जब भाजपा को नकवी याद आए?

Summary :

‘तुम्हारी बेरुखी की जीनत को भी देखो हमने किस कदर संभाल रखा है आज सांस जा भी रही है तो हर उच्छवास पर बस तेरा ही नाम लिखा है’ सियासत भी विभिन्न संयोगों का अनोखा मिलन है, किसका रूठा वक्त कब वाचाल होकर गूंज की शक्ल अख्तियार कर ले कहना मुश्किल है। भाजपा के एक बड़े शिया नेता मुख्तार अब्बास नकवी को उनकी ही पार्टी ने एक लंबे वक्त से ठंडे बस्ते में डाल रखा था। पर जब इस दफे पश्चिम एशिया का संकट गहराया और ईरान संग भारत के रिश्ते कुछ अजीब से पेचोंखम में उलझ गए, तो इस…

‘तुम्हारी बेरुखी की जीनत को भी देखो हमने किस कदर संभाल रखा है
आज सांस जा भी रही है तो हर उच्छवास पर बस तेरा ही नाम लिखा है’
सियासत भी विभिन्न संयोगों का अनोखा मिलन है, किसका रूठा वक्त कब वाचाल होकर गूंज की शक्ल अख्तियार कर ले कहना मुश्किल है। भाजपा के एक बड़े शिया नेता मुख्तार अब्बास नकवी को उनकी ही पार्टी ने एक लंबे वक्त से ठंडे बस्ते में डाल रखा था। पर जब इस दफे पश्चिम एशिया का संकट गहराया और ईरान संग भारत के रिश्ते कुछ अजीब से पेचोंखम में उलझ गए, तो इस गांठ-गिरह को सुलझाने की जिम्मेदारी यकबयक सियासी तौर पर बिसरा दिए गए नकवी के कंधों पर आन पड़ी। भारत में ईरान के राजदूत डॉ. मोहम्मद फतहाली से नकवी का पुराना राब्ता है, सो रोज़ा-इफ्तार की दावत के बहाने जब नकवी फतहाली से मिलने पहुंचे तो इन दोनों के बीच एक बंद कमरे में आधे घंटे की सारगर्भित बातचीत हुई। नकवी डॉ. फतहाली को यह समझाने में कामयाब रहे कि ’भारत-ईरान के हजारों साल के सांस्कृतिक रिश्ते चंद मौजूदा वाकयों से तार-तार नहीं हो सकते।’ फिर नकवी ने कई पुराने घटनाक्रमों का हवाला देते हुए भारत-ईरान के मजबूत रिश्तों की बुनियाद की ओर इशारा किया और कहा ’जब कोरोना अपने उफान पर था तो भारत ने हजारों बांग्लादेशी, पाकिस्तानी, श्रीलंकाई नागरिकों की भी ईरान से बाहर निकलने में मदद की थी। भारत ने आधे दर्जन से भी ज्यादा अपने विमान तेहरान भेजे थे और लोगों की नागरिकता से दीगर उन्हें भारत लेकर आए थे, जहां जोधपुर के अपने डिफेंस कैंप में एक महीने के लिए इन्हें कोरोंटाइन रखा गया था, इसके बाद उन नागरिकों को उनके संबंधित देशों को भेज दिया गया, क्योंकि उस वक्त ईरान गैर मुल्क के ऐसे नागरिकों को अपने देश के होटलों में रहने की भी इजाज़त नहीं दे रहा था। नकवी की यह मुलाकात काम आई, भारत-ईरान के तल्ख रिश्तों पर जमी बर्फ किंचित पिघली और इसके बाद ईरान के भारत स्थित राजदूत का बयान आ गया जिसमें उन्होंने पश्चिम एशिया तनाव के बीच भारत को एक भरोसेमंद देश बताते हुए कूटनीतिक मध्यस्थता में भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
इसके बाद पीएम मोदी की बातचीत भी ईरान के प्रेसिडेंट संग हो गई। फिर हमारे विदेश मंत्री एस जयशंकर भी डॉ. फतहाली से मिलने पहुंचे। इन घटनाक्रमों की परिणति थी कि ईरान ने होर्मुज पार करने के लिए भारतीय जहाजों को इजाज़त दे दी। फिलहाल यह इजाज़त चार भारतीय जहाजों को मिली है, आने वाले एक दो रोज में ईरान सभी भारतीय जहाजों को हरी झंडी देने पर विचार कर रहा है। ईरान ने भारतीय बच्चों के गुल्लक दान को भी प्यार भरा एक तोहफा बताया है। सच में नकवी का यह मुख्तार उपक्रम अपने मुल्क के काफी काम आया।
अपने पुत्र निशांत को एक नई पारी के लिए तैयार कर रहे हैं नीतीश
शह-मात की सियासी बिसात पर राजनीति के पगे व धुरंधर खिलाड़ी नीतीश कुमार को धूल चटाना इतना आसान नहीं, इस बात को अब भगवा रणनीतिकार गण भी समझ गए होंगे। भाजपा नीतीश को नाथ कर राज्यसभा के द्वार तक तो ले आई, पर ये अब भी ऊपरी सदन में शपथ लेने में आनाकानी कर रहे हैं। इन्होंने अभी अपनी विधान परिषद की सदस्यता से भी इस्तीफा नहीं दिया है, जबकि वे 16 मार्च को राज्यसभा के लिए चुन लिए गए थे, उन्हें इन हालातों में अपनी विधान परिषद की सीट छोड़ने के लिए 14 दिनों की मियाद मिली थी, यह अवधि भी इसी 30 मार्च को पूरी हो रही है। अब सवाल उठता है कि आखिरकार नीतीश कब दिल्ली का रुख करेंगे? और अपने सीएम पद से इस्तीफा देंगे? तो इस सवाल का जवाब फिलवक्त किसी के पास नहीं। नीतीश से जुड़े विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि ’वे अपने पुत्र निशांत को अपने असली उत्तराधिकारी के तौर पर तैयार करने में जुटे हैं, इस कार्य में उन्होंने अपने संघर्ष के दिनों के 20 पुराने समाजवादी साथियों को लगा रखा है, जिनका कार्य निशांत को एक नई भूमिका के लिए तैयार करना है।’ सूत्र यह भी खुलासा करते हैं कि एक नए निशांत के अभ्युदय के लिए देश की एक नामचीन पीआर एजेंसी की भी सेवाएं ली गई हैं, जिन्हें एक भारी भरकम रकम अदा की गई है, निशांत को उनके पिता की पुरानी वीडियो दिखाई जा रही हैं कि वे लोगों से कैसे मिलते हैं, जनसभाओं को कैसे संबोधित करते हैं, विधानसभा या लोकसभा में वे कैसे बोलते या रिएक्ट करते हैं। निशांत से अपने पिता की उन भंगिमाओं को लपक लेने को कहा जा रहा है, जिससे कि जब वे जनता के बीच जाएं तो लोगों को उनमें युवा नीतीश की झलक दिखाई पड़े। जब तक अपनी नई पारी खेलने के लिए निशांत तैयार नहीं हो जाते तब तक नीतीश भाजपा के दिल्ली बुलावे के आमंत्रण को यूं ही टरकाते रहेंगे।
असम में भगवा सितम
असम में सरपट भागती भाजपा की चुनावी रेल यकबयक पटरी से उतरती नज़र आ रही है। इसका एक प्रमुख कारण प्रदेश के पूर्व भगवा मुख्यमंत्री और मौजूदा केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनोवाल को बताया जा रहा है। सर्वानंद असम की ‘सोनोवाल कचरी जनजाति’ से ताल्लुक रखते हैं, राज्य में इनकी आबादी 6.5 फीसदी के आसपास है। यह मैदानी इलाकों में रहने वाली जनजाति है जो अचानक से हिमंता बिस्वा सरमा के विरोध में उतर आई है। यह सब सोनोवाल के उस बयान के बाद हुआ जिसमें उन्होंने अपने ही मुख्यमंत्री पर आरोप लगाया है कि ’उन्होंने टिकट बंटवारे में सोनोवाल के लोगों की उपेक्षा की है।’ असम में इस बार सरमा अपने चेहरे और अपने करिश्मा के आधार पर चुनाव लड़ रहे हैं, तो उनका एंटी इंकमबेंसी फैक्टर भी उनके साथ-साथ चल रहा है। ममता ने भी अपनी पार्टी नेत्री सुष्मिता देव की अगुवाई में टीएमसी के 50 उम्मीदवार मैदान में उतार दिए हैं, मेघालय के सीएम कॉनरेड संगमा की भी पार्टी के 20 लोग मैदान में हैं। पहली नज़र में तो लग रहा था कि ये दोनों ही पार्टियां अपरोक्ष तौर पर भाजपा को ही मदद पहुंचा रहीं हैं, पर अब जो जमीनी सर्वे आ रहा है उससे पता चलता है कि कई स्थानों पर इन पार्टियों के उम्मीदवार भाजपा के ही वोट काट रहे हैं, खास कर बोडोलैंड एरिया में। इस चुनाव में हिमंता ने कांग्रेस के कोई 30 लोगों को भाजपा के टिकट पर मैदान में उतारा है, इससे भी भगवा पेशानियों पर बल पड़ रहे हैं, न सिर्फ भाजपा के कार्यकर्ताओं में बल्कि संघ के अनुशासित कैडर में भी इन पूर्व कांग्रेसी उम्मीदवारों को लेकर खासा रोश है।
किसका हित साध रहे रोहित
रोहित पवार जो शरद पवार के भतीजे और उनकी ही पार्टी से महाराष्ट्र के विधायक हैं, वे लगातार अपने चाचा अजित पवार के विमान दुर्घटना को एक साजिश करार देने पर तुले हैं। वे काफी पहले ही इस बात की मशक्कत कर रहे थे कि ’इस मामले में एफआईआर दर्ज हो और दोशी व्यक्तियों पर कानूनी कार्यवाही हो।’ अपनी इस मांग को लेकर वे पहले ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस और राज्य सरकार में उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से मिल चुके थे। पर उनके तमाम प्रयासों के बाद भी राज्य पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज नहीं किया। वे चाहते तो एफआईआर दर्ज करवाने के लिए राज्य में कोर्ट का रुख कर सकते थे, पर उन्होंने देश भर में एक सियासी संदेश देने के लिए दूसरा रास्ता चुना और वे सीधे दिल्ली राहुल गांधी के पास पहुंच गए, जहां राहुल के प्रयासों से कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक में ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज हो पाई। दरअसल, अजित पवार के नहीं रहने पर उनकी पार्टी पर नियंत्रण के लिए देवेंद्र फड़णवीस और शरद पवार में अघोषित जंग छिड़ी है। अभी तक पार्टी फड़णवीस के कब्जे में नज़र आ रही है, जहां वे अजित की पत्नी सुनेत्रा पवार के माध्यम से उनकी पार्टी में मनचाहे फैसले करवा पा रहे हैं। वहीं दिवंगत अजित दादा की पार्टी के तीन प्रमुख नेता भी पार्टी से अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देना चाहते। ये नेता हैं प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल और सुनील तटकरे। तटकरे की पुत्री अदिति तटकरे फड़णवीस सरकार में मंत्री भी हैं। इन तीनों नेताओं को ’आइडिया बॉक्स’ के नरेश अरोड़ा का पूरा समर्थन हासिल है, सनद रहे एनसीपी अजित के चुनावी प्रबंधन का सारा जिम्मा ’आइडिया बॉक्स’ के पास ही है।
…और अंत में
ईडी डायरेक्टर राहुल नवीन का कार्यकाल भी आने वाले कुछ महीनों में समाप्त होने वाला है। सूत्र बताते हैं कि उन्हें सीबीडीटी चेयरमैन रवि अग्रवाल की जगह लाया जा सकता है। 1988 बैच के आईआरएस अधिकारी रवि अग्रवाल का कार्यकाल जून 2026 में पूरा हो रहा है। इसी के आसपास ईडी डायरेक्टर का भी कार्यकाल पूर्ण हो रहा है, सो उन्हें यह नई महती जिम्मेदारी मिल सकती है।

त्रिदीब रमण