सिख धर्म में गुरु ग्रन्थ साहिब केवल एक धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि जीवित गुरु का स्वरूप माना जाता है। यह आस्था, मर्यादा और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र है। ऐसे में इसके अपमान की कोई भी घटना न केवल धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाती है, बल्कि समाज की मूलभूत संवेदनशीलता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। पिछले कुछ वर्षों में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी (अपमान) की घटनाओं ने चिंता को और गहरा किया है। यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक पतन का संकेत भी है।
किसी भी धर्म के पवित्र ग्रंथ या प्रतीक का अपमान सभ्य समाज में कदापि स्वीकार्य नहीं हो सकता लेकिन जब बात सिखों के सर्वाेच्च गुरु की हो तो यह संवेदनशीलता और भी अधिक बढ़ जाती है। इतिहास गवाह है कि गुरुओं और उनके सिखों ने अपने धर्म और मर्यादा की रक्षा के लिए सर्वाेच्च बलिदान दिए हैं। ऐसे में गुरु ग्रंथ साहिब का अपमान केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस पूरी परंपरा और त्याग का अपमान है, जिसने मानवता, समानता और सेवा का संदेश दिया। यह भी उतना ही जरूरी है कि इस मुद्दे को केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया तक सीमित न रखा जाए। सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि ऐसी घटनाओं की निष्पक्ष और त्वरित जांच हो, दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिले और भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
पंजाब की भगवंत मान सरकार के द्वारा बेअदबी पर कानून बनाने हेतु पहल की गई है जिसके बाद अकाली दल बादल को लगा कि अगर सरकार ने कोई सख्त कानून बना दिया तो आने वाले समय में उसके लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं, क्योंकि आज तक देखा गया है अपने वोट बैंक के लिए अकाली दल के नेता निरन्तर डेरों का रुख समय-समय पर करते आए हैं और उन्हीं डेरों पर बेअदबी की घटनाओं को अंजाम देने के आरोप भी लगते रहे हैं।
इसी के चलते ही अकाली दल ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी जिस पर आज दिन तक अकाली दल का ही कब्जा है, उसके माध्यम से आनन-फानन में देशभर से सिख बुद्धिजीवियों और धार्मिक संस्थानों की एकत्रता करवाई, मगर इसमें दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी, हरियाणा गुरुद्वारा कमेटी और उन संस्थाओं को जिनका अकाली दल को लगता है कि उनकी विचारधारा उनसे मेल नहीं खाती उन्हें शामिल करना मुनासिब नहीं समझा जो कि दर्शाता है कि शिरोमणि गुरुद्वारा कमेटी की मंशा बेअदबी रोकने की ना होकर केवल राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति ही लगती है।
यह भी वर्णन योग्य है कि बेअदबी की घटनाएं कोई आज तो हुई नहीं लम्बे समय से होती आ रही हैं, एक डेरावादी ने गुरु गोबिन्द सिंह जी की भान्ति रूप बनाकर अमृतपान भी उसी प्रकार करवाने का ढोंग रचा मगर उस समय पंथक नेताओं ने उस पर सख्त कार्यवाही के बजाए बिना पेश हुए माफी भी दे दी गई। तब से लेकर आज तक निरन्तर इस तरह की घटनाएं कहीं ना कहीं होती रहती हैं, पर आज तक शिरोमणि कमेटी ने किसी कानून की बात नहीं कही। वैसे आंकड़ों पर गौर फरमाए तो बेअदबी की अधिक घटनाए पंथक कहलाने वाली अकाली सरकार के समय ही अधिक हुई जो आज तक होती आ रही हैं और अगर इसी प्रकार चलता रहा तो शायद आगे भी हो सकती हैं जिसके लिए सख्त कानून बनाना अति आवश्यक है।
शिरोमणि कमेटी की कार्यशैली से श्रद्धालु दुविधा में : खालसा साजना दिवस वैसाखी पर हर साल की तरह इस बार भी श्रद्धालुओं का जत्था पाकिस्तान के गुरधामों के दर्शनों के लिए जाने वाला है। हालांकि दोनों देशों के सम्बन्धों में खटास के चलते यह मुमकिन नहीं था कि जत्था पाकिस्तान भेजा जाए मगर फिर भी भारत के गृह मंत्रालय के द्वारा सिख समुदाय की भावनाओं की कदर करते हुए दिनांक 2 मार्च को 3000 श्रद्धालुओं के जत्थे को मंजूरी देने की घोषणा करते हुए 15 मार्च तक लिस्ट जारी करने को कहा। शिरोमणि गुरुद्वारा कमेटी सर्वोच्च है इसलिए उसके द्वारा ही प्रोग्राम की रूपरेखा तैयार की जाती है।
कमेटी ने पंजाब सरकार के माध्यम से 12 अप्रैल से 21 अप्रैल तक का प्रोग्राम बनाकर गृह मंत्रालय के पास भेज दिया जिसके बाद गृह मंत्रालय ने इसे मंजूर कर दिया मगर इसी बीच पाकिस्तान सरकार के द्वारा भारत सरकार के विपरीत जाकर 10 से 19 अप्रैल तक का वीजा दिया गया। अब शिरोमणि गुरुद्वारा कमेटी की पाकिस्तान सरकार से क्या नजदीिकयां हैं, अकाली नेताओं के क्या सम्बन्ध हैं। पाकिस्तान से यह तो कहा नहीं जा सकता मगर उन्होंने 27 मार्च को पंजाब सरकार को एक पत्र लिखा जिसमें पाकिस्तान के अनुसार तारीखों में बदलाव करते हुए 10 अप्रैल को जत्था भेजने की बात कर दी।
पंजाब सरकार ने उस पत्र को गृह मंत्रालय को भेज दिया। ऐसे में श्रद्धालु पूरी तरह से दुविधा में हैं कि वह किस तारीख को जाएंगे। दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी के विदेश मामलोें के सलाहकार परमजीत सिंह चंडोक ने साफ कर दिया था कि उनकी कमेटी भारत सरकार के दिशा निर्देश पर ही कार्यक्रम तय करेगी। इसी बीच 6 अप्रैल शाम को गृृह मंत्रालय ने सिख भावनाओं को समझते हुए 10 से 19 की मंजूरी दे दी जिसके बाद श्रद्धालुओं ने राहत की सांस ली। मगर सवाल यह उठता है कि शिरोमणि कमेटी ऐसी दुविधा पैदा ही क्यों करती है, क्यों पहले से तालमेल करते हुए प्रोग्राम नहीं बनाया जाता।
वहीं जत्थे में अकेली महिला के जाने पर भी शिरोमणि कमेटी ने पाबंदी लगा दी थी मगर अब उससे भी पीछे हटते हुए किसी तरह की पाबंदी से इंकार कर दिया है। पिछली बार जत्थे में से सरबजीत कौर नामक महिला के जत्थे से अलग होकर पाकिस्तान में रहने और इस्लाम कबूलने के बाद यह पाबंदी लगाई गई थी। इस तरह की घटनाएं शिरोमणि कमेटी की कार्यशैली पर कई तरह के सवाल खड़े करती हैं।


Download Android App
Download iOS App




