लोकमत महाराष्ट्रीयन ऑफ द ईयर का वो मंच बिल्कुल अलग किस्म का था। तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और तत्कालीन उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस वहां नाना पाटेकर और मेरे सवालों का सामना कर रहे थे। अचानक नाना पाटेकर ने एकनाथ शिंदे से एक ऐसा सवाल पूछ लिया जो पूरा देश राजनीतिज्ञों से हमेशा पूछना चाहता है मगर हिम्मत नहीं कर पाता। नाना का सवाल था कि मतदाता के रूप में हमारी कोई कीमत है क्या? इसका बड़ा संतुलित जवाब देवेंद्र फडणवीस ने दिया- हमारी कीमत आपके भरोसे पर तय होती है। यदि आपकी कम हुई तो हमारी कैसे रहेगी।
नाना की यही बड़ी खासियत थी कि वे कहीं भी, कभी भी बहुत बेबाकी के साथ सवाल पूछने की हिम्मत रखते थे। लोकमत महाराष्ट्रीयन ऑफ द ईयर सम्मान समारोह का अवसर हो या फिर लोकमत सरपंच अवार्ड या फिर किसी और अवसर पर हुई मुलाकात, नाना के भीतर कॉमन मैन के लिए एक बेचैनी मुझे दिखी। मुख्यमंत्री से उनका सवाल इसी बेचैनी की अभिव्यक्ति थी। यह बेचैनी उनके नाटकों और उन फिल्मी किरदारों में भी दिखती रही है जिसे उन्होंने निभाया. बल्कि उनकी शख्सियत को सामने रख कर किरदार रचे जाते थे और डायलाॅग लिखे जाते थे।
यह कितनी बड़ी बात है कि नाना ने न केवल बेचैनी वाले इन किरदारों के पात्र निभाए बल्कि खुद निजी जिंदगी में भी इसी बेचैैनी के साथ जिए। लोकमत सरपंच अवार्ड समारोह में वे मुख्य अतिथि बन कर आए थे और उनसे लंबी बातचीत हुई थी। उन्होंने पंचायतों को प्रोत्साहित करने की लोकमत के प्रयास की सराहना करते हुए कहा था कि यह बहुत जरूरी प्रकल्प है। यदि बुनियादी स्तर पर ही कमजोरी रहेगी तो देश विकास की राह पर कैसे आगे बढ़ेगा।
महाराष्ट्र के किसानों की स्थिति और खासकर आत्महत्या की समस्या को लेकर उनके भीतर जैसे आग जल रही थी। मुझे पता चला है कि जिंदगी के आखिरी दिनों में किसानों के परिवारों को ढाई-ढाई लाख रुपए देने के लिए उन्होंने अपने पास से पचास लाख रुपए दिए थे। नाना को करीब से जानने वाले लोग इस बात से वाकिफ हैं कि एक्टर होने के साथ ही वे विभिन्न सामाजिक प्रकल्पों से जुड़े थे। मगर जब भी काम से छुट्टी मिलती थी तो वे सीधे अपने गांव पहुंच जाया करते थे जहां वे केवल एक किसान थे। वे किसानी को जीते थे और इसलिए किसानों के दर्द को गहराई से समझते थे।
नाना पाटेकर की शख्सियत एक नजर में बहुत कड़क लगती थी। इसी कड़कपन पर उन्होंने एक कविता भी लिखी थी। यदि आपने पढ़ी हो तो भी फिर से पढ़िए…
मैं हूं कड़कपन
मैं सच्चाई की रीढ़ में हूं/जज्बात की भीड़ में हूं/अनुशासन की रगों में हूं/आदर्शों के धागों में हूं।
कहीं रवैये में हूं, तो/कहीं आदतों में हूं/कहीं वजूद में हूं, तो कहीं शख्सियत में हूं।
वो ही कड़कपन/ जो नेकी में उमड़ता है/इरादों में झलकता है/बहके को संवारता है/वर्दी पर निखरता है।
नाना ने वर्दी पर जिस कड़कपन के निखरने की बात की है, वह भी उन्होंने जिया है। कारगिल युद्ध के बाद जब मुझे पता चला कि नाना पाटेकर जंग के मैदान में भी जा पहुंचे थे तो उनके प्रति मेरा मन श्रद्धा से भर गया। पता चला कि फिल्म प्रहार के पहले उन्होंने तीन साल तक सेना में प्रशिक्षण लिया था मगर कभी इसका प्रचार नहीं किया।
हां, जब कारगिल में जंग छिड़ी तो उन्होंने जंग के मैदान में जाने की अनुमति तत्काल मांगी। जब अनुमति नहीं मिली तो उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से गुजारिश की और वर्दी पहन कर और एके-47 लेकर बॉर्डर पर दुश्मनों के दांत खट्टे करने जा पहुंचे। नाना की जगह कोई दूसरा होता तो खूब प्रचार करता लेकिन उन्होंने प्रचार से दूरी बनाए रखी।
नाना की यही खासियत थी कि सामाजिक सरोकारों के कार्यों का भी कभी खुद बखान नहीं करते थे। वे सच्चे मायनों में कर्मवीर थे। उनके प्रशंसकों में से ज्यादातर को शायद ही यह मालूम हो कि वे शास्त्रीय संगीत के भी अच्छे जानकार थे। रागों को समझते थे और शास्त्रीय संगीत सुनने का कोई भी अवसर नहीं चूकते थे। नाना बहुत अच्छा खाना बनाते थे और अपने गांव में अपने अतिथियों को खुद खाना बनाकर खिलाते थे। बातचीत में नाना ने मुझे अपने गांव आने का निमंत्रण दिया था। मेरी भी बहुत इच्छा थी कि उनके गांव जाऊं और नाना के हाथों का बना खाना खाऊं लेकिन क्या पता था कि ये अवसर कभी नहीं आएगा। नाना, आपकी बहुत याद आएगी। एक खुद्दार इंसान की कमी पूरा जमाना महसूस करता है। नाना, आपको अलविदा कहते हुए मेरे शब्द कांप रहे हैं!
तो क्या ट्रम्प साहब अमेरिका पर भी टैरिफ लगाएंगे…!
मैंने जब खबर सुनी कि अमेरिका की डीजल जरूरतें पूरी करने के लिए डोनाल्ड ट्रम्प साहब रूस से डीजल आयात करने जा रहे हैं तो दिल धक्क से रह गया। ऐसी भी क्या जरूरत आन पड़ी? इससे क्या उनके रुतबे पर कोई असर नहीं पड़ेगा? मुझे पुतिन साहब की कोई चिंता नहीं है क्योंकि वे तो दुनियाभर को तेल बेचना चाहते ही हैं। समस्या तो अमेरिका को है। ट्रम्प साहब ने अभी-अभी उस आदेश पर हस्ताक्षर किए हैंं जिसमें कहा गया है कि जो भी देश रूस से तेल खरीदेगा उस पर वे अतिरिक्त टैरिफ लगाएंगे।
मेरे मन में सवाल उठ रहा है कि क्या ट्रम्प साहब अब अमेरिका पर भी अतिरिक्त टैरिफ लगाएंगे? मगर फिर खयाल आया कि ट्रम्प साहब बॉस हैं और व्यवस्था के दो ही नियम होते हैं। नियम 1. बॉस हमेशा सही होता है। नियम 2. यदि आप बॉस से सहमत नहीं हैं तो कृपया रूल नंबर 1 पढ़िए।


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