मायावती की दलित राजनीति

Summary :

स्वतन्त्र भारत में हिन्दू समाज के अभिन्न अंग दलित वर्ग को लेकर चुनावी राजनीति की चौसर में सबसे बड़ा परिवर्तन 80 के दशक में तब आया जब स्व. कांशी राम ने बहुजन समाज पार्टी का गठन किया और खुलेआम जातिगत आधार पर दलित वर्ग के लोगों के वोट मांगे। इस दौर में पिछड़े समुदाय की भी एक पार्टी बनी जिसका नाम दूरदर्शी पार्टी था। यह पार्टी पिछड़े वर्ग में कोई खास असर नहीं दिखा सकी और समय के अनुसार हाशिये पर चली गई परन्तु कांशी राम की बहुजन समाज पार्टी ने सबसे बड़ा कमाल यह किया कि 90 का दशक…

स्वतन्त्र भारत में हिन्दू समाज के अभिन्न अंग दलित वर्ग को लेकर चुनावी राजनीति की चौसर में सबसे बड़ा परिवर्तन 80 के दशक में तब आया जब स्व. कांशी राम ने बहुजन समाज पार्टी का गठन किया और खुलेआम जातिगत आधार पर दलित वर्ग के लोगों के वोट मांगे। इस दौर में पिछड़े समुदाय की भी एक पार्टी बनी जिसका नाम दूरदर्शी पार्टी था। यह पार्टी पिछड़े वर्ग में कोई खास असर नहीं दिखा सकी और समय के अनुसार हाशिये पर चली गई परन्तु कांशी राम की बहुजन समाज पार्टी ने सबसे बड़ा कमाल यह किया कि 90 का दशक आते-आते देश की पारंपरिक सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस से उत्तर भारत में उसका आधारभूत वोट आधार छिन्न-भिन्न कर दिया।

क्योंकि यह माना जाता था कि कांग्रेस का मुख्य जनाधार अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग के अलावा अल्पसंख्यक समुदाय है। 90 के दशक में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद पिछड़े वर्ग का पृथक वोट आधार जमीन पर बना जिसकी उपज उत्तर प्रदेश में स्व. मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी व बिहार में लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल पार्टी थी। इसके साथ ही दक्षिण के कर्नाटक राज्य में श्री एच.डी. देवगौड़ा का जनता दल (एस) भी पिछड़े वर्ग के बूते पर खड़ा हुआ। इसे हम संयोग नहीं कह सकते कि उत्तर प्रदेश में नब्बे के दशक से लेकर आज तक कांग्रेस पार्टी कभी सत्ता पर बैठने में सफल नहीं हो सकी।

बिहार में लालू प्रसाद यादव ने डाॅ. लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का जनाधार समाप्त कर डाला और पिछड़े वर्ग की जातियों व अल्पसंख्यक समुदाय के समर्थन से सत्ता हासिल की। परन्तु इसके समानान्तर इन तीनों राज्यों में हिन्दू राष्ट्रवाद की समर्थक भारतीय जनता पार्टी भी मजबूत होती गई। हालांकि उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में 1967 में ही जनसंघ (भाजपा) मुख्य विपक्षी पार्टी बनकर उभरी थी। बिहार इसका अपवाद था क्योंकि यहां संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने यह रुतबा हांसिल किया था।

90 के दशक में अयोध्या में श्रीराम मन्दिर आन्दोलन चलने की वजह से हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण भाजपा की तरफ बढ़ता गया मगर इसी दौरान उत्तर प्रदेश में 1992-93 के विधानसभा चुनावों में स्व. कांशीराम व मुलायम सिंह यादव के बीच चुनावी गठबन्धन हुआ और इन्होंने बहुमत पाया। परन्तु यह गठबन्धन आगे सफलतापूर्वक नहीं चल सका। इसका मुख्य कारण ग्रामीण क्षेत्रों में दलित वर्ग के लोगों को हिकारत भरी नजरों से देखने की वह अमानवीय परंपरा थी जिसके कारण अनुसूचित समुदाय के लोगों को समाज में सबसे निचले पायदान पर रख कर देखा जाता था।

राजनीति में तब खासकर उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी व समाजवादी पार्टी के बीच अल्पसंख्यकों के वोट पाने की होड़ लग गई जिसकी वजह से इसके विरोध में हिन्दू एकता की अलम्बरदार भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में सकल हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण होता चला गया। इन समीकरणों के चलते कांग्रेस पार्टी लड़ाई से बाहर होती चली गई । परन्तु हम जानते हैं कि लोकतन्त्र में राजनीति में कभी ठहराव नहीं रहता है क्योंकि इस व्यवस्था में शासन का पर्याय न तो जातिवाद हो सकता है और न ही साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण।

अतः धीरे-धीरे लोगों का जातिवादी राजनीति से मोह भंग होने लगा और लोगों के दैनन्दिन जीवन की कठिनाइयों के मुद्दे सिर उठाने लगे। अतः हम देख रहे हैं कि पिछले कई चुनावों से वर्तमान में बहुजन समाज पार्टी की खेवनहार सुश्री मायावती का चुनावी ग्राफ लगातार रसातल की तरफ जा रहा है जबकि 2007 के चुनावों में इस पार्टी को अपने बूते पर पूर्ण बहुमत मिला था। गौर करने वाली बात यह है कि इन चुनावों के ठीक बाद उत्तर प्रदेश में 2012 में हुए चुनावों में समाजवादी पार्टी को अपने बूते पर पूर्ण बहुमत मिला। इसे हम भारत के ताने-बाने में रची हुई जातिगत प्रतिद्वन्द्विता के तौर पर भी देख सकते हैं।

परन्तु मायावती के रसातल में जाने की मुख्य वजह यह रही कि उन्होंने दलित वर्ग के वोटों को अपनी नकद रोकड़ा या रकम समझ लिया और वह इनके समर्थन का बैंक चेक काट कर अन्य दलों को देने लगीं। भारत के संविधान ने जिस एक वोट के प्रति व्यक्ति अधिकार को नागरिक की अपनी अस्मिता और गरिमा का अमूल्य पर्याय बनाया था उसे मायावती ने बैंक चेक में भरी जाने वाली रकम में तब्दील कर दिया और वह ताल ठोक कर बहुजन समाज पार्टी के चुनावी टिकटों का वितरण इसी आधार पर करने लगीं और राज्यसभा जैसे उच्च सदन में उद्योगपतियों को अपनी पार्टी की तरफ से भेजने लगीं।

इससे दलित वर्ग के लोगों में उनका दामन छोड़ कर अन्य दलों की तरफ जाने की ललक लगी। चूंकि दलितों की पारंपरिक पसन्द की पार्टी कांग्रेस स्वयं में उत्तर प्रदेश में लावारिस जैसी हो चुकी थी अतः उनकी पसन्द दबंग जातियों वाली पार्टी समाजवादी पार्टी के मुकाबले भारतीय जनता पार्टी बनी। परन्तु यह स्थायी व्यवस्था नहीं थी क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनावों में हमने देखा कि किस प्रकार अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों के वोट कांग्रेस पार्टी की तरफ झुके खासकर पूर्वी व मध्य उत्तर प्रदेश में। बेशक इन चुनावों में समाजवादी पार्टी व कांग्रेस का चुनावी गठबन्धन था परन्तु दलित मतदाताओं ने जातिगत आग्रहों से बाहर आकर मतदान किया।

दरअसल आजादी से पहले के स्वतन्त्रता संग्राम में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और बाबा साहेब अम्बेडकर के बीच जो भी मतभेद थे वे सभी बाबा साहेब को संविधान निर्माता बनाये जाने के बाद बहुत सीमित हो गये थे। बाबा साहेब चाहते थे कि हिन्दू समाज से जातिगत छुआछूत को जड़ से समाप्त करने के लिए हिन्दू नागरिक आचार संहिता लाई जाये। वह स्वतन्त्र भारत में हिन्दू कोड बिल नेहरू सरकार में कानून मन्त्री होते लाये भी मगर तब उसे संविधान सभा से परिवर्तित लोकसभा में समर्थन नहीं मिल सका और उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

मगर इसके बाद 1952 के पहले आम चुनावों में पं. जवाहर लाल नेहरू ने हिन्दू कोड बिल के पक्ष में ही कांग्रेसी विमर्श खड़ा करके चुनाव लड़ा। परन्तु वर्तमान दलित राजनीति दलित वोट आधार को बैंक चेक बनाकर की जाने लगी जिसका विरोध स्वयं दलितों की तरफ से ही हुआ। इसीलिए बहन मायावती हाशिये पर पहुंच गईं।

Aditya Chopra

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