आज के समय में संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि यह समाज की सोच और दिशा को भी प्रभावित करता है। संगीत का सीधा प्रभाव युवाओं पर पड़ता है। जब गानों में ऐसे शब्द होते हैं जो रिश्तों, सम्मान और संस्कारों के िखलाफ जाते हैं तो यह धीरे-धीरे समाज की सोच को भी बदल देते हैं। आज के युवा इन्हें सुनकर उसी दिशा में सोचने लगते हैं, जो चिंता का विषय है। कलाकार समाज का आइना होते हैं। उनकी जिम्मेदारी है कि वे ऐसे गाने बनाएं जो प्रेरणा दें, न कि भ्रम या गलत संदेश फैलाएं। केवल प्रसिद्धि या पैसे के िलए किसी भी प्रकार के शब्दों का इस्तेमाल करना उचित नहीं है। हमें यह भी समझना होगा कि हर लोकप्रिय चीज सही नहीं होती। ऐसे गानों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए, जो हमारी संस्कृति और नैतिकता को नुक्सान पहुंचाते हैं। संगीत का उद्देश्य हमेशा सकारात्मकता प्रेम और संस्कारों को बढ़ावा देना होना चाहिए।
आज का संगीत सन् 1980 से पहले के मिठास भरे और नैतिकता से लबरेज संगीत से बहुत अलग है। पहले लोग संगीतकारों और गायकों को याद करते थे और आज टेक्नोलॉजी के चलते सी. रामचन्द्र, शैलेन्द्र, एसडी बर्मन, आरडी बर्मन, कल्याण जी-आनंद जी, लक्ष्मीकांत-प्यारे लाल तथा स्वर कोकिला लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मन्ना डे, मोहम्मद रफी तथा मुकेश जैसे संगीतकार और गायक भी नहीं रहे। आजकल संगीत नीरस हो चुका है तो इसकी वजह गायकों का जरूरत से ज्यादा लोकप्रियता पाने के लिए अश्लील गाने प्रस्तुत करने की होड़ है। कदम-कदम पर विवादों के बीच कोर्टों की शरण ली जा रही है।
पिछले दिनों बॉलीवुड और भारतीय संगीत उद्योग में दो प्रमुख विवादों ने जोर पकड़ लिया है, जिनमें नोरा फतेही और बादशाह मुख्य केंद्र में हैं। ये विवाद अश्लीलता, महिलाओं के चित्रण और मनोरंजन उद्योग में नैतिकता की सीमाओं को लेकर एक नई बहस छेड़ रहे हैं। नोरा फतेही का गाना ‘सरके चुनर तेरी सरके’ और बादशाह का हरियाणवी गाना ‘टटीरी’ दोनों ही अश्लीलता से भरे पड़े हैं। गंदे दृश्यों के कारण कानूनी ये गीतकार व कलाकार सामाजिक निशाने पर आ गए हैं। आखिर हम कहां जा रहे हैं? समाज को यह क्या हो गया है?
नोरा फतेही का गाना ‘सरके चुनर’, जो कन्नड़ फिल्म ‘डेविल’ का हिंदी संस्करण है, रिलीज के तुरंत बाद विवादों में घिर गया। इस गाने में नोरा के साथ संजय दत्त हैं। आरोप है कि इसके बोल बेहद अश्लील, यौन रूप से आपत्तिजनक हैं। इस गाने को लेकर वकीलों ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड और केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से शिकायत की थी। विवाद के मुख्य कारण: गाने के दृश्यों में डांसर बार जैसा माहौल और नोरा के नृत्य को ‘बेहद भड़काऊ’ माना गया। नायिका अर्धनग्न होकर नाच रही हैं। आखिरकार भारी विरोध और कानूनी नोटिस के बाद निर्माताओं को यूट्यूब से इसका हिंदी संस्करण हटाना पड़ा। फिल्म ‘घूसखोर’ पंडत को लेकर भी कोर्ट के आदेश से यह विवादित टाइटल हट गया। गीतों और फिल्मों को लेकर विवाद आज आम बात हो गई है। विवाद पैदा करने को एक हिट फार्मूला माना जा रहा है।
चर्चित तारिका नोरा ने विवाद के बाद अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उन्होंने यह गाना 3 साल पहले कन्नड़ भाषा में शूट किया था, न कि हिंदी में। उन्होंने दावा किया कि उन्हें इसके हिंदी लिरिक्स की जानकारी नहीं थी और निर्माताओं ने बिना उनकी अनुमति के उनके विजुअल्स एआई जेनरेटिड का उपयोग करके हिंदी संस्करण तैयार किया। उन्होंने निर्माताओं को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि कलाकारों को इन स्थितियों में मोहरा बनाया जाता है लेकिन लोग बताएं कि उसे कितने पैसे अश्लीलता के मिले? इस पर वह चुप हैं। यह अभिनेत्री बताए िक वह अश्लीलता की हदें क्याें पार कर रही हैं।
इस कड़ी में रैपर बादशाह भी अपने हरियाणवी गाने ‘टटीरी’ के कारण कानूनी मुश्किलों में फंसे हैं। इस गाने में स्कूल की वर्दी पहनी लड़कियों को आपत्तिजनक तरीके से नचाने और लिरिक्स में ‘वल्गर’ शब्दों का इस्तेमाल करने का आरोप है। आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया को ज्यादा व तेजी से फालो करती है तथा गीत वायरल हो जाने के बाद गायक व कलाकार सुर्खियां बटोरते हैं। इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने का समय आ गया है। राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने अश्लीलता और महिलाओं के गलत चित्रण के लिए बादशाह को समन जारी किया तथा उन्होंने माफी भी मांग ली है। बादशाह के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद उन्होंने माफी मांगते हुए कहा कि उनका इरादा महिलाओं या बच्चों को अपमानित करने का नहीं था। उन्होंने गाना यूट्यूब से हटा दिया।
सच तो यह है कि ये दोनों विवाद केवल दो गानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह “नैतिकता” को लेकर एक गहरी चिंता का विषय हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम अश्लीलता पर संगीतकार और निर्माता अक्सर इसे ‘कलात्मक अभिव्यक्ति’ कहते हैं लेकिन जब कोई गाना लोगों के बीच चलता है तो उसका बच्चों और युवाओं पर असर पड़ता है। महिला आयोग और महिला संगठनों का तर्क है कि अश्लील सामग्री सार्वजनिक शालीनता का उल्लंघन करती है। इन गानों में अक्सर महिलाओं को केवल ‘सैक्स’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
सवाल यह है कि जिम्मेदारी किसकी? क्या नैतिक जिम्मेदारी केवल डांसर (नोरा फतेही) की है या निर्माता-निर्देशक की? सरकार और अदालतों के एक्शन के बाद अब अश्लीलता के खिलाफ जागरूकता बढ़ रही है। सोशल मीडिया और कानूनों के माध्यम से ऐसे कंटेंट पर लगाम लगाई जा रही है। मेरा मानना है िक संगीत को लेकर रचनात्मकता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। अश्लीलता दिखाने वालों पर कड़ा दंड तय होना चाहिए। एक बार सजा बड़े कलाकार को मिल जाएगी तो दोबारा वह जुर्रत नहीं करेगा, यही समय की मांग है।
हमारा संगीत, गीत कहां जा रहा है?
Summary :
आज के समय में संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि यह समाज की सोच और दिशा को भी प्रभावित करता है। संगीत का सीधा प्रभाव युवाओं पर पड़ता है। जब गानों में ऐसे शब्द होते हैं जो रिश्तों, सम्मान और संस्कारों के िखलाफ जाते हैं तो यह धीरे-धीरे समाज की सोच को भी बदल देते हैं। आज के युवा इन्हें सुनकर उसी दिशा में सोचने लगते हैं, जो चिंता का विषय है। कलाकार समाज का आइना होते हैं। उनकी जिम्मेदारी है कि वे ऐसे गाने बनाएं जो प्रेरणा दें, न कि भ्रम या गलत संदेश फैलाएं। केवल प्रसिद्धि…


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