प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। आखिरकार स्वास्थ्य का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का एक अनिवार्य हिस्सा है, इसलिए प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहने का अधिकार भी इसका एक हिस्सा है।” सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण से संबंधित एक मामले की सुनवाई कर रहा था।


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