लोकसभा चुनाव 2024

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आप व कांग्रेस का मेल-मिलाप

आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस में दिल्ली में सीट बंटवारा होने से ऊपरी नजर में विपक्षी इंडिया गठबन्धन मजबूत हुआ है मगर पिछले 2019 के चुनावों में राजधानी में जिस तरह भाजपा को इकतरफा जीत हासिल हुई थी उसे देखते हुए यह कयास लगाना मुश्किल है कि 2024 में इन दोनों पार्टियों के साथ आने से क्या कोई कमाल हो सकता है? पिछले चुनावों में दिल्ली की सातों सीटों पर भाजपा के प्रत्याशियों को 50 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे लेकिन राजनीति हमेशा बदलती रहती है और इसमें ठहराव का स्थायी भाव नहीं होता। दिल्ली महानगर के नागरिक चरित्र को देखते हुए इसे ‘मिनी इंडिया’ भी कहा जाता है। जब जनसंघ ने 1967 में पहली बार दिल्ली की छह में से पांच सीटें जीती थीं और महानगर परिषद में श्री विजय कुमार मल्होत्रा के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था तो मिनी इंडिया शब्द बहुत प्रचलन में आया था। आज दिल्ली में जनसंघ या भाजपा की जगह आप पार्टी का बोलबाला है और यह भी एक राज्य की पार्टी नहीं है। पंजाब में इसकी दो-तिहाई बहुमत की ‘भगवन्त मान’ सरकार चल रही है।
मगर लोकसभा में दिल्ली से इसका कोई प्रतिनिधि​ नहीं है। ठीक एेसा ही कांग्रेस के साथ भी है बल्कि इसका दिल्ली विधानसभा में भी कोई प्रतिनिधि नहीं है मगर पंजाब में यह प्रमुख विपक्षी दल है। यह विरोधाभास हो सकता है कि पंजाब में आप व कांग्रेस एक-दूसरे के खिलाफ तलवारें खींचेंगी मगर दिल्ली में साथ मिल कर लड़ेंगी। इसकी प्रमुख वजह यह है कि पंजाब में भाजपा की कोई ताकत नहीं है। इसकी शक्ति अकाली दल के साथ मिलकर हुआ करती थी मगर अब यह गठबन्धन टूट चुका है। अतः पंजाब में यदि आप व कांग्रेस आपस में टकराती हैं तो जो भी विजयी होगा वह इंडिया गठबन्धन के खाते में ही जुड़ेगा। दिल्ली में भाजपा बहुत बड़ी ताकत है क्योंकि हम 2014 के चुनावों से ही देख रहे हैं कि कांग्रेस व आप दोनों में से किसी में इतनी ताकत नहीं है कि वे अपने बलबूते पर भाजपा को परास्त कर सकें अतः इस बार दोनों मिलकर भाजपा को पराजित करना चाहते हैं। लोकतन्त्र में यह पूरी तरह जायज बात है। एक जमाना वह भी था जब 1967 के बाद जनसंघ व कम्युनिस्ट तक एक साथ मिल कर कांग्रेस को हराने की आवाज लगाया करते थे।
2024 के आते-आते कांग्रेस की जगह भाजपा ने ले ली है और इसके नेता नरेन्द्र मोदी जनता में उसी तरह लोकप्रिय हैं जिस तरह कभी कांग्रेस की नेता श्रीमती इन्दिरा गांधी हुआ करती थी। परन्तु संसदीय लोकतन्त्र में विपक्षी पार्टियां कभी हार नहीं मानती हैं और सभी एेसे प्रयास करती हैं जिनसे सत्ता पक्ष को मात दी जा सके। यह स्वस्थ लोकतन्त्र की ही पहचान होती है क्योंकि इस प्रणाली में विपक्ष की मजबूती भी जरूरी होती है। अतः आप व कांग्रेस का दिल्ली में गठजोड़ व प्रेमालाप पूरी तरह तर्कसंगत ही नहीं बल्कि स्वाभाविक प्रक्रिया भी है। दिल्ली में आप चार सीटों पर व कांग्रेस तीन सीटों पर लड़ेगी। दोनों पार्टियों ने पिछले चुनावों में अपनी वोट ताकत को देखते हुए ये सीटें बांटी हैं। स्थानीय चुनावों में भाजपा 2014 के पहले से ही आप पार्टी से बुरी तरह हारती हुई आ रही है मगर लोकसभा चुनावों में यह बाजी उलट जाती है और मतदाता भाजपा को थोक के हिसाब से वोट डाल आते हैं। यह दिल्ली के मतदाताओं की अपनी बुद्धिमत्ता है कि वे अलग- अलग चुनावों में अलग-अलग तरीके से मतदान करते हैं। दिल्ली के बारे में यह किस्सा बहुत प्रसिद्ध है कि जब 1971 के चुनावों में दिल्ली के मतदाताओं ने महानगर परिषद (उस समय विधानसभा नहीं थी) व लोकसभा दोनों में कांग्रेस को इकतरफा जिता दिया था तो नगर निगम के चुनाव आये। इन चुनावों मे स्वयं भाजपा (जनसंघ) के सबसे बड़े नेता स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रचार किया और चांदनी चौक के टाऊन हाल में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘ए दिल्ली वालों आपने हमें लोकसभा के काबिल तो नहीं समझा मगर अब हमारे हाथ में झाड़ू तो रहने दो और निगम चुनावों में हमें मत दो जिससे हम दिल्ली की साफ-सफाई का काम अच्छी तरह कर सकें’’।
इन चुनावों में नगर निगम में जनसंघ का मामूली बहुमत आ गया। अतः दिल्ली के मतदाताओं को कोई भी राजनैतिक दल अपना मुरीद मानकर नहीं चल सकता है। ये मतदाता बहुत सुविज्ञ और जागरूक माने जाते हैं और हर चुनाव की महत्ता का आंकलन करना जानते हैं। आप पार्टी और कांग्रेस गठबन्धन और भाजपा के पक्ष-विपक्ष में भी ये बदलते व समय की चुनौती के सापेक्ष उभरते राष्ट्रीय राजनैतिक परिदृश्य के अनुरूप ही मतदान करेंगे। कम से कम इस बारे में किसी पार्टी को भ्रम नहीं पालना चाहिए। वैसे भी लोकतन्त्र की असली मालिक तो जनता ही होती है और सरकार केवल पांच साल के लिए इसकी नौकर होती है। कुछ लोग बेशक यह सोच सकते हैं कि आप का जन्म ही कांग्रेस की मुखालफत से हुआ था मगर राजनीति में मुखालफत कभी स्थायी नहीं होती। इंडिया गठबन्धन में जितनी भी पार्टियां हैं उन सभी की कांग्रेस से मुखालफत ही रही और उनका जन्म भी इसी वजह से हुआ केवल कम्युनिस्टों को छोड़ कर।

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