बस व ट्रक ड्राइवरों की हड़ताल

नये साल के शुरू होते ही देशभर के ट्रक व बस चालकों की हड़ताल से सामान्य नागरिक जीवन के स्थिर होने की आशंका बलवती हो गई है जिसके प्रभाव से न केवल नागरिकों का आवागमन प्रभावित हो रहा है बल्कि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति भी भविष्य में प्रभावित हो सकती है। इसके चलते आम आदमी का जीवन और कष्टमय ही होगा। भारत की आज की हकीकत यह है कि अब सड़क मार्ग से ही देश का 80 प्रतिशत माल ढुलान होता है जबकि पचास के दशक तक यह भार रेलवे उठाती थी। अतः इस ओर सरकार को जल्दी ही ध्यान देना होगा। कल्पना कीजिए महानगरों में दूध की सप्लाई देश के विभिन्न सुदूर इलाकों तक से टैंकरों की मार्फत होती है। ये टैंकर ग्रामीण व अर्ध शहरी इलाकों से दूध लेकर बड़े शहरों में लगे दुग्ध प्रसंस्करण प्रतिष्ठानों तक लेकर जाते हैं जहां से दूध प्रसंस्करित होकर शहरों के विभिन्न इलाकों मे वितरित होता है। इन्हें लाने-ले जाने का काम ट्रक या टैंकर ड्राइवर ही करते हैं। यदि वे ही हड़ताल पर चले जाएंगे तो महानगरों में दूध की किल्लत होना स्वाभाविक होगा। ऐसा ही अन्य उपभोक्ता सामग्री के बारे में भी है।
जहां तक बसों के ड्राइवरों का सवाल है तो ये भी समाज के गरीब व कमजोर तबकों से ही आते हैं और ड्राइवरी को अपनी रोजी-रोटी का साधन बनाते हैं। गरीब व सामान्य व्यक्ति ही रेल या बस से सफर करता है। इन बसों के रुक जाने से जहां रेलवे यातायात तन्त्र पर दबाव पड़ेगा और भीड़ बढे़गी वहीं सड़कों पर शान्ति होगी और सामान्य जन अपने गन्तव्य तक जाने में कामयाब नहीं होगा। महानगरों में सार्वजनिक यातायात बसों पर ही निर्भर करता है। इससे दिल्ली व मुम्बई जैसे शहरों में लोगों को अपने दफ्तर तक जाने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। इसके साथ ही देश के पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल व डीजल की सप्लाई में भी भारी अवरोध पैदा हो जायेगा। पेट्रोल पंपों पर देश के कुछ शहरों में भारी भीड़ हम अभी से देख रहे हैं। परिवहन और यातायात किसी भी देश की जीवन रेखा कहलाती है। यदि इसमें कोई बाधा पहुंचती है तो पूरा जीवन स्थिर और तंगहाल होकर रह जाता है। इसके अलावा हड़ताल से देश की अर्थव्यवस्था पर कितना बुरा असर पड़ सकता है इसका अकलन हम अभी नहीं कर सकते हैं क्योंकि औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कच्चे माल की आवक से लेकर तैयार माल की निकासी की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है और यह कार्य ट्रक या लारी अथवा टैंकर ड्राइवर ही करते हैं।
सवाल यह है कि बस व ट्रक ड्राइवर हड़ताल क्यों कर रहे हैं? वे हाल ही में लाये गये यातायात कानून के ‘हिट एंड रन कानून’ में किये गये संशोधन के खिलाफ आन्दोलनरत हैं। अभी तक इस कानून के तहत यदि कोई ड्राइवर सड़क दुर्घटना करके भाग जाता था तो उसे अधिकतम दो वर्ष की सजा होती थी तथा कुछ जुर्माना भी देना होता था। उस पर लापरवाही से गाड़ी चलाने का अपराध बनता था। एेसे मामले में नये कानून के अनुसार अपराध तो यही रहेगा मगर उसकी सजा बहुत बढ़ जायेगी और दस वर्ष तक की कैद व सात लाख रुपए का जुर्माना होगा। ट्रक ड्राइवरों का कहना है कि कोई जानबूझ कर दुर्घटना नहीं करता है। अपरिहार्य कारणों से यह दुर्घटना हो जाती है। वे दुर्घटना होने पर इसलिए बस या ट्रक छोड़कर भाग जाते हैं क्योंकि स्थानीय लोग दुर्घटना होने पर उनकी जान के दुश्मन बन जाते हैं। इसमें उनकी जान जाने का खतरा रहता है। यदि सजा को इतना सख्त बना दिया जायेगा तो भविष्य में कोई भी व्यक्ति ड्राइवर बनना पसन्द नहीं करेगा और देश में ड्राइवरों का अकाल तो पड़ेगा ही साथ ही इस विधा में जाने वाले लोगों के लिए रोजी का संकट भी पैदा हो जायेगा। इस तर्क में भावुकता का पक्ष ज्यादा है क्योंकि कानून अपराध रोकने के लिए ही बनता है। भारत में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या विश्व में यदि सर्वाधिक नहीं हैं तो बहुत ज्यादा तो है ही। इन्हें रोकने के लिए कुछ सख्त उपाय किये जाते हैं तो उन्हें एक सिरे से गलत भी नहीं कहा जा सकता मगर इनके लागू करने में वैज्ञानिकता का होना बहुत जरूरी होता है। बस या ट्रक ड्राइवरों का यह तर्क ध्यान देने लायक है कि दुर्घटना होने पर उन्हें स्थानीय लोगों से अपनी जान का खतरा हो जाता है। अतः दुर्घटना के बाद ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए भी कोई न कोई प्रतिरोधात्मक कानून लाना जरूरी है जिससे लोगों को ड्राइवरों के खिलाफ हिंसा के लिए उकसाने वालों को भी न्याय के दरवाजे तक ले जाया जा सके। जहां तक सजा व जुर्माने का सवाल है तो भारतीय दंड विधान में जुर्म करने वाले व्यक्ति की सामाजिक व आर्थिक क्षमता का भी संज्ञान लिया जाता है। फिर भी यह विषय फौजदारी कानूनों के विशेषज्ञों का है कि वे सड़क दुर्घटनाओं के सभी पहलुओं पर पैनी नजर मार कर सजा आदि का प्रावधान करें। मगर बहुत जरूरी यह है कि इस हड़ताल को जल्दी से जल्दी रोका जाए और इस प्रकार रोका जाए कि बस व ट्रक ड्राइवरों के लोकतान्त्रिक अधिकारों का हनन भी न हो और उनके दायित्व भी उनकी समझ में आएं।

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