एक बिल और अनेक वोट

एक बिल और अनेक वोट

सरकार के लिए 25 मार्च, संभवतः, विदेशी फंडिंग के संदर्भ में एक नई शुरूआत का प्रतीक होता। यह उस विधेयक के कारण था जिसे सरकार संसद में पेश कर उस पर चर्चा करना चाहती थी। हालांकि, घटनाक्रम में अचानक मोड़ आया और इस पर चर्चा को स्थगित करने का निर्णय लिया गया। यह कदम रणनीति का हिस्सा था या आगामी राज्य चुनावों पर संभावित प्रभाव को देखते हुए लिया गया, यह अभी भी बहस का विषय बना हुआ है। इस महीने असम, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इनमें से इस महीने के अंत में चुनाव होने वाले राज्यों में केरल में ईसाई समुदाय की संख्या उल्लेखनीय है और वह चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है।

ऐसे में, जबकि सरकार यह कह रही है कि विधेयक को स्थगित करना केवल “विधायी प्राथमिकता” के कारण था, जैसा कि संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा, न कि चुनावी राजनीति के चलते। महत्वपूर्ण राज्य केरल में 9 अप्रैल को मतदान हुआ है और यह सर्वविदित है कि मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भाजपा दक्षिणी राज्य केरल में “किसी बड़ी सफलता के लिए बेताब” है। साथ ही, वह काफी समय से ईसाई समुदाय को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में इस महत्वपूर्ण समय पर समुदाय की ओर से किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया या विरोध का सामना करना भगवा पार्टी के लिए न तो संभव है और न ही वह ऐसा जोखिम उठा सकती है।

इसी कारण, कहने का तात्पर्य है कि विधेयक को अस्थायी रूप से रोक दिया गया। प्रस्तावित विधेयक, जिसे चर्चा के लिए पेश किया जाना था लेकिन स्थगित कर दिया गया, ने राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाज़ी शुरू हो गई, जहां विपक्ष ने संसद परिसर में विरोध- प्रदर्शन किया। उन्होंने विधेयक को वापस लेने की मांग की। उनकी शिकायतें थीं विधायी शक्तियों का अत्यधिक हस्तांतरण, कठोर कानून को थोपने का प्रयास, सरकार की आलोचना करने वाले एनजीओ और संगठनों के खिलाफ इसके चयनात्मक उपयोग का खतरा, तकनीकी या मामूली त्रुटियों पर भी सरकार को संपत्ति जब्त करने का अधिकार, संशोधनों को जबरन पारित करने की कोशिश, पारदर्शिता से जुड़ी चिंताएं आदि।

अंतिम बिंदु पर लाइसेंस रद्द किए जाने से संबंधित आंकड़े प्राप्त करने और एफसीआरए डैशबोर्ड तक पहुंचने के प्रयास विफल रहे हैं। सरकार का कहना है कि एफसीआरए विधेयक का उद्देश्य पारदर्शिता सुनिश्चित करना है और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लाया जा रहा है। तर्क-वितर्क से इतर, यह विधेयक विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 में संशोधन करने का प्रस्ताव रखता है। रिकॉर्ड के लिए, एफसीआरए, 2010 एक ऐसा कानून है जिसे व्यक्तियों, संघों और कंपनियों द्वारा विदेशी अंशदान या आतिथ्य को स्वीकार करने और उसके उपयोग को विनियमित करने के लिए बनाया गया है।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का उपयोग राष्ट्रीय हित के प्रतिकूल गतिविधियों को प्रभावित न करे। इस कानून के तहत एनजीओ को विदेशी धन प्राप्त करने के लिए गृह मंत्रालय में पंजीकरण कराना अनिवार्य है। संशोधन में प्रस्तावित सबसे बड़ा बदलाव “नामित प्राधिकरण” का गठन है। यह प्राधिकरण एनजीओ का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त होने, रद्द होने या स्वेच्छा से समर्पित किए जाने की स्थिति में उनके विदेशी धन और संपत्तियों पर अस्थायी या स्थायी नियंत्रण ले सकेगा। व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ यह होगा कि विदेशी दान से आंशिक रूप से बने स्कूल, अस्पताल, छात्रावास या कल्याण केंद्र सरकार के नियंत्रण में लिए जा सकते हैं। किसी भी बिक्री या हस्तांतरण से प्राप्त धन भारत की संचित निधि में जाएगा, जो केंद्र सरकार का प्रमुख खाता है।

सरकार का मत है कि यह कानून विदेशी धन के दुरुपयोग पर रोक लगाएगा, खामियों को दूर करेगा और किसी एनजीओ का लाइसेंस समाप्त होने की स्थिति में विदेशी वित्तपोषित संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करेगा। सरकार का यह भी कहना है कि यह विधेयक ऐसे परिसंपत्तियों की निगरानी और निपटान के लिए एक उचित ढांचा तैयार करता है। गृह मंत्रालय के अनुसार, वर्तमान में लगभग 16,000 संगठन एफसीआरए के तहत पंजीकृत हैं और सामूहिक रूप से हर वर्ष करीब 22,000 करोड़ रुपये की विदेशी धनराशि प्राप्त करते हैं। ऊपरी तौर पर यह तर्कसंगत, आवश्यक और स्पष्ट रूप से सद्भावनापूर्ण प्रतीत होता है लेकिन विपक्ष इससे सहमत नहीं है।

जहां केंद्र का तर्क है कि मौजूदा कानून यह स्पष्ट नहीं करता कि किसी एनजीओ का लाइसेंस समाप्त होने पर विदेशी वित्तपोषित संपत्तियों का क्या होता है, वहीं विपक्ष का कहना है कि यह कानून अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर ईसाइयों द्वारा संचालित संस्थानों को प्रभावित करेगा। यही इस पूरे विवाद का मुख्य बिंदु प्रतीत होता है। तथ्य यह है कि केंद्र द्वारा विधेयक को स्थगित करना इसे एक प्रक्रियात्मक आवश्यकता से अधिक राजनीतिक मजबूरी की ओर संकेत करता है। दरअसल, यदि संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के बयान को आधार माना जाए, तो विधेयक इसलिए नहीं लाया जा सका क्योंकि विपक्षविशेष रूप से कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने चुनावों को ध्यान में रखते हुए केरल के लोगों को “गुमराह” किया।

इसे केरल के चर्च नेताओं की उस चेतावनी के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि यह विधेयक पारित होता है तो विदेशी दान से बने स्कूल, अस्पताल और परोपकारी संस्थाएं सरकारी नियंत्रण में आ सकती हैं। केरल में विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र यह विवाद एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी सीपीआई (एम) और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने प्रस्तावित विधेयक का कड़ा विरोध किया है और भाजपा पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का आरोप लगाया है।

विपक्ष के शोर-शराबे से अधिक महत्वपूर्ण केंद्र सरकार का विधेयक को स्थगित करने का फैसला है, या यूं कहें कि उसे फिलहाल रोक देना। क्या यह संभावित जन-विरोध के डर से किया गया या चुनावी राज्य केरल में राजनीतिक नुक्सान से बचने के लिए? यह सर्वविदित है कि केरल, जिसे अब ‘केरलम’ कहा जाता है, भाजपा के लिए चुनावी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। राज्य में उसकी सीमित उपस्थिति और 15 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर को सीटों में बदलने में बार-बार असफलता भी एक सच्चाई है जिसे बदलने की वह लगातार कोशिश कर रही है।

ऐसे में केरल जैसे महत्वपूर्ण राज्य में ईसाई वोट का महत्व और विवादित विधेयक पर पीछे हटने का कदम, जिसे ईसाई समुदाय के नेताओं ने आलोचना का विषय बनाया है, विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है। केरल की जनसंख्या में ईसाइयों की हिस्सेदारी लगभग 18% है। कोट्टायम, इडुक्की और एर्नाकुलम जैसे जिलों में उनका खासा प्रभाव है। यदि भाजपा इन क्षेत्रों में ईसाई मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में सफल होती है तो वह इस महत्वपूर्ण राज्य में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की उम्मीद कर सकती है।

इस पृष्ठभूमि में यदि भाजपा ने केरल विधानसभा चुनावों से पहले एफसीआरए विधेयक को आगे बढ़ाया होता तो यह उसके लिए उल्टा पड़ सकता था। इसी कारण विधेयक को स्थगित करने का निर्णय लिया गया लेकिन इस बिंदु पर एक सवाल उठता है: क्या इससे वास्तव में कोई फायदा होगा? विदेशी फंडिंग को निशाना बनाकर क्या भाजपा ने मतदाताओं को यह संकेत नहीं दे दिया है कि वह मौजूदा स्थिति को बदलना चाहती है? यदि इसका उत्तर ‘हां’ है तो विधेयक को स्थगित करना केवल एक औपचारिकता और दिखावा मात्र है।

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