शर्मसार करती नस्ली टिप्पणियों की घटनाएं

Summary :

बीते साल दिसंबर में उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में त्रिपुरा के छात्र अंजेल चकमा की हत्या कर दी गई थी। इस घटना के दो महीने से भी कम समय बाद, देश की राजधानी दिल्ली में अरुणाचल की तीन महिलाओं के साथ नफरत भरी नस्लीय गालियां दी गईं, उनके खिलाफ अपमानजनक शब्द बोले गए। युवतियों ने इस घटना का वीडियो बनाया जो कि वायरल हो गया। इस वीडियो में युवतियों को अभियुक्त “मोमो” और “मसाज पार्लर वाली” कहते नज़र आ रहे हैं। ये युवतियां पिछले सात महीने से दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर में किराए के घर में रह रही थीं।…

बीते साल दिसंबर में उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में त्रिपुरा के छात्र अंजेल चकमा की हत्या कर दी गई थी। इस घटना के दो महीने से भी कम समय बाद, देश की राजधानी दिल्ली में अरुणाचल की तीन महिलाओं के साथ नफरत भरी नस्लीय गालियां दी गईं, उनके खिलाफ अपमानजनक शब्द बोले गए। युवतियों ने इस घटना का वीडियो बनाया जो कि वायरल हो गया। इस वीडियो में युवतियों को अभियुक्त “मोमो” और “मसाज पार्लर वाली” कहते नज़र आ रहे हैं। ये युवतियां पिछले सात महीने से दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर में किराए के घर में रह रही थीं।

इनमें एक युवती दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट, दूसरी ओटीटी टेक्नीशियन हैं और तीसरी सिविल सर्विसेज की तैयारी में जुटी हैं। लेकिन इस बार मामला अलग था। बड़े राजनीतिक नेता इसमें शामिल हो गए। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इस बारे में पोस्ट किया और केंद्र सरकार में पूर्वोत्तर मामलों के मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी इसे मुद्दा बनाया। अपशब्द कहने वालों को गिरफ्तार किया गया और उन्होंने अपनी सफाई में कहा कि गालियां गुस्से में दी गई थीं।

इस घटनाक्रम के बाद एक व्यक्ति और उसकी पत्नी पर धर्म, जाति व जन्म स्थान आदि के आधार पर कटुता फैलाने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। इस मामले में बड़े राजनीतिक ध्यान की वजह से यह मामला खत्म नहीं होगा और शायद आरोपियों को मिलने वाली सजा दूसरों के लिए चेतावनी बनेगी। कुछ साल पहले ऐसा दुर्व्यवहार अज्ञानता की वजह से होता था। भारत के बाकी हिस्सों के लोग पूर्वोत्तर के बारे में बहुत कम जानते थे, लेकिन अब यह सच नहीं है। भारत के बड़े शहरों में लोग खासी, मिजो, नागा और दूसरे समुदायों के बारे में जानते हैं। वे जानते हैं कि वे न तो नेपाली हैं और न ही चीनी।

फिर भी, जब भी किसी तरह का झगड़ा होता है, तो वही पुरानी गालियां दी जाती हैं: इन लोगों को ‘चिंकी’ कहा जाता है। महिलाओं के चरित्र पर सवाल उठाए जाते हैं और भी बहुत कुछ कहा जाता है। ऐसा लगता है कि यह सब जल्दी खत्म नहीं होने वाला है। 1960 के दशक के आखिर तक दक्षिण भारतीयों की स्थिति को याद कीजिए। हिंदी फिल्मों में उनका मजाक बनाया जाता था और उनके सांवले रंग की वजह से उन्हें “कालू” जैसे नाम दिए जाते थे।

इसमें कुछ मजाक हो सकता था, लेकिन इसमें हमेशा एक चुभन भी होती थी। शुरुआत में, उत्तर भारतीयों को यह समझने में भी बहुत समय लगा कि सभी दक्षिण भारतीय मद्रासी नहीं होते। इससे कुछ अजीब हालात पैदा हुए। अतीत में भी दिल्ली में पूर्वोत्तर भारत के लोगों के खिलाफ हिंसा के कई मामले सामने आए हैं। ऐसे ही मामलों में 2014 का निडो तानिया केस सबसे प्रमुख है। अरुणाचल के इस स्टूडेंट की नस्लीय टिप्पणी का विरोध करने पर पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी।

इसके अलावा, 2012 में रिचर्ड लोइताम और 2014 में शालोनी जैसे युवाओं की संदिग्ध परिस्थितियों और हमलों में जान गई थी। हालांकि अब पूर्वोत्तर के लोग इस नस्लवाद के खिलाफ आवाज बुलंद करते रहे हैं। मौका खोजा, रेबेल, केखेको जैसे आर्टिस्ट अपने गानों में अपशब्दों के खिलाफ आवाज उठाते हैं। ‘चिंकी’ नाम का गाना भी हाल ही में काफी मशहूर हुआ था।

2019 की फिल्म ‘एक्सोन’ (अनेक) भी नॉर्थ-ईस्ट के लोगों द्वारा दिल्ली में बनाए जाने वाले पारंपरिक खाने और उससे जुड़ी चुनौतियों पर आधारित एक अच्छी फिल्म है। कोविड-19 महामारी के दौरान भी इन नागरिकों को ‘कोरोना’ कहकर बुलाने और उन पर थूकने जैसी घटनाएं दर्ज की गई थीं। इन बढ़ते मामलों के कारण ही सरकार को ‘बेजबरुआ समिति’ का गठन करना पड़ा था ताकि पूर्वोत्तर के समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

अक्सर आरोप लगाये जाते रहे हैं कि पूर्वोत्तर के छात्रों व श्रमिकों को उनकी शारीरिक बनावट, खान-पान और भाषा के आधार पर निशाना बनाया जाता है। यह विडंबना ही है कि कुछ संकीर्ण लोग भारत की समृद्ध विविधता की विरासत का मर्म नहीं पहचानते हैं। किसी राज्य की भौगोलिक स्थिति, जलवायु व सदियों से चली आ रही संस्कृति हमारे रूप-रंग-भाषा व व्यवहार का निर्धारण करती है। कोस-कोस पर भाषा-पानी बदलने वाले देश की यह विविधता इसकी खूबसूरती भी है। इसके मर्म का सम्मान करना व अंगीकार करना हर भारतीय का दायित्व भी है। पर्वतीय इलाकों का परिवेश व जलवायु व्यक्ति के सरल, सहज, सौम्य व्यवहार व कद-काठी का भी निर्धारण करती है।

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी क्षेत्रीय पहचान को लेकर किए जाने वाले किसी भेदभाव के प्रति अक्सर चेताया है। निस्संदेह, कालांतर में पैदा होने वाली नस्लीय शत्रुता इस घटनाक्रम का ही एक घिनौना रूप है। हाल ही के दिल्ली प्रकरण में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष है सामाजिक श्रेष्ठता का दावा करना, किसी बड़े राजनेता से संबंध होने का रौब दिखाना और दूसरे को कमतर मान कथित ‘औकात’ के नाम पर उपहास करना।
दिल्ली की घटना की तीन पीड़ितों के वकील, जो सिक्किम से आते हैं, ने दो टूक शब्दों में कहा है- ‘हम भी उतने ही भारतीय हैं, जितने कोई और।’ निर्विवाद रूप से प्रत्येक भारतीय को देश में कहीं भी गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है।

शासन-प्रशासन द्वारा यह सुनिश्चित करना कि किसी भी नागरिक को इस अधिकार से वंचित न किया जा सके, सही मायनों में भारत में बहुलवाद की वास्तविक परीक्षा भी है। हालिया घटनाएं बहुत गंभीर हैं और इसे महज एक इक्का-दुक्का मामला मान कर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह दर्शाता है कि उत्तर-पूर्व के लोगों के खिलाफ नस्लवाद आज भी समाज में मौजूद है।

ऐसे व्यवहार को हतोत्साहित करने के लिए सख्त सजा की जरूरत है। वहीं कानूनों, शिक्षा और नीतियों में बदलाव की ज़रूरत है ताकि जागरूकता की शुरुआत कम उम्र से ही हो सके। बुनियादी स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक, लोगों को यह सिखाया जाना चाहिए कि वे उत्तर-पूर्व को भारत के एक अभिन्न अंग के रूप में देखें। 2014 से 2026 तक भेदभाव की घटनाएं सारे समाज को शर्मसार करती हैं। इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए हमें जवाबदेही और दीर्घकालिक जागरूकता, दोनों की आवश्यकता है।

Team Desk