Independence Day : स्वतंत्रता दिवस की सुरक्षा को लेकर दिल्ली पुलिस जहां चप्पे-चप्पे पर मुस्तैद है, वहीं ट्रैफिक पुलिसकर्मी सड़कों पर सिर्फ यातायात नियंत्रित करने और नियमों का पालन कराने तक सीमित नहीं हैं। जरूरत पड़ने पर यही वर्दी मददगार बनकर जिंदगी बचाने के लिए भी आगे आ रही है। सिविल लाइंस में गश्त के दौरान सड़क पर बेहोश और खून से लथपथ मिले एक व्यक्ति को ट्रैफिक इंस्पेक्टर ने बिना समय गंवाए अपनी सरकारी गाड़ी से ट्रॉमा सेंटर पहुंचाया। वहीं वेलकम इलाके में जिंदगी खत्म करने का मन बना चुके एक युवक से करीब दो घंटे बातचीत कर ट्रैफिक पुलिसकर्मी ने उसे वापस परिवार के पास पहुंचाया। दोनों घटनाओं में पुलिसकर्मियों की संवेदनशीलता ने ‘हर जिंदगी मायने रखती है’ का संदेश दिया।
बेहोश पड़े शख्स को देखकर तुरंत दौड़े इंस्पेक्टर
13 अगस्त की शाम करीब 5:30 बजे डीसीपी ट्रैफिक निशांत गुप्ता के मार्गदर्शन में सिविल लाइंस ट्रैफिक इंस्पेक्टर प्रवीण मान इलाके में गश्त कर रहे थे। इसी दौरान चंदी राम अखाड़े से मजनूं का टीला की तरफ जाने वाले कैरिजवे के यू-टर्न के पास उन्हें मोहम्मद जाहिद बेहोशी की हालत में पड़े दिखाई दिए। उनके सिर से खून निकल रहा था। आसपास लोगों की भीड़ जमा थी, लेकिन घायल की हालत देखकर इंस्पेक्टर ने किसी औपचारिकता का इंतजार नहीं किया। उन्होंने तुरंत घायल को अपनी सरकारी गाड़ी में बैठाया और ट्रॉमा सेंटर, सिविल लाइंस पहुंचाया। उपचार के दौरान डॉक्टरों ने उसके सिर में चोट की पुष्टि की। फिलहाल वह बयान देने की स्थिति में नहीं है, इसलिए हादसा किस वाहन या किन परिस्थितियों में हुआ, यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है। इंस्पेक्टर प्रवीण मान की इस त्वरित कार्रवाई का वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आया है। कुछ मिनटों की देरी भी घायल के लिए भारी पड़ सकती थी, लेकिन समय पर अस्पताल पहुंचाए जाने से उसकी जान बचाने में मदद मिली।
दो घंटे की बातचीत से युवक ने बदला जिंदगी का फैसला
दूसरी घटना 10 अगस्त की है। वेलकम मेट्रो स्टेशन के पास एक युवक के परेशान होकर आत्मघाती कदम उठाने की सूचना मिलने पर ट्रैफिक इंस्पेक्टर विकास चौधरी ने मामले को गंभीरता से लिया। उन्होंने युवक के परिवार से संपर्क किया और उसके बारे में जानकारी जुटाने के बाद उसे समझाने की कोशिश शुरू की। इंस्पेक्टर ने युवक से करीब एक से दो घंटे तक बातचीत की। उन्होंने उसकी परेशानी सुनी और उसे परिवार तथा बच्चों के बारे में सोचने के लिए समझाया। लगातार बातचीत के बाद युवक अपना फैसला बदलने के लिए तैयार हुआ। परिवार के सदस्य उसे सुरक्षित अपने साथ घर ले गए।
वर्दी का दूसरा चेहरा भी दिखाया
दोनों घटनाओं ने दिखाया कि ट्रैफिक पुलिस की जिम्मेदारी सिर्फ सड़क पर जाम खुलवाने या चालान करने तक सीमित नहीं है। कभी सड़क पर घायल पड़े व्यक्ति के लिए कुछ मिनट की तत्परता जिंदगी बचा सकती है तो कभी किसी परेशान इंसान को धैर्य से सुनना एक परिवार को बिखरने से रोक सकता है। स्वतंत्रता दिवस की भारी ड्यूटी के बीच इन पुलिसकर्मियों की पहल ने वर्दी के मानवीय और संवेदनशील चेहरे को सामने रखा है।



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