फिर पलायन को मजबूर प्रवासी मजदूर

Summary :

देश में कोरोना की दूसरी लहर ने सभी रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं। बुधवार को दूसरी बार कोरोना के नए मामले आंकड़ा पार कर गए।

देश में कोरोना की दूसरी लहर ने सभी रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं। बुधवार को दूसरी बार कोरोना के नए मामले आंकड़ा पार कर गए। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि अगले चार सप्ताह काफी खतरनाक होंगे। यदि कोरोना के संक्रमण की रफ्तार नहीं रुकी तो हालात फिर पिछले वर्ष जैसे हो जाएंगे। अमेरिका के बाद भारत दूसरा ऐसा देश बन गया है, ​जहां एक दिन में एक लाख से अधिक संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं। राजधानी दिल्ली में बढ़ते मामलों को देखते हुए रात्रिकालीन कर्फ्यू लगा दिया गया है। सबसे चिंताजनक पहलु यह है कि महाराष्ट्र और दिल्ली से फिर मजदूरों का पलायन शुरू होने के संकेत मिलने लगे हैं। महाराष्ट्र के रेलवे स्टेशनों पर प्रवासी मजदूरों की भीड़ नजर आने लगी है। 
महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, पंजाब के हालात देखकर तो पलायन का संकट दोबारा उत्पन्न होने की आशंकाएं जोर पकड़ने लगी हैं। पिछले वर्ष जो तस्वीरें हमने देखी थीं, वे फिर से दिमाग में उतरने लगी हैं। लॉकडाउन के चलते जब यातायात सेवाएं ठप्प हो गई थीं तो प्रतिबंधों के चलते मजदूर पैदल ही हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घरों को लौटने शुरू हो गए थे। मजदूरों के पलायन की ऐसी ​तस्वीरें सामने आई थीं जिन्होंने मन को झकझोर दिया था। कई तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई थीं, जिसमे एक व्यक्ति बैल के साथ खुद बैलगाड़ी को खींच रहा था और ऐसी तस्वीर सामने आई थी जिसमें दिल्ली से महोबा के लिए निकले मजदूर के परिवार में शा​मिला  बच्चा जब पैदल चलता-चलता थक गया तो वह सूटकेस पर ही सो गया और उसकी मां सूटकेस खींचते हुए ​दिखी थी। कई मजदूरों की घर लौटते समय मृत्यु हो गई। इन तस्वीरों ने महामारी के दौरान व्यवस्था और श्रमिकों की लाचारगी पर बहुत से सवाल खड़े कर दिए थे। विभाजन के बाद भारत में हुआ यह सबसे बड़ा विस्थापन था। सिर पर बैग रखे, कमर पर बच्चों को टिकाए, यही जीवन भर की कमाई लेकर मजदूर शहरों से गांव लौट रहे थे तो प्रख्यात कवि और गीतकार गुलजार ने एक सामयिक कविता लिखी थी-
‘‘महामारी लगी थी,
घर को भाग लिए थे मजदूर, कारीगर
मशीनें बंद होने लग गई थीं शहर की सारी
उन्हीं के हाथ-पावों चलते रहते थे
वर्ना जिन्दगी तो गांव में ही बो कर आए थे,
चलो अब घर चलें और चल दिए सब,
मरेंगे तो वहीं जाकर जहां पर जिन्दगी है।’’
मजदूरों का पलायन दोबारा शुरू हुआ तो अब भी उनका यही कहना है कि भूखे मरने से अच्छा अपने घरों को लौट जाएं। 
राजधानी में नाइट कर्फ्यू लगाए जाने के बाद लोग फिर खौफजदा हो चुके हैं। बच्चों की परीक्षाएं नजदीक हैं, लोग बच्चों को जोखिम में नहीं डालना चाहते। अब सवाल यह है कि क्या ‘नाइट कर्फ्यू’ कोरोना संक्रमण पर काबू पाने के लिए कारगर कदम है। सोशल मीडिया पर एक सवाल उठ रहा है। ‘‘भीड़ तो दिन में होती है तो क्या कोरोना रात में ही आता है।’’ केवल यह मान लेना कि लोग रात को निकल कर होटल, रेस्त्राओं या बार आदि में पार्टी करते हैं तो ऐसी जगहों पर सतर्कता एवं सख्ती बढ़ाने की जरूरत है। अगर फुल लॉकडाउन होता है तो आर्थिक व्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा, क्योंकि अभी तक तो लोग सम्भल ही नहीं पाए हैं, परन्तु जान है तो जहान है।
कोरोना संक्रमण बेलगाम इसलिए हुआ क्योंकि ट्रेनों, बसों, सब्जी मंडियों, साप्ताहिक बाजारों आदि में लोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग को छोड़ दिया और न ही मास्क का इस्तेमाल करते हैं। जिन्होंने मास्क पहन रखा है, वह भी महज दिखावे के लिए। उनके मास्क नाक के नीचे लटकते नजर आते हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने कोरोना मामलों में अचानक वृद्धि की वजह बड़ी-बड़ी शादियों,  स्थानीय निकाय चुनाव, बड़े प्रदर्शनों के दौरान कोविड प्रोटोकॉल का पालन ना करना शामिल है। पिछले वर्ष तो हमारे पास वैक्सीन भी नहीं थी और सभी नियमों का पालन करने के कारण केस कम हो गए थे। अब तो देश में एक दिन में 70 लाख लोगों को टीका लगाने की उपलब्धियां हासिल की जा चुकी हैं। फिर भी अगर संक्रमण बढ़ रहा है तो इसके पीछे कहीं न कहीं हमारी लापरवाही बड़ी वजह है और महामारी से जंग में यही सबसे बड़ी बाधा बन गई है। चुनावी राज्यों में तो स्थिति गम्भीर है। 
अब नवरात्र पर्व और बैसाखी पर्व आ रहा है। बीते वर्ष हमने देखा था कि नवरात्र-दीवाली आदि के बाद संक्रमण में तेजी आई थी। सतर्कता के साथ पर्व मनाना हमारी सामाजिक जिम्मेदारी भी है। समाज में वर्गभेद की दीवारों को तोड़ने वाले पर्वों को हमें सतर्कता की दीवारों के बीच मनाना होगा, जो समय की मांग है। यदि हमने लापरवाही बरती तो कोरोना का नया वैरियर पिछले वर्ष के मुकाबले कई गुना तेजी से फैल सकता है। नवरात्र में लोग व्रत रखते है यानी बेहतरी के लिए त्याग करते हैं। अच्छा यही होगा कि हम इस राष्ट्र के लिए त्याग करें और घर के भीतर रहकर आराधना करें। उन इलाकों में जाने से बचें जहां कोरोना तेजी से फैल रहा है। अगर हम कोविड-19 के नियमो का पालन करते हैं तो ही हम व्यवस्था पर सवाल उठाने के अधिकारी हैं। यदि हम खुद ही अपना बचाव नहीं कर रहे तो फिर व्यवस्था पर सवाल उठाना उचित नहीं। अगर केस बढ़े तो एक बार फिर अस्पतालों में बेड की कमी पड़ जाएगी। स्थिति काफी चिंताजनक है, इसलिए अभी लोगों को संयम से काम लेना होगा। महामारी को रोकने के लिए सरकार के साथ जनता की भागीदारी की जरूरत है।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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