लोकतन्त्र में संवाद ही मूल

Summary :

संसदीय लोकतन्त्र में सत्ता और विपक्ष गाड़ी के दो ऐसे पहिये होते हैं जिनसे लोकतन्त्र चलता है। इन दोनों के बीच समुचित तारतम्य ही संसद के चलने की गारंटी होती है। इस तारतम्य के लिए जरूरी है कि दोनों के बीच लगातार संवाद बना रहे। क्योंकि लोकतन्त्र में संवादहीनता की स्थिति गाड़ी को पटरी से उतारने की दिशा होती है। अतः संवाद का जारी रहना भी लोकतन्त्र के लिए बहुत आवश्यक होता है। गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण (एस.आई.आर.) के मुद्दे पर जिस तरह संसद का पिछला सत्र बेकार चला गया था उससे संसद की गरिमा को ठेस ही लगी थी।…

संसदीय लोकतन्त्र में सत्ता और विपक्ष गाड़ी के दो ऐसे पहिये होते हैं जिनसे लोकतन्त्र चलता है। इन दोनों के बीच समुचित तारतम्य ही संसद के चलने की गारंटी होती है। इस तारतम्य के लिए जरूरी है कि दोनों के बीच लगातार संवाद बना रहे। क्योंकि लोकतन्त्र में संवादहीनता की स्थिति गाड़ी को पटरी से उतारने की दिशा होती है। अतः संवाद का जारी रहना भी लोकतन्त्र के लिए बहुत आवश्यक होता है। गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण (एस.आई.आर.) के मुद्दे पर जिस तरह संसद का पिछला सत्र बेकार चला गया था उससे संसद की गरिमा को ठेस ही लगी थी। हालांकि पिछले सत्र में भी सरकार ने अपने बहुमत के बूते पर कई विधेयक पारित करा लिये थे मगर इनमें विपक्ष की शिरकत नहीं रही थी। जबकि संसदीय लोकतन्त्र की शर्त होती है कि सरकार के हर विधेयक में विपक्ष की भी बराबर की भागीदारी रहनी चाहिए। बेशक लोकतन्त्रीय प्रणाली में बहुमत का ही शासन होता है मगर इसमें विपक्ष की भी भागीदारी हर सूरत में रहनी चाहिए क्योंकि विपक्ष का चुनाव भी आम जनता ही अपने एक वोट के अधिकार से करती है। जब अल्पमत में रहने के कारण जनता द्वारा चुने गये सदस्य विपक्ष में बैठते हैं तो उन पर अल्पमत में रहते हुए जनता की आवाज संसद में उठाने की जिम्मेदारी रहती है। अतः संसद का कामकाज हर सूरत में जारी रहना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं है कि बहुमत की जीत इस प्रणाली में निश्चित होती है मगर यह बहुमत की सरकार विपक्ष के माध्यम से जनता के प्रति जवाबदेह रहती है। बहुमत का अर्थ सत्ता पक्ष की बरजोरी नहीं होती है, बल्कि विपक्ष को भी साथ लेकर चलने की कला होती है। विपक्ष सरकार की नीतियों के जमीनी असर से सरकार को अवगत कराता है। विपक्ष की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही होती है क्योंकि सरकार अन्ततः आम जनता के प्रति जवाबदेह होती है। संसद का सत्र शुरू हुए तीन दिन हो चुके हैं और एस.आई.आर. के मुद्दे पर सरकार बहस के लिए तैयार हो गई है जिसका सर्वत्र स्वागत किया जा रहा है। निश्चित रूप से संसद के नियमों के अनुसार विपक्ष सीधे एस.आई.आर. पर बहस नहीं कर सकता है क्योंकि चुनाव आयोग एक स्वतन्त्र व स्वायत्तशासी संवैधानिक संस्था है। हां चुनाव प्रणाली पर बहस जरूर हो सकती है क्योंकि भारत में चुनाव संशोधन या सुधार एक बहुत बड़ा मुद्दा है। चुनाव प्रणाली में सुधार का यह विषय 1974 से लम्बित पड़ा हुआ है। इस वर्ष पूरे देश में चुनाव सुधार करने की मांग जयप्रकाश नारायण (जेपी) के आन्दोलन के तहत की गई थी। जेपी चाहते थे कि चुनावों में सुधार इस प्रकार हों कि ये सस्ते हो सकें जिससे कोई भी प्रबुद्ध मतदाता चुनाव में खड़े होने की हिम्मत कर सके। जेपी चाहते थे कि चुनावों के लिए भारत सरकार एक कोष का गठन करे और चुनाव प्रचार के लिए अधिकाधिक सरकारी प्रचार व प्रसार माध्यमों का इस्तेमाल हो। चुनाव साधारों के लिए आन्दोलन के चलते हुए ही उन्होंने रिटायर जस्टिस वी.एम. तारकुंडे की अध्यक्षता में एक समिति का गठन भी किया था। चुनाव कोष स्थापित करने का सुझाव इसी तारकुंडे समिति ने किया था। समिति ने कई और महत्वपूर्ण सुझाव दिये थे जो कभी लागू नहीं हो सके। इसकी वजह यही कि 1975 में इन्दिरा जी ने पूरे देश में इमरजेंसी लगा दी और 1977 में इसके हटने के बाद देश में लोकसभा के चुनाव हुए जिनमें इन्दिरा जी की कांग्रेस बुरी तरह परास्त हो गई और सत्ता में कुर्सी पर जेपी की निगेहबानी के तहत पंचमेल खिचड़ी जनता पार्टी की सरकार स्व.मोरारजी देसाई के नेतृत्व गठित हुई जिसने तारकुंडे समिति की सिफारिशों को ताक पर रख दिया और मुख्य चुनाव आयुक्त रहे स्व. एस.एल. शकधर की अगुवाई मंे नये चुनाव सुधार आयोग को गठित कर दिया। जब इस आयोग की रिपोर्ट आयी तो 1980 में केन्द्र में पुनः फेरबदल हो गया और इस वर्ष हुए लोकसभा के मध्यावधि चुनावों में इन्दिरा गांधी फिर से प्रधानमन्त्री के पद पर पहुंचीं जिसकी वजह शकधर आयोग की रिपोर्ट ढंडे बस्ते में चली गई। खैर यह तो इतिहास की बात है जबकि वर्तमान समय में एस.आई.आर. पर चर्चा के चर्चे हैं। सरकार का इस बात के लिए राजी होना लोकतन्त्र की शानदार परंपरा के अनुरूप ही कहा जायेगा। एस.आई.आर. पर अगले सप्ताह मंगलवार के दिन लोकसभा में चर्चा होगी। इसके बाद राज्सभा में भी चर्चा होगी। एस.आई.आर. ने पूरे देश में खासा विवाद पैदा कर रखा है और इसे कराने वाले संगणकों ( बीएलओ ) की आत्महत्याएं राजनैतिक पारा बहुत ऊंचा बनाये हुए हैं। सरकार चाहती है कि इससे पहले वन्दे मातरम् राष्ट्रगीत पर भी चर्चा हो। इस पर चर्चा के लिए लोकसभा में 8 दिसम्बर की तारीख तय हुई है जिसके अगले दिन एस.आई.आर. पर बहस होगी। जाहिर है कि इस मुद्दे पर राजीनामा लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिड़ला के हस्तक्षेप के बाद हुआ। विगत सोमवार को श्री बिड़ला ने सभी दलों के संसदीय नेताओं को दो बार बातचीत के लिए बुलाया और समाधान खोजा। वास्तव में लोकसभा को चलाने की कमान इसके अध्यक्ष के ऊपर भी होती है हालांकि सरकार में एक सदस्य कार्यमन्त्री भी होते हैं। इनका मुख्य कार्य विपक्ष से लगातार संवाद स्थापित करने का होता है। मगर जब सदन में किसी मुद्दे पर गतिरोध पैदा हो जाता है तो उसे तोड़ने की कमान अध्यक्ष को भी लेनी पड़ती है क्योंकि वह सदन के संरक्षक भी होते हैं। उनका संरक्षण हर पार्टी के हर सदस्य को होता है अतः श्री बिड़ला का हस्तक्षेप काफी बड़े मायने रखता है। मगर यह सब सत्ता व विपक्ष के बीच तर्कपूर्ण आधार पर ही होता है। अतः सत्ता व विपक्ष दोनों के तर्कों का संज्ञान लेते हुए ही अध्यक्ष ने एस.आई.आर. पर समझौता कराया। लोकतन्त्र कहता है कि जब सड़कों पर जबर्दस्त तूफान मचा हो तो संसद के भीतर उसकी प्रतिध्वनी गूंजनी चाहिए। इसलिए एस.आई.आर. पर चर्चा सत्ता व विपक्ष दोनों को ही सन्तुष्ट करेगी।

Aditya Chopra

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