जनक्रांतियों के बाद सत्ता हासिल करने की प्रक्रिया को इतिहास में कई अलग-अलग तरीकों से अंजाम दिया गया है। जब कोई क्रांति सफल होती है तो उसके बाद सबसे बड़ी जिम्मेदारी पुरानी व्यवस्था के ढांचे को भंग कर नई व्यवस्था स्थापित कर स्थिर सरकार प्रदान करना होता है। क्रांति के बाद सत्ता हासिल करना बहुत असान होता है लेकिन सत्ता को चलाना आसान नहीं होता। अगर सत्ता को ठीक तरह से न संभाला जाए तो अक्सर शक्ति के लिए संघर्ष शुरू हो जाता है तब अराजकता की स्थिति पैदा होने की आशंका बन जाती है।
सत्ता और उसकी दिशा का निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि नई राजनीतिक व्यवस्था और नए शासकों का उदय कितना समझदारी से आगे बढ़ते हैं। शासन को चलाने के लिए बहुत परिपक्वता की जरूरत होती है। क्रांतियों के बाद सत्ता का हस्तांतरण एक जटिल और संवेदनशील प्रक्रिया है। इसलिए नए शासकों को फूंक-फूंक कर कदम रखना होता है। राजतंत्र और तानाशाही को उखाड़ फैंकने के लिए क्रांतियां होती रही हैं। देखना यह होता है कि क्या क्रांतियों के बाद वहां के लोगों को अपनी इच्छाओं के अनुरूप शासन मिल रहा है या नहीं।
किसी भी क्रांति के बाद नई सरकारों को पड़ोसी देशों और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से कूटनीतिक संबंधों को सुधारने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए आज के दौर में जब दुनियाभर में नए समीकरण बन रहे हैं तो संभल कर चलने की जरूरत होती है। पड़ोसी देश नेपाल में जेन जी की क्रांति के बालेन्द्र शाह (बालेन) प्रधानमंत्री बने लेकिन एक के बाद एक उनकी तरफ से दिए जा रहे बयानों पर विवाद खड़े हो रहे हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री ने संसद में पहली बार भारत-नेपाल सीमा विवाद पर एक हैरान कर देने वाला बयान दिया है। जिस पर काफी विवाद पैदा हो गया है। बालेन शाह ने कहा है कि सीमा पर अतिक्रमण केवल एक तरफ से नहीं बल्कि दोनों तरफ से हुआ है।
भारत ने नेपाल की जमीन पर कब्जा किया है तो नेपाल ने भी भारतीय जमीन पर कब्जा किया है। हालांकि बालेन शाह ने उन जगहों के स्टीक नाम या विवरण नहीं दिया लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इन मुद्दों को उलझाने की बजाय भारत-नेपाल मेज पर बैठकर वार्ता करेंगे और इसे सुलझा लेंगे। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री के इस अप्रत्याशित बयान के बाद नेपाल की संसद में भारी हंगामा शुरू हो गया है। मुख्य विपक्षी दल ‘नेपाली कांग्रेस’ ने पीएम बालेन शाह के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है, नेपाली कांग्रेस के मुख्य सचेतक ने इस बयान को बेहद संवेदनशील और आपत्तिजनक बताते हुए प्रधानमंत्री से तुरंत सबूत और स्पष्टीकरण की मांग की है।
विपक्ष का कहना है कि देश के प्रधानमंत्रियों को ऐसे नाजुक और कूटनीतिक मामलों पर बिना पुख्ता सबूतों के हल्के में बयान नहीं देना चाहिए। विपक्ष ने मांग की है कि यदि सरकार इसके सबूत पेश नहीं कर पाती तो इस बयान को संसद के रिकॉर्ड से तुरंत हटाया जाए। विवाद के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने सफाई भी दी कि सीमापार कब्जे से मतलब नो मैन्स लैंड के उन इलाकों से है जहां दोनों देशों के लोग रहकर खेती करते हैं। नेपाल और भारत के बीच कुछ समय में लिपुलेख और दूसरे इलाकों को लेकर तनाव देखा गया है। नेपाल के भारतीय इलाकों पर हक जताने के चलते दोनों देशों के बीच यह तनाव आया है।
लिपुलेख पर नेपाल ने दावा ठोक कर भारत को नाराज किया है क्योंकि यह दशकों से भारतीय इलाका है। बॉर्डर के अलावा व्यापार के मुद्दे के भी दोनों पड़ोसी देशों में तनातनी की स्थिति देखी गई है। बालेन शाह ने आम चुनाव में बड़ी जीत दर्ज करने के बाद इस साल 27 मार्च को नेपाल के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली थी। पीएम बनने के बाद से वह ना तो किसी विदेश यात्रा पर गए हैं और ना ही ज्यादा विदेशी मेहमानों से मिले हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री ने हास्यास्पद बात यह कही कि लिपुलेख, लिम्पिया धुरा और कालापानी मुद्दे पर भारत और चीन से ही नहीं बल्कि ब्रिटेन सरकार से भी बात की है। ब्रिटेन को भी इसमें मध्यस्थता करनी चाहिए क्योंकि यह विवाद उस समय से जुड़ा है जब अंग्रेज इस इलाके को छोड़कर गए थे।
भारत का विदेश मंत्रालय पहले ही कह चुका है कि नेपाल का दावा ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है और यह स्वीकार्य नहीं है। बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भारत और नेपाल के बीच पारंपरिक, कूटनीतिक और रणनीतिक संबंधों में काफी असहजता देखी जा रही है। बालेन शाह ने भारतीय विदेश सचिव को समय देने से इंकार किया। जिसके चलते भारत को यह दौरा टालना पड़ा। नेपाल में यह परम्परा रही है कि पद संभालने के बाद वहां के प्रधानमंत्री भारत का दौरा करते हैं लेकिन बालेन शाह ने यह घोषणा कर रखी है कि वह अपने कार्यकाल के पहले वर्ष में किसी भी देश का दौरा नहीं करेंगे।
बालेन शाह को सत्ता संभाले कुछ महीने ही हुए हैं कि शपथ लेने के दो महीने के भीतर उनके दो मंत्री इस्तीफा दे चुके हैं। इन दोनों मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। बालेन शाह ने 100 सूत्री सुुधार एजेंडा लांच किया था लेकिन इसमें से 88 वादे अधूरे पड़े हैं। उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए जो जेन जी युवाओं को रास नहीं आ रहे और युवा सवाला उठा रहे हैं कि अगर यही सब होना है तो नई राजनीति में क्या फर्क है। उनकी अपनी ही पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेताओं ने भी खुलेआम सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। बालेन शाह अध्यादेशों के जरिये ही सरकार चला रहे हैं क्योंकि ऊपरी सदन में उनका एक भी सदस्य नहीं है।
भारत ने हमेशा संकटकाल में नेपाल की मदद की है। भूकंप की त्रासदी हो या कोरोना महामारी, भारत ने बढ़-चढ़कर बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए नेपाल की हर संभव मदद की है। अच्छा होता बालेन शाह राजनीतिक परिपक्वता का परिचय देते और भारत से संबंधों को सुधारने और मजबूत बनाने की राह पर आगे बढ़ते लेकिन उन्होंने भी अति राष्ट्रवादी नीति अपनाकर संबंधों में जहर घोल दिया है।























