पश्चिम बंगाल की सियासत में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों का नेरेटिव सैट हो चुका है और यह नेरेटिव है ध्रुवीकरण का। राज्य में एक तरह से धर्मयुद्ध छिड़ता दिखाई दे रहा है। धार्मिक प्रतीकों के जरिए राजनीतिक ध्रुवीकरण का नया दौर शुरू हो चुका है। मुर्शिदाबाद जिले में तृणमूल कांग्रेस के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने बेलडांगा क्षेत्र में बाबरी मस्जिद की तर्ज पर एक नई मस्जिद का िशलान्यास िकया जिससे सियासत में हलचल मच गई है। विधायक हुमायंू कबीर के इस कदम को मुस्लिम बहुल इलाकों में अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। कबीर ने तो ओवैसी की पार्टी के साथ मिलकर अगला चुनाव लड़ने की घोषणा भी कर दी है।
दूसरी ओर कोलकाता में आस्था का अलग ही सैलाब देखने को मिला। ब्रिगेड परेड ग्राउंड में जो हुआ उसे सामान्य नहीं कहा जा सकता। सनातन संस्कृति संसद के झंडे तले लगभग 5 लाख लोगों ने गीता का सामूहिक पाठ किया। मंच पर संतों की मौजूदगी थी। इस धार्मिक आयोजन में बंगाल भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी मौजूद रहा। इस कार्यक्रम में महामंडलेश्वर स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज, साध्वी ऋतंभरा, योग गुरु बाबा रामदेव, बागेश्वर धाम के धीरेन्द्र िकशन शास्त्री और अनेक संत-महात्मा शामिल हुए। तीखी बयानबाजी हुई। बयानों का संदेश स्पष्ट था, हम गजबा-ए-हिंद नहीं, भगवा हिंद चाहते हैं। यह राष्ट्र राम का है राम का ही रहेगा। गीता पाठ के आयोजन के बाद हुमायूं कबीर ने भी एक लाख मुसलमानों को लेकर कुरान का पाठ कराने की घोषणा कर दी। उनका तर्क है कि अगर राम मंदिर बन सकता है तो बाबरी की याद में मस्जिद क्यों नहीं बन सकती। यह सीधे-सीधे ध्रुवीकरण की कोशिश है। पश्चिम बंगाल में साम्प्रदायिक तनाव बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है।
गीता पाठ करने वालों का तर्क है कि भारत में हमें सनातनी चािहए, तनातनी नहीं। सनातनी एकता ही विश्व शांति का सबसे बड़ा साधन है। भारत में सभी धर्मों का सम्मान किया जाता है। कोई मंदिर बनाये या मस्जिद बनाए इस पर किसी को क्या आपत्ति है। आस्था पूरी तरह से व्यक्तिगत होती है लेकिन बाबर के नाम पर मस्जिद का निर्माण कर समाज में जहर घोलना ठीक नहीं। बाबर एक आक्रांता था। उसने सैन्य ताकत के बल पर भारत में मुगल साम्राज्य स्थापित किया था। मुगलों ने 300 से अधिक वर्षों तक भारत पर राज किया। बाबरी मस्जिद का विवाद भी उसी से जुड़ा हुआ था। बाबर ने भारत में बहुत लूट मचाई। मुगल शासन में सदियों तक भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य को प्रभावित किया। मैं उसके इतिहास में नहीं जाना चाहता लेकिन ऐसे मुगल शासक को स्वतंत्र भारत में महिमा मंडित करने का कोई औचित्य मुझे नजर नहीं आता। श्रीमद्भागवद गीता का भारत के बहुसंख्यक हिन्दुओं के लिए बहुत महत्व है। यह एक जीवन दर्शन है। मनुष्य काे जीवन की सही दिशा की अनुभूति गीता ही कराती है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र की रणभूमि में सही निर्णय लेने के िलए न सिर्फ गीता का उपदेश दिया था, बल्कि उन्हें साक्षात अपने विराट रूप के दर्शन भी कराये थे। द्वापर युग में दी गई भगवान श्रीकृष्ण की सीख आज भी इंसान को सुख-शांति और मुक्ति प्राप्त करने के लिए मार्गदर्शक का काम करती है। गीता के उपदेश को यदि कोई व्यक्ति अम्ल में लाएगा तो उसका जीवन ही बदल जाएगा। फल की चिंता किए बिना कर्म करने का संदेश गीता में ही दिया गया है। पश्चिम बंगाल मंे सत्ता का रास्ता मुस्लिम मतों से होकर गुजरता है इसलिए पश्चिम बंगाल में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण का युद्ध शुरू हो चुका है। भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने के लिए पूरी तरह से तैयारी शुरू कर दी है। चुनाव किस तरह लड़ा और जीता जाता है इस समय भाजपा से बेहतर कोई नहीं जानता। कभी पश्चिम बंगाल में भाजपा का कोई जनाधार नहीं था। पिछले एक दशक में िजस तरह से भाजपा ने वहां अपने पांव जमाये हैं उससे समझा जा सकता है। अगर हुमायंू कबीर और ओवैसी मुस्लिम मतों का विभाजन कराने में सफल हो जाते हैं ताे तृणमूल कांग्रेस को भारी नुक्सान हो सकता है। ममता के पारंपरिक मुस्लिम वोेट बैंक में सेंधमारी का खतरा पैदा हो चुका है। भाजपा हिन्दुत्व की पिच पर आक्रामक बैटिंग कर रही है। पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं को बाबरी के नाम पर मस्जिद निर्माण कराना भावनात्मक रूप से आहत कर रहा है।
अगर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बाबरी मस्जिद निर्माण का विरोध करती हैं तो उनका कोर वोट बैंक खिसक सकता है। अगर ममता खामोश रहती हैं तो भी इसे तुष्टिकरण ही माना जाएगा। जिन हवाओं में सोनार बांग्ला के वादे गूंजने चाहिए उन हवाओं में अब उन्मादी नारे गंूज रहे हैं। सारी सियासत हिन्दू- मुसलमान के बीच सिमट कर रह गई है। सत्ता का महल कौन बनाएगा। यह तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे लेिकन बहुसंख्यकों की भावनाओं को लामबंद करने का खेल शुरू हो चुका है। डर इस बात का है कि पश्चिम बंगाल की िसयासत कहीं खूनी न हो जाए। मुस्लिम समुदाय बहुसंख्यकों की भावनाओं को समझे और बाबरी की तर्ज पर मस्जिद निर्माण का ईरादा त्यागे तो ही साम्प्रदायिक सद्भाव का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। देखना होगा कि सियासत क्या करवट लेती है।


















