बंगाल की लड़ाई अब एक अजीब तमाशा बन गई है, जिसमें मछली ही चुनाव प्रचार का मुख्य मुद्दा बन गई है। टीएमसी मतदाताओं को डराने के लिए ऐसी मनगढ़ंत बातें फैला रही है कि भाजपा पश्चिम बंगाल को एक शाकाहारी राज्य बना देगी और बंगालियों को उनके मुख्य भोजन मछली और चावल से वंचित कर देगी। यह आरोप, भले ही कितना भी बेतुका क्यों न हो, भाजपा को चुभ गया लगता है। पार्टी के नेता अजीबो-गरीब हथकंडों और बयानों के ज़रिए यह साबित करने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं कि वे मांसाहारी हैं।
एक उम्मीदवार को तो गले में मछलियों की माला पहनकर चुनाव प्रचार करते देखा गया, ताकि वह मतदाताओं को भरोसा दिला सके कि उनका पसंदीदा मांसाहारी भोजन उनकी थाली से कभी दूर नहीं होगा।
कुछ अन्य नेता तो हाथों में मछली थामकर उसे हवा में लहरा रहे हैं, ताकि वे बंगाल के इस पसंदीदा भोजन के प्रति अपना प्रेम ज़ाहिर कर सकें। हाल ही में, केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने एक चौंकाने वाला दावा किया कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की ओर से जो भी अगला मुख्यमंत्री बनेगा, वह निश्चित रूप से मांसाहारी ही होगा। उन्होंने कहा कि राज्य में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व खुद मांसाहारी भोजन करता है, तो फिर भाजपा की सरकार मछली और अन्य मांसाहारी चीज़ों पर प्रतिबंध कैसे लगा सकती है?
भाजपा के लिए दुर्भाग्य की बात यह है कि अन्य राज्यों से आ रही कुछ ख़बरों ने टीएमसी की उस अफ़वाह को और भी हवा दे दी है, जिसमें यह कहा जा रहा था कि भाजपा ज़बरदस्ती लोगों को शाकाहारी बनाने की कोशिश कर रही है।
इस सिलसिले में ताज़ा बयान पड़ोसी राज्य बिहार से आया, जहां भाजपा के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने यह घोषणा की कि राज्य सरकार शिक्षण संस्थानों, धार्मिक स्थलों और भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों के आस-पास मांस और मछली की बिक्री पर प्रतिबंध लगा देगी। उनका तर्क था कि ऐसा करने से सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा मिलेगा, साफ़-सफ़ाई बनी रहेगी और बच्चों में हिंसक प्रवृत्तियों पर अंकुश लगेगा। जब पार्टी में इस तरह के बेतुके बयान देने वाले लोग मौजूद हों, तो क्या इसमें कोई हैरानी की बात है कि टीएसमी ने मछली को ही अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बना लिया है, ताकि वह मतदाताओं को भाजपा से दूर भगा सके?
भाजपा के लिये परेशानी बन रहे निशिकांत दुबे ?
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे शायद पार्टी के लिए एक बोझ साबित हो सकते हैं। पिछले कुछ हफ्ते में दो बार, उन्होंने अपनी बिना सोचे-समझे दी गई टिप्पणियों और ‘एक्स’ पर की गई पोस्ट के ज़रिए अपनी ही पार्टी को शर्मिंदा किया है। उनकी पहली बड़ी चूक यह थी कि उन्होंने उन प्रवासी भारतीयों का मज़ाक उड़ाया, जो अब यूएई में जाकर बस गए हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि उन्हें भारत लौट आना चाहिए, जहां वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा-छतरी के नीचे पूरी तरह सुरक्षित रहेंगे। लेकिन, वह एक बात नज़रअंदाज़ कर गए। वह यह कि प्रधानमंत्री मोदी खुद यूएई के शासक शेख़ों के साथ बेहद मधुर संबंध बनाए हुए हैं और उन्हें अपने करीबी दोस्तों में शुमार करते हैं। यूएई से जुड़ा उनका हर ट्वीट “मेरे भाई” शब्दों से ही शुरू होता है। ज़ाहिर है, यूएई के अधिकारी चल रहे युद्ध के बीच इस तरह की टिप्पणियों से नाराज़ थे, खासकर इसलिए क्योंकि वे आगंतुकों और अन्य लोगों को होने वाली किसी भी परेशानी की भरपाई के लिए अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे थे। आखिरकार, दुबे को कड़ी फटकार मिली, जब भाजपा के विदेश मामलों के सेल के प्रमुख विजय चौथाईवाला ने एक्स पर एक ट्वीट पोस्ट करके ज़ुबान के पक्के लोगों को याद दिलाया कि इस समय यूएई की आलोचना न करें, जब वे युद्ध में उलझे हुए हैं। दुबे ने इससे साफ़ तौर पर कुछ नहीं सीखा। उनकी अगली बड़ी गलती ओडिशा के नायक, दिवंगत मुख्यमंत्री बीजू पटनायक पर आरोप लगाना था। उन्होंने दावा किया कि 1962 में चीन के साथ युद्ध के दौरान बीजू पटनायक सीआईए और नेहरू की सरकार के बीच एक कड़ी के तौर पर काम कर रहे थे। ओडिशा में भारी हंगामा मच गया, न केवल बीजद नेताओं की तरफ से, बल्कि भाजपा नेताओं की तरफ से भी, जो इस बात से पूरी तरह वाकिफ़ हैं कि ओडिशा की सामूहिक यादों में बीजू पटनायक का कितना अहम स्थान है। दुबे की टिप्पणियां और भी ज्यादा शर्मनाक थीं क्योंकि भाजपा ने 2024 में राज्य में अपनी पहली सरकार बनाई थी और वह अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए बेताब है। हालांकि, भाजपा सांसद अपनी बात पर और भी ज़्यादा अड़ गये और कहा कि वह नेहरू-गांधी परिवार का पर्दाफाश करने की कोशिश कर रहा था। बीजू पटनायक को विवाद में घसीटकर और ओडिशा में अपनी ही पार्टी की सरकार को शर्मिंदा करने के तथ्य का उन्हें ध्यान ही नहीं रहा। भाजपा के लिए दुबे विपक्षी नेताओं पर ऐसे हमले कर रहे जिनकी जवाबदेही से बचा जा सके। यही वजह है कि वह कुछ बेहद ही आपत्तिजनक टिप्पणियां करके भी बच निकलते रहे हैं। लेकिन अब ऐसा लगता है कि अपने जोश में वह एक ‘रेड लाइन’ (सीमा) पार कर रहे हैं।
गंभीर वित्तीय और कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा एएसआई
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), जो देश में ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण और जीर्णोद्धार के लिए ज़िम्मेदार है, गंभीर वित्तीय और कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है। इसके 38 मंडलों में एक-तिहाई से ज़्यादा पद खाली पड़े हैं, जिससे यह संगठन लगभग काम करना बंद कर चुका है। इससे भी बुरी बात यह है कि किसी अजीब वजह से, एएसआई एक प्रिंटर भी नहीं खरीद पाया है। नतीजतन, लंबे समय से लंबित खुदाई की अहम रिपोर्टें कहीं इसके अभिलेखागार में बिना प्रकाशित हुए पड़ी हैं। यह उस संस्था की बेहद दयनीय स्थिति है जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए भारत के इतिहास को संरक्षित करने का काम सौंपा गया है। दुख की बात है कि किसी को इसकी परवाह नहीं लगती, क्योंकि न तो कर्मचारियों की कमी को दूर करने की कोई कोशिश की जा रही है और न ही प्रिंटर की समस्या को सुलझाने का कोई प्रयास हो रहा है।



















