अफवाहों का बाजार

देशभर में अक्सर अफवाहों का बाजार गर्म हो जाता है। अफवाहें कितनी खतरनाक साबित होती हैं इसका आभास भी हम सब लोगों को है। इसके बावजूद शिक्षित लोग भी अफवाहों के जाल में फंस जाते हैं। यह सोचने का विषय है कि आखिर ऐसा क्यों होता है। जब बार-बार कोई अफवाह हमें सुनाई देती है तो उस पर भरोसा बढ़ता जाता है। भले ही अफवाह झूठी ही साबित हो फिर भी उसका असर हमारे दिमाग में बना रहता है। अफवाहों के चलते देश में कई बार दंगे हो चुके हैं। कई बार निर्दोष लोगों की हत्याएं हो चुकी हैं। कई बार साधु-संतों को पीट-पीट कर मौत के घाट उतारा गया है। अफवाहों के चलते एक के बाद एक बाजार बंद हो जाते हैं और दहशत का माहौल कायम हो जाता है। कई बार बम की झूठी धमकियों से भी सार्वजनिक स्थलों, शिक्षण संस्थानों और हवाई अड्डों तक अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो जाता है। कर्नाटक में शुक्रवार की सुबह उस समय दहशत फैल गई जब एक के बाद एक 44 स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी दी गई। जिन स्कूलों को धमकी दी गई उनमें से एक कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के आवास के सामने है। देखते ही देखते पुलिस और बम निरोधी दस्ते सक्रिय हो गए। अभिभावक अपने बच्चों को स्कूलों से लाने के लिए दौड़ पड़े। दहशत के माहौल के बीच पूरे बैंगलुरु में तनाव फैल गया। बाद में कहा गया कि यह कॉल फर्जी है।
पिछले साल भी बैंगलुरु के कई निजी स्कूलों को इसी तरह से ईमेल पर धमकियां मिली थीं। इस बार मिली धमकी भी​ ईमेल के मूल आईपी एडरैस को छुपाकर लिखी गई थी। पिछले वर्ष पुलिस ने ऐसी धमकियां मिलने पर साइबर आतंकवाद के आरोप में मामला दर्ज किया था और जांच से पता चला था कि धमकियों के लिए इस्तेमाल की गई ईमेल आईडी के पीछे तमिलनाडु का एक नाबालिग था। अब नाबालिग के ​खिलाफ क्या कार्रवाई हो सकती है। इस तरह की घटनाएं दिल्ली में भी सामने आ चुकी हैं लेकिन धमकी भरे ईमेल भेजना, गलत सूचनाएं फैलाना, साम्प्रदायिक जहर फैलाना आम बात हो चुकी है और इसके लिए सोशल मीडिया सबसे बड़ा साधन बना है। अफवाहें कितनी ताकतवर हो सकती हैं इसका अंदाजा इन घटनाओं से लग सकता है कि 6 वर्ष पहले उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात में नमक खत्म होने की अफवाह फैली तो देखते ही देखते लोग नमक खरीदने के लिए घरों से निकल पड़े। बदहवासी में लोग मुंहमांगे दामों पर नमक खरीदने लगे। कभी किसी की हत्या की झूठी खबर फैलाकर साम्प्रदायिक जहर फैलाया गया तो कभी बच्चा चोरी की अफवाहों ने देशभर में अराजकता का माहौल पैदा कर दिया।
अफवाहें भारत में ही नहीं अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों में भी फैलती हैं। साल 2000 में अमेरिका में एक ऐेसी अफवाह फैली जिसमें कहा जा रहा था कि खास तरह का केला खाने से आप की चपड़ी फट जाएगी और आप मर जाएंगे। इसके बाद ईमेल की बाढ़ आ गई। लोग एक-दूसरे को ईमेल भेजकर आगाह करने लगे। बड़ी मुश्किल से हालात पर काबू पाया गया। भारत में भी कभी गणेश की मूर्ति के दूध पीने की और कभी किसी बीमारी के फैलने की अफवाहें फैलती हैं। कई बार आतंकी संगठन झूठी धमकियां देकर पुलिस का ध्यान बांट देते हैं और वह अपने निशाने पर बम धमाके करने में कामयाब हो जाते हैं।
शायद यह इंसान की जन्मजात कमजोरी है कि वह सच पर यकीन जरा देर से करता है। इसके उलट झूठ की उड़ान उसे तुरंत ही रोमांचित करने लगती है। हालांकि जब तक मामला किस्सागोई किस्म की गप्पबाजी तक रहता है तब तक ठीक रहता है। वक्त काटने का यह सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। आखिर सामाजिक जुड़ाव के ये तौर-तरीके ही तो हमारी सोसायटी को एक हद तक इंसानी बनाते हैं लेकिन बीते करीब एक-सवा दशक में सोशल मीडिया के आ जाने से यह कला तमाम विकृतियों का शिकार हो गई है। फेसबुक और ट्विटर जैसे जितने भी इंतजाम सामाजिक जुड़ाव के नाम पर किए गए, आखिर में जाकर वे झूठ को पंख देने के काम आते भी दिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर गलत जानकारियों, झूठ और अफवाहों को विस्तार देने का जो आरोप लगा वह फिजूल नहीं है, क्योंकि राजनीतिक फायदे उठाने से लेकर उत्पादों के नाम पर सिर्फ सपने बेचने का एक पूरा अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र इससे कायम हुआ है। अफवाह और झूठ के इस तंत्र को जांचने की एक अहम कोशिश दो साल पहले मेसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के डाटा विश्लेषकों ने की थी। वे भी इसी नतीजे पर पहुंचे कि अफवाहों, झूठी और फर्जी खबरों में जंगल की आग की तरह बेइंतहा तेजी से फैलने की भरपूर ताकत होती है। फेंक न्यूज के सिलसिले कहां, क्यों और कैसे बनने शुरू होते हैं और कहां जाकर खत्म होते हैं।
जब पूरे माहौल में जहर भरा हो तो झूठ का एक कतरा भी सोशल मंचों पर आग लगा देता है। अफवाहों का बाजार गर्म करने वालों पर शिकंजा कसा जाना चाहिए। कर्नाटक सरकार ने फैसला किया है कि अफवाहें फैलाने वालों पर यूएपीए के तहत कार्रवाई होगी। बेहतर यही होगा ​कि लोग अफवाहों पर तुरन्त विश्वास न करें और संयम से काम लेते हुए सच और झूठ का
पता लगाएं। बेहतर दुनिया बनाने के लिए झूठ का कारोबार करने वालों के नकाब उतारे जाएं।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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