आज भी रिस रहे हैं विभाजन के जख्म हिंद-पाक में !

Summary :

भारत का विभाजन एक ऐसी घटना है जिसे न हमारा देश और न ही सरहद पार का देश कभी भूल सका। 1947 में आजादी के साथ आया बंटवारा केवल नक्शे पर एक रेखा नहीं था। वह करोड़ों परिवारों का टूटना, लाखों जानों का जाना और पीढ़ियों तक चलने वाला घाव था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस दर्द को याद रखने के लिए 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस घोषित किया है। यह दिन बताता है कि स्वतंत्रता का उत्सव मनाते समय उन लोगों को नहीं भूलना चाहिए जिनकी जान गई, जिनके घर उजड़े और जिनकी स्त्रियों पर…

भारत का विभाजन एक ऐसी घटना है जिसे न हमारा देश और न ही सरहद पार का देश कभी भूल सका। 1947 में आजादी के साथ आया बंटवारा केवल नक्शे पर एक रेखा नहीं था। वह करोड़ों परिवारों का टूटना, लाखों जानों का जाना और पीढ़ियों तक चलने वाला घाव था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस दर्द को याद रखने के लिए 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस घोषित किया है। यह दिन बताता है कि स्वतंत्रता का उत्सव मनाते समय उन लोगों को नहीं भूलना चाहिए जिनकी जान गई, जिनके घर उजड़े और जिनकी स्त्रियों पर अत्याचार हुआ।

विभाजन अचानक नहीं हुआ। इसके बीज लंबे समय से पड़ रहे थे। अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो नीति ने हिंदू और मुसलमानों के बीच दूरी बढ़ाई। दो-राष्ट्र सिद्धांत ने कहा कि हिंदू और मुसलमान दो अलग कौमें हैं, इसलिए एक साथ नहीं रह सकते। मुस्लिम लीग की मांग और कांग्रेस की कुछ समझौतावादी चालों ने स्थिति और बिगाड़ी।
1946 के प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस के बाद हिंसा बढ़ गई। 3 जून 1947 को विभाजन की योजना घोषित हुई और बहुत जल्दी 15 अगस्त को सत्ता सौंप दी गई।

सीमा रेखा सिरिल रेडक्लिफ ने जल्दबाजी में खींची। नतीजा यह हुआ कि पंजाब और बंगाल में अफरा-तफरी मच गई। लोग अपने पुराने गांव, खेत, मंदिर, मस्जिद और पड़ोसियों को छोड़कर भागने लगे। हिंसा दोनों तरफ हुई। ट्रेनें लाशों से भरी आती थीं। गांव जल गए। अनुमान है कि दस से बारह लाख लोग मारे गए और करीब डेढ़ करोड़ लोग अपना घर छोड़कर दूसरे देश में शरणार्थी बने। सबसे दर्दनाक पहलू महिलाओं पर हुई हिंसा था। हजारों स्त्रियों का अपहरण हुआ, उन्हें जबरन धर्म बदलने पर मजबूर किया गया, बलात्कार हुआ और कई परिवारों ने अपनी बेटियों-बहनों को “इज्जत” बचाने के नाम पर मार दिया या आत्महत्या करने को कहा।

बाद में दोनों सरकारों ने कुछ महिलाओं को वापस लाने की कोशिश की लेकिन बहुत सी औरतें हमेशा के लिए खो गईं। उनकी कहानियां आज भी अधूरी हैं। इन्हीं बचे हुए सवालों पर बहुत कुछ लिखा गया है। फिर भी यह सवाल उभरता रहता है कि विभाजन क्यों अपरिहार्य बन गया, नेताओं ने कितनी जल्दबाजी की, आम आदमी की आवाज कहां दब गई और हिंसा इतनी संगठित कैसे हुई। पुस्तक महिलाओं पर हुए अत्याचार का भी विस्तार से विश्लेषण करती है। शुक्ला साहब दिखाते हैं कि विभाजन केवल राजनीतिक फैसला नहीं था।

वह समाज के अंदर बैठे डर, अफवाह और धार्मिक उन्माद का परिणाम भी था। इस ग़ैर कुदरती विभाजन के फिर भी कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं-क्या बंटवारे को रोका जा सकता था? क्या सीमा अधिक सोच-समझकर खींची जा सकती थी? क्या महिलाओं की सुरक्षा के लिए पहले से कोई व्यवस्था बन सकती थी? आज जब नई पीढ़ी आजादी का उत्सव मनाती है तब इन सवालों को याद रखना जरूरी है। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल शोक का दिन नहीं है। यह चेतावनी का दिन भी है। नफरत, सांप्रदायिक विभाजन और हिंसा किसी भी समाज को अंदर से तोड़ देती है।

भारत ने 1947 के बाद शरणार्थियों को बसाया, नए शहर बनाए और लोकतंत्र को मजबूत किया लेकिन घाव पूरी तरह भरा नहीं। सीमा के दोनों तरफ परिवार आज भी खोए रिश्तों की बात करते हैं। कुछ बूढ़े लोग अब भी उस गांव का नाम लेते हैं जो अब दूसरे देश में है। विभाजन के किस्से बयान करना व समझना बहुत जरूरी हैं। जब हम पढ़ते हैं कि एक परिवार ने रातभर पैदल चलकर सीमा पार की, या एक मां ने अपनी बेटी को भीड़ से बचाने के लिए खुद को आग लगा ली तो दिल बैठ जाता है। पुराने किस्से बताते हैं कि आंकड़े सूखे होते हैं, दर्द जिंदा रहता है।

देश को आगे बढ़ना है, लेकिन अतीत से आंखें बंद करके नहीं। विभाजन हमें सिखाता है कि एकता बनाए रखना कितना कठिन और कितना जरूरी है। मोदी सरकार द्वारा इस दिन को याद करने का निर्णय नई पीढ़ी को इतिहास का वह अध्याय पढ़ने का मौका देता है जो किताबों में अक्सर संक्षेप में लिखा जाता है। लेखकों का काम यह सुनिश्चित करता है कि शेष सवाल दब न जाएं। जब तक ये सवाल जीवित रहेंगे, समाज सावधान रहेगा। भारत ने बहुत कुछ खोया, लेकिन अपनी आत्मा नहीं खोई।

अब जरूरत है कि हम उस आत्मा को और मजबूत करें नफरत के बिना, विभाजन के सबक के साथ। विभाजन की त्रासदी हमें याद दिलाती है कि देश की एकता किसी एक समुदाय की जीत नहीं, सबकी साझी जिम्मेदारी है। 14 अगस्त को जब हम स्वतंत्रता दिवस की तैयारी करते हैं, उसी दिन उन लाखों अज्ञात चेहरों को भी प्रणाम करें जिन्होंने आजादी की कीमत अपनी जान, अपना घर और अपनी इज्जत से चुकाई। आजादी तथा विभाजन के बारे में पढ़ना और समझना हमारा कर्त्तव्य है, ताकि 1947 जैसी त्रासदी फिर कभी न दोहराई जाए।

फिरोज बख्त अहमद