भारत के चुनाव आयोग ने अभी तक जिन राज्यों व केन्द्र प्रशासित क्षेत्रों में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण का कार्य पूरा किया है उनमें कुल पांच करोड़ 58 लाख मतदाता अवैध पाये गये हैं। इनमें सर्वाधिक दो करोड़ पांच लाख मतदाता उत्तर प्रदेश के हैं। हालांकि प्रतिशतता के हिसाब से सबसे ज्यादा 13.40 प्रतिशत मतदाता गुजरात राज्य के कम हुए हैं। मगर इस प्रदेश की आबादी उत्तर प्रदेश के मुकाबले कम है इस वजह से मतदाताओं की संख्या उत्तर प्रदेश के मुकाबले कम है क्योंकि उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची से बाहर हुए मतदाताओं का प्रतिशत 13.23 है। हालांकि चुनाव आयोग ने यह गहन पुनरीक्षण दो चरणों में पूरा किया है क्योंकि बिहार राज्य में पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनावों से पूर्व ही पुनरीक्षण का कार्य पूरा कर लिया गया था। इस प्रकार कुल दस राज्यों व तीन केन्द्र प्रशासित क्षेत्रों में चुनाव आयोग ने पुनरीक्षण का काम किया। इनमें उत्तर प्रदेश की बड़ी आबादी को देखते हुए दूसरे चरण का काम सबसे बाद में 10 अप्रैल तक पूरा हो सका।
सवाल यह है कि एक तरफ जब देश की आबादी लगातार बढ़ रही है तो दूसरी ओर मतदाताओं की संख्या कम क्यों हो रही है? इसका तार्किक उत्तर चुनाव आयोग यह दे रहा है कि पिछला विशेष पुनरीक्षण का कार्य 20 साल पहले हुआ था और इस बीच भारत की जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी) में खासा अन्तर आया है। भारी संख्या में लोगों का गांवों से शहरों की तरफ पलायन हुआ है। लोग रोजी-रोटी की तलाश में बड़े शहरों की तरफ जाते रहते हैं मगर उनके मतदाता कार्ड पुराने पते पर ही बने रहते हैं। साथ ही लोगों की मृत्यु होने के बावजूद उनके नाम मतदाता सूचियों में बने रहते हैं और बड़ी संख्या में लोग पुराने स्थान के मतदाता बने रहते हुए भी अपने नये स्थानों पर भी मतदाता बन जाते हैं। पुनरीक्षण में आयोग ने एेसी सभी विसंगतियों को दूर करने का प्रयास किया है। मगर मतदाताओं के घटने का एक कारण और भी माना जा रहा है कि चुनाव आयोग ने पहली बार मतदाताओं की नागरिकता की जांच के लिए आवश्यक सरकारी कागजात भी मांगे। इस मामले में आयोग को देश के विपक्षी दलों की भारी आलोचना का शिकार भी होना पड़ा और यह समस्या सर्वोच्च न्यायालय तक भी पहुंची। जहां से मतदाताओं को कुछ राहत मिली क्योंकि न्यायालय ने लोगों के आधारकार्ड को उनकी पहचान का सबूत मानने का निर्देश दिया। इसके बावजूद प. बंगाल जैसे राज्य में मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर वहां की तृणमूल कांग्रेस की ममता दीदी की सरकार चुनाव आयोग को निशाने पर ले रही है और कह रही है कि चुनाव आयोग इस राज्य में भेदभावपूर्ण तरीके से काम कर रहा है और केन्द्र में शासन करने वाली पार्टी भाजपा के साथ मिल कर मनमानी कर रहा है। मगर सर्वोच्च न्यायालय में ममता दी अपने आरोपों को सही साबित करने में असफल रही है।
बंगाल में शुरू में आयोग ने 90 लाख मतदाताओं के नाम उड़ा दिये थे मगर न्यायालय के आदेशों पर न्यायायिक हस्तक्षेप के बाद इनमें कमी आयी और यह संख्या घटकर 27 लाख रह गई परन्तु ये 27 लाख मतदाता भी दावा कर रहे हैं कि उनके पास जरूरी दस्तावेज होने के बावजूद उनका नाम सूची से बाहर कर दिया गया है। अतः अभी तक जिन दस राज्यों व तीन केन्द्र प्रशासित क्षेत्रों में पुनरीक्षण का काम हुआ है उनमें प. बंगाल का मामला पूरी तरह अलग है। इस मामले में हमें रोज नया विवाद भी सुनने को मिलता रहता है जो कि भारत के लोकतन्त्र के लिए किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता क्योंकि लोकतन्त्र का असली मालिक मतदाता ही होता है। चुनावों के मामले में संविधान उसे स्वयंभू बनाता है और उसके द्वारा दिये गये मत को पूर्णतः गुप्त रखता है। इसके समानांतर भारत का चुनाव आयोग पूरी तरह स्वतन्त्र व निष्पक्ष संस्था के रूप में संविधान में प्रतिष्ठापित किया गया है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह खुद को पूरी तरह ‘अराजनैतिक’ रखते हुए देश की दलगत राजनीतिक प्रणाली का नियमन करता है और संसदीय लोकतान्त्रिक प्रणाली की सबसे बड़ी जिम्मेदारी चुनावों को कराता है। अतः इसकी निष्पक्षता सभी राजनीतिक दलों के नजर में हर हालत में शक से ऊपर रहनी चाहिए। मगर हम देख रहे हैं कि इसमें कमी आयी है क्योंकि पिछले दिनों देश के विपक्षी दलों की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग चलाने के प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों के विचारार्थ रखा गये थे। ये प्रस्ताव हालांकि अस्वीकृत हो गये हैं मगर विपक्षी दल इसे जल्दी ही सर्वोच्च न्यायालय ले जाने की कोशिश में जुट गये हैं।
खैर यह कानूनी पेचीदगियों का मसला है मगर जहां तक आम मतदाता का सवाल है तो उसके मन में यह शंका जरूर उभरी है कि कहीं उसके मत देने के अधिकार को तो चुनाव आयोग खतरे में नहीं डाल रहा है। बिना हिचक कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग की मंशा एेसी बिल्कुल नहीं है, वह केवल सूची का कड़ा शुद्धिकरण कर रहा है जिसका संविधान उसे अधिकार देता है। संविधान कहता है कि केवल भारत का नागरिक ही मतदाता बन सकता है अतः इस बारे में आयोग यदि तसदीक करता है तो उस पर आपत्ति करना सूची को अशुद्ध बनाये रखने जैसा ही माना जायेगा। इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जिन दस राज्यों व तीन केन्द्र प्रशासित क्षेत्रों में पुनरीक्षण का काम हुआ है उनमें कुल 10.55 प्रतिशत मतदाता कम हुए हैं। बेशक इनमें से बहुतायत दोहरी मतदाता सूची वाले या एक स्थान से दूसरे स्थान को पलायन करने वाले ही रहे होंगे मगर आयोग ने इन्हें इस सम्बन्ध में आवश्यक प्रमाण देने का समय भी तो प्रदान किया था। फिर भी चुनाव आयोग को यह देखना होगा कि एक भी जायज मतदाता छूटने न पाये क्योंकि लोकतन्त्र में एक वोट का महत्व भी कम नहीं होता। इस बारे में भी उदाहरण भरे पड़े हैं जबकि एक वोट से भी हार-जीत तय हो जाती है।


















