आर्थिक सर्वेक्षण और रुपया

Summary :

संसद में कल पेश वित्त वर्ष 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर ठोस मजबूती के बावजूद विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर गंभीर चिन्ता व्यक्त की गई है और कहा गया है कि वैश्विक परिस्थि​ि​तयों की अस्थिरता के चलते इस पर विपरीत असर पड़ सकता है तथा भारत में प्रत्यक्ष व संस्थागत विदेशी निवेश में अनिश्चितता का माहौल रह सकता है और डालर के मुकाबले रुपये की कीमत में गिरावट का वातावरण बना रह सकता है। रुपये की कीमत में विगत वर्ष 2025 में सात प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है जिसके चलते रुपया 92…

संसद में कल पेश वित्त वर्ष 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर ठोस मजबूती के बावजूद विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर गंभीर चिन्ता व्यक्त की गई है और कहा गया है कि वैश्विक परिस्थि​ि​तयों की अस्थिरता के चलते इस पर विपरीत असर पड़ सकता है तथा भारत में प्रत्यक्ष व संस्थागत विदेशी निवेश में अनिश्चितता का माहौल रह सकता है और डालर के मुकाबले रुपये की कीमत में गिरावट का वातावरण बना रह सकता है। रुपये की कीमत में विगत वर्ष 2025 में सात प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है जिसके चलते रुपया 92 रुपये प्रति डालर की विनिमय दर तक पहुंच गया है। हालांकि सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत की अर्थ व्यवस्था के दीर्घकालिक आधारभूत आर्थिक मानक बहुत मजबूत हैं और इसकी सकल उत्पाद वृद्धि दर सात प्रतिशत से भी अधिक तक तक रहने की उम्मीद है परन्तु वैश्विक उथल–पुथल के चलते विदेशी निवेशकों में असमंजस की स्थिति है जिसके चलते भारत पर पूंजी प्रहार हो रहा है और परिणामस्वरूप रुपये की कीमत को इसका निशाना बनना पड़ रहा है। इसी वजह से रुपया अपने वजन से नीचे गिर रहा है। जबकि भारत की अर्थव्यवस्था के सभी आधारभूत आर्थिक मानक बहुत मजबूत हैं। इनमें सकल उत्पाद वृद्धि दर से लेकर मुद्रा स्फीति और ऋण उठान में वृद्धि से लेकर बेहतर मानसून तक शामिल हैं।
भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार श्री वी. अनन्त नागेश्वरन द्वारा तैयार किये गये आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत अन्तर्राष्ट्रीय अस्थिर परिस्थितियों का शिकार हो रहा है क्योंकि रुपये की कीमत इसकी अर्थव्यवस्था के मजबूत मानकों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही है जिसकी वजह से विदेशी निवेशकों में हिचकिचाहट पैदा हो रही है। हालांकि रुपये की कम कीमत अमेरिका द्वारा भारत पर थोपी गयी ऊंची शुल्क दरों के प्रभाव को नकारती है मगर इसके बावजूद विदेशी निवेशकों की भारत के प्रति मायूसी चिन्ता का कारण बन सकती है। सर्वेक्षण में स्वीकार किया गया है कि वाणिज्यक कारोबार के नजरिये से भारत को बेशक विदेश व्यापार घाटा होता है मगर सेवा क्षेत्र के निर्यात में यह मुनाफे में रहता है और भारत में विदेशों से अनिवासी भारतीयों द्वारा भेजी जाने वाली भारी मुद्रा से इसकी भरपाई नहीं हो सकती है परन्तु प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिये भारत अपनी भुगतान सन्तुलन की समस्या को सरल बनाये रखने में सफल रहता है। अतः विदेशी निवेश के कम होने से दिक्कत होने के आसार पैदा हो सकते हैं। इसके चलते यह विचारणीय हो जाता है कि भारत में प्रत्यक्ष व संस्थागत विदेशी निवेश की रफ्तार में गुणात्मक कमी दर्ज न हो पाये जबकि इसके आर्थिक मानक बहुत मजबूत चल रहे हों और हर मोर्चे पर अर्थव्यवस्था पर इसकी गुलाबी तस्वीर उभरती हुई दिखाई पड़ रही हो। इसकी वजह केवल वैश्विक परिस्थितियां ही हैं और इस चुनौती का सामना करते हुए भारत को भविष्य में आगे बढ़ना होगा।
सर्वेक्षण पेश किये जाने वाले आर्थिक बजट में उठाये जाने वाले संभावित कदमों की मोटी तस्वीर भी प्रस्तुत करता है, जिसमें कहा गया है कि भारत में शुल्क ढांचे को और सहज बनाने के लिए सरकार पूंजी बाजार में अधिसूचित सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों से अपनी पूंजी हिस्सेदारी में और कमी कर सकती है तथा इसे 26 प्रतिशत शेयर पूंजी तक ला सकती है। अतः आवश्यक राजस्व आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सरकार पूंजीगत जरूरतों को पूरा करने के लिए यह रास्ता अपना सकती है। एेसा करना देश में उत्पादन के क्षेत्र में अधिक प्रतियोगी माहौल बनाने के लिए जरूरी होगा। अतः यह कहा जा सकता है कि बजट में वे सभी उपाय किये जायेंगे जिनसे भारत उत्पादन के क्षेत्र में और गति से आगे बढ़ सके तथा बदलती वैश्विक परिस्थितियों में अपनी अर्थव्यवस्था को अधिकाधिक मजबूत बना सके। जहां तक घरेलू मोर्चे पर आर्थिक मानकों का सवाल है तो लगभग हर क्षेत्र में सरकारी निवेश बढ़ने से अर्थिक क्षेत्र में वित्तीय प्रचुरता का माहौल बना है। इसके साथ ही घरेलू बाजार में माग बढ़ने से निजी निवेश में भी सुधार हो रहा है। भारत में महंगाई की दर में भी नरमी बनी हुई है जिसके चलते उपभोक्ताओं को राहत महसूस हो रही है तथा दूसरी तरफ आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में वृद्धि भी दर्ज हो रही है। ये सभी मानक एेसे हैं जिनसे बाहरी झटकों से निपटा जा सकता है मगर विदेशी मौद्रिक मोर्चे पर इतना ही काफी नहीं है क्योंकि रुपया अपनी वास्तविक कीमत से नीचे की दर पर खरीदा और बेचा जा रहा है। इस स्थिति को विदेशी निवेश में सुधार लाकर ही ठीक किया जा सकता है। इस सन्दर्भ में आर्थिक सर्वेक्षण से हट कर हमें यह समझने की जरूरत है कि एेसा पहली बार नहीं हो रहा है कि भारत वैश्विक उथल–पुथल का सामना कर रहा है। इससे पहले वर्ष 2008-09 में भी जब पूरा विश्व आर्थिक मन्दी की गहरी चपेट में आया था तो भारत ने घरेलू मोर्चे पर अपनी अर्थ व्यवस्था को सुद्रढ़ बना कर इसका मुकाबला किया था। उस समय घरेलू मांग को बढ़ाकर तथा उत्पादन के क्षेत्र में लगे हुए संस्थानों को शुल्क छूट देकर भारत ने अपनी आर्थिक रफ्तार को कायम रखा था और इसके वित्तीय संस्थानों ने पंूजीगत जरूरतों की भरपाई करने में कोई कोताही नहीं बरती थी हालांकि उस दौर में दुनिया के बड़े-बड़े बैंक संकट में पहुच गये थे परन्तु तब भारत के बैंकों के प्रति लोगों का विश्वास अटूट रहा था । अतः वैश्विक उथल–पुथल के चलते भारत ने जिस प्रकार यूरोपीय संघ के 27 देशों के साथ शुल्क मुक्त व्यापार समझौता किया है उससे देश में उत्पाद आत्मनिर्भरता का माहौल बनेगा और उत्पादन गतिविधियों को बल मिलेगा जिसके चलते भारत की अर्थ व्यवस्था के आधारभूत मानक और मजबूती प्राप्त करेंगे।

Aditya Chopra

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