स्वतन्त्र भारत के आर्थिक विकास में सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों व वित्तीय संस्थानों तथा बीमा कम्पनियों व ग्रामीण विकास बैंकों की भूमिका बहुत उत्प्रेरक व महत्वपूर्ण रही है। इन बैंकों ने केवल भारतीय नागरिकों के व्यक्तिगत आर्थिक उत्थान में निर्णायक भूमिका निभाई है, बल्कि भारत के औद्योगिक विकास से लेकर आधारभूत ढांचे के विकास में भी महत्ती योगदान दिया है। इन वित्तीय संस्थाओं की भूमिका ग्रामीण व कृषि क्षेत्र के विकास से लेकर बढ़ते शहरीकरण के वित्तीय पोषण में भी उल्लेखनीय रही है जिसकी वजह से आज हम विकसित भारत का सपना संजो रहे हैं। बैंकों के श्रेष्ठ कार्य की निर्भरता इसके कर्मचारियों पर ही निर्भर करती है क्योंकि ये किसी भी बैंक के लाभ कमाने की गारंटी होते हैं।
हालांकि बैंकों का कामकाज ऋण लेने व ऋण देने तक सीमित रहता है परन्तु सामाजिक विकास में उनका यह कार्य ही प्रमुख भूमिका निभाता है। किसी भी देश का विकास इस बात से भी मापा जाता है कि उसकी आबादी का कितना हिस्सा बैंकिंग प्रणाली से जुड़ा हुआ है।
भारत में वित्तीय क्रान्ति या बैंकिंग क्रान्ति की शुरूआत 1969 से तब शुरू हुई जब इस वर्ष तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और इनके दरवाजे आम व सामान्य नागरिकों के लिए खोले। उस समय इन सरकारी बैंकों को भारत के प्रत्येक जिले के आर्थिक विकास की जिम्मेदारी इस प्रकार सौंपी गई कि वे अपनी प्राथमिकता पर कृषि व ग्रामीण क्षेत्र को लेते हुए सकल समाज का उत्थान करें और व्यापार व कारोबार को बढ़ावा देने के लिए छोटे व्यापारियों को भी बैंकों से सुगम कर्जा उपलब्ध करायें।
तब भारत ने पहली बार देखा कि बैंक किस प्रकार सामाजिक परिवर्तन में भी अपनी भूमिका निभा सकते हैं। उस समय सरकारी बैंकों के लिए ऋण उपलब्ध कराने के वरीयता क्षेत्र बनाये गये जिनमें कृषि क्षेत्र को प्रथम स्थान दिया गया। अतः भारत की हरित क्रान्ति में भी बैंकों के योगदान को नजरअन्दाज नहीं किया जाना चाहिए। यह भारत में बैंक या वित्तीय क्रान्ति का प्रथम दौर था जिसमें भारत के आम आदमी के बीच राष्ट्रीय आय का समुचित बंटवारा निहित था इसीलिए इसे समाजवादी नीतियों का अंग समझा गया। इसकी वजह यह थी कि बैंकों में भारतीयों का ही धन जमा था जिस पर राष्ट्रीयकरण करके सभी सामान्य नागरिकों का हक बनाया गया।
इसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि किसान से लेकर छोटे दुकानदार तक के लिए बैंकों के दरवाजे खुले और उन्हें महसूस हुआ कि बैंकों पर सिर्फ धन्ना सेठों का ही अधिकार नहीं होता है। वित्तीय क्रान्ति के इस प्रथम दौर के बाद दूसरा चरण 1991 से आर्थिक उदारीकरण के साथ शुरू हुआ जब निजी क्षेत्रों में बैंकों के खाेलने व ऋण देने के नियम सरल बनाये गये। यह बाजारवाद की व्यवस्था थी जिसका एक नियम प्रतियोगिता भी होता है। इससे बैंकिंग क्षेत्र में भी प्रतियोगिता का चरण शुरू हुआ और निजी बैंकों ने भारत में पिछले साठ सालों में विकसित मध्य उपभोक्ता बाजार को अपना लक्ष्य निर्धारित किया।
उस समय तक भारत में कृषि क्रान्ति का दौर पूरा हो चुका था। दूसरे चरण में यह उपभोक्ता उत्थान का दौर था जिसमें वित्तीय सुधार इस प्रकार हुए कि एश्वर्य प्रधान समझी जाने वाली वस्तुओं तथा मोटर कार से लेकर घरेलू व महंगे उपकरणों की खरीदारी के लिए बैंकों ने ऋणों के लिए अपने दरवाजे खोले और मकान बनाने व खरीदने के लिए भी कर्जे सामान्य लोगों को देने शुरू हुए। मगर ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सब भारत के आम आदमी की व्यक्तिगत आय में वृद्धि के बाद ही संभव हुआ और इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का बहुत बड़ा योगदान था। निजी बैंकों के मैदान में उतरने के बाद प्रतियोगिता का माहौल भी पैदा हुआ जिससे ऋण की सुलभता में प्रचुरता आयी। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने इसमें भी बाजी मारी और वे पारंपरिक जिम्मेदारी निभाते हुए अपनी नई भूमिका को भी प्रभावकारी ढंग से निभाते रहे जिससे उनकी लाभप्रदता में कमी नहीं आयी।
इसकी एक वजह बैंकिंग टैक्नोलॉजी में आयी क्रान्ति भी रही जिसकी वजह से बैंकों का सतत् विस्तार तो हुआ मगर उनके कर्मचारियों में तदनुरूप वृद्धि नहीं हुई। बैंकों का लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि वे किस ब्याज दर पर धन जमा करते हैं और किस ब्याज दर पर कर्जा उपलब्ध कराते हैं। इस ब्याज अन्तर को तक्नीकी भाषा में ‘स्प्रेड’ कहा जाता है जिसमें बैंकों के अपने सारे खर्चे निकाल कर मुनाफा भी कमाना होता है। बैंकों का सबसे बड़ा खर्चा इनके कर्मचारियों का वेतन ही होता है और ये ही इनमें जमा धन के अलावा दूसरी सबसे बड़ी सम्पत्ति भी होते हैं क्योंकि इन्हीं की कार्यक्षमता व दक्षता पर बैंकों का मुनाफा निर्भर करता है। अतः इनकी अवस्था को चुस्त -दुरुस्त रखना सरकार का कर्त्तव्य होता है।
सरकार हर पांच वर्ष बाद इनके वेतन में समयानुरूप वृद्धि करती है। यह वृद्धि बैंक कर्मचारी संगठनों व सरकार के बीच बातचीत के बाद की जाती है। फिलहाल यह वृद्धि आगमी नवम्बर महीने से की जानी है जिसके लिए वित्त मन्त्रालय ने सूचना जारी कर दी है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि पिछले पांच सालों में महंगाई काफी बढ़ चुकी है। जबकि इन वर्षों के दैरान सरकारी बैंकों ने अपने कामकाज में शानदार मुनाफा कमाया है और अपने बट्टा खाते ऋणों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की है। इन बैंकों का मुनाफा जहां वर्ष 2023 में एक लाख पांच हजार करोड़ था वहीं 2025 में यह बढ़कर एक लाख 78 हजार करोड़ रुपए हो गया और बट्टा खाता ऋणों का प्रतिशत गिर कर 2.30 प्रतिशत रह गया। सरकारी बैंक भारत की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ हैं इसका मुजाहिरा 2008-09 की विश्व आर्थिक मन्दी के समय भी तब हुआ था जब दुनिया के बड़े–बड़े बैंक चौपट हो गये थे मगर भारत के सरकारी बैंक सिर उठाये खड़े रहे और लोगों का विश्वास इनमें कम नहीं हुआ था।


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