पंजाब गुरुओं, पीरों की धरती है। जिसने देश, धर्म की रक्षा के लिए बलिदान देने वाले वीर सपूत पैदा किए। पंजाब की पहचान कभी किसी के सामने हाथ फैलाने वाले राज्य की नहीं, बल्कि मेहनत, बहादुरी, खुशहाली, सेवा और आत्मसम्मान की रही है। मगर आज पंजाब की युवा पीढ़ी इतनी समृद्ध विरासत, संसाधन होने के बावजूद ना जाने किस दिशा में निकल पड़ी हैं? पंजाब के सामने चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन क्षमता खत्म नहीं हुई है। जरूरत है तो युवाओं को सही दिशा देने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और राज्य की आर्थिक शक्ति को मजबूत करने की ताकि युवा वर्ग विदेशों का रुख भूलकर पंजाब में ही अपना भविष्य उज्जवल बनाए। युवाओं की इसी कमजोर नब्ज को खालिस्तानी संगठन पहचान चुके हैं जो उन्हें विदेश ले जाकर अच्छी नौकरी का ख्वाब दिखाकर उन्हें अपने प्रभाव में ले लेते हैं और बाद में उनसे खालिस्तानी प्रचार, भारत विरोधी नारेबाजी या गैरकानूनी गतिविधियों में भाग लेने के लिए मजबूर कर दिया जाता है।
विदेश जाना कोई अपराध नहीं है। दुनियाभर में पंजाबी और सिख समुदाय ने अपनी मेहनत, व्यापार, शिक्षा, सेवा और उद्यमशीलता से सम्मान अर्जित किया है। विदेशों में रहने वाले लाखों पंजाबी भारत और पंजाब का नाम रोशन कर रहे हैं। लेकिन विदेश जाने के नाम पर युवाओं को झूठे रोजगार के वादों में फंसाना, उन्हें आर्थिक रूप से असहाय छोड़ देना और फिर उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर किसी विचारधारा के प्रचार में इस्तेमाल करना एक गंभीर चिंता का विषय है। यदि किसी युवा को भोजन, रहने की जगह या आर्थिक सहायता देने के बदले खालिस्तानी गतिविधियों में शामिल होने का दबाव झेलना पड़ता है, तो यह सेवा नहीं, बल्कि शोषण का मामला बन जाता है। ऐसे आरोपों की जांच होनी चाहिए और यदि वे प्रमाणित होते हैं, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि कुछ व्यक्तियों की गतिविधियों को दिखाकर पंजाब और पूरे सिख समुदाय की छवि को खालिस्तानी समर्थक के रूप में पेश करने की कोशिश की जा रही है जो पूरी तरह से अनुचित है। साथ ही उन करोड़ों सिखों के योगदान की अनदेखी भी है, जिन्होंने देश की आजादी, सुरक्षा, कृषि, उद्योग और समाज सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सिख धर्म की पहचान मानवता, सरबत दा भला, सेवा, समानता और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की परंपरा से जुड़ी है। किसी उग्रवादी विचारधारा को पूरे सिख समुदाय की आवाज बताना वास्तविकता को गलत तरीके से प्रस्तुत करना होगा।
पंजाब की जवानी किसी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का औजार नहीं बननी चाहिए। जो युवा खेतों में आधुनिक खेती कर सकता है, उद्योग खड़ा कर सकता है, तकनीक में नई उपलब्धियां हासिल कर सकता है और देश-दुनिया में पंजाब का नाम रोशन कर सकता है, उसकी ऊर्जा को नशे, बेरोजगारी, धोखाधड़ी और उग्रवादी गतिविधियों में उलझने से बचाना पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
गुरुद्वारों को राजनीति का अखाड़ा न बनाया जाए
गुरुद्वारा बंगला साहिब जैसे ऐतिहासिक धार्मिक स्थल सेवा, श्रद्धा और मानवता की भावना के प्रतीक हैं। इसलिए गुरुद्वारा साहिब आने वाले किसी जरूरतमंद को शरण देना या उसे लंगर खिलाना सिख परंपरा का स्वाभाविक हिस्सा है मगर आजकल जिस प्रकार से गुरुद्वारा बंगला साहिब को लेकर एक राजनीतिक पार्टी के नेताओं के द्वारा राजनीति की जा रही है उसे कोई भी सिख कतई बर्दाशत नहीं कर सकता। मामला उस समय तूल पकड़ गया जब जंतर मंतर पर चलने वाले प्रदर्शनकारियों के द्वारा पुलिस से बचने के लिए गुरुद्वारा बंगला साहिब में शरण ली गई, यहां तक किसी को ऐतराज नहीं हो सकता मगर उसी दौरान उन्होंने गुरुद्वारा परिसर में ही सरकार के खिलाफ नारेबाजी शुरु कर दी गई जिसे रोकने के काफी प्रयास गुरुद्वारा साहिब के स्टाफ के द्वारा किए मगर वह मानने को तैयार ही नहीं थे, यह तो भला हो स्टाफ का जिसने प्रदर्शनकारियों को गुरुद्वारा साहिब की सीढ़ियों तक नहीं पहुंचने दिया। वहीं सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुई जिसमें राजनीतिक पार्टी के नेता प्रदर्शनकारियों को दिशा निर्देश देते दिखाई दे रहे हैं जिससे साफ हो जाता है कि यह किसी सोची समझी रणनीति के तहत गुरुद्वारा साहिब में दाखिल हुए थे जिसके चलते गुरुद्वारा प्रबन्धकों ने पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई है।
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू सोशल मीडिया पर फैली उस चर्चा का है, जिसमें दावा किया गया कि पुलिसकर्मी गुरुद्वारा बंगला साहिब में नंगे सिर और जूते पहनकर प्रवेश कर गए। जिसे लेकर उसी राजनीतिक पार्टी के नेताओं के द्वारा प्रबन्धक कमेटी के खिलाफ मोर्चा खोला गया। वहीं प्रबन्धकों की ओर से स्पष्टीकरण सामने आया कि पुलिसकर्मी गुरुद्वारा परिसर के एक प्रवेश मार्ग से आए और दूसरे मार्ग से बाहर निकले तथा जिस रास्ते से वे गुजरे, वहां श्रद्धालुओं के लिए जूते पहनकर या सिर ढके बिना आने-जाने की अनुमति रहती है।
बावजूद इसके प्रबन्धकों ने पुलिस के आला अधिकारियों से भविष्य में ऐसा ना करने की अपील की है। दुखद बात यह है कि आज सोशल मीडिया के दौर में कई बार लोग किसी घटना के कुछ सेकंड के वीडियो को देखकर ही फैसला सुना देते हैं। पूरी घटना क्या थी, संबंधित व्यक्ति वहां क्यों आया था, किस रास्ते से प्रवेश हुआ, क्या नियम लागू थे और वास्तव में किसने क्या कहा, इन सवालों की पड़ताल किए बिना आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं। धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में ऐसी जल्दबाजी और भी खतरनाक हो सकती है, क्योंकि यहां लोगों की आस्था और भावनाएं जुड़ी होती हैं। वहीं पंजाब सरकार के विधायकों ने मामला श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार साहिबान के संज्ञान में लाने हेतु एक शिकायत पत्र दिया है पर शायद वह भूल गए कि उनकी सरकार के रहते 2023 में पंजाब पुलिस सुल्तानपुर लोधी के गुरुद्वारा अकाल बुंगा साहिब में पुलिसकर्मी जूते और हथियारों सहित ना सिर्फ दाखिल हुए थे बल्कि गोलीबारी भी की गई थी। शायद उस समयं इन लोगों को बेअदबी दिखाई नहीं दी।
पाकिस्तान के इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड की नियुक्तियों पर विवाद
पाकिस्तान में सिखों और हिंदुओं के ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों तथा उनकी संपत्तियों के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालने वाला इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड एक बार फिर सवालों के घेरे में है। पाकिस्तान सरकार द्वारा बोर्ड के 15 गैर-सरकारी सदस्यों की नई सूची जारी किए जाने के बाद नियुक्तियों की पारदर्शिता, धार्मिक प्रतिनिधित्व और चयन प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। नई सूची में खैबर पख्तूनख्वा से सिख प्रतिनिधि के रूप में नामांकित मनमीत कौर मिशाल जावेद को लेकर उठाया जा रहा है। उनके संबंध में यह आरोप सामने आया है कि वह वास्तव में सिख धर्म से संबंधित नहीं हैं, इसके बावजूद उन्हें सिख समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में बोर्ड में स्थान दिया गया है। इस महिला पर पहले से आपराधिक मामले भी चल रहे है जिसके चलते इसे पहले भी एक बार नियुक्ति के बाद हटाया गया था मगर अब फिर से इसकी बहाली के पीछे क्या कारण हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि इसे किसी गहरी साजिश के तहत सिखों का प्रतिनिधित्व सौंपा गया हो जिसकी जांच अवश्य होनी चाहिए। वहीं इसी सूची में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री रमेश सिंह अरोड़ा के भाई इंद्रजीत सिंह अरोड़ा को भी शामिल किया गया है। इस नियुक्ति पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या चयन में योग्यता, अनुभव और सामुदायिक स्वीकार्यता को प्राथमिकता दी गई या राजनीतिक संबंधों ने कोई भूमिका निभाई।
पंजाब की जवानी को खालिस्तानी गतिविधियों से बचाना होगा
Summary :
पंजाब गुरुओं, पीरों की धरती है। जिसने देश, धर्म की रक्षा के लिए बलिदान देने वाले वीर सपूत पैदा किए। पंजाब की पहचान कभी किसी के सामने हाथ फैलाने वाले राज्य की नहीं, बल्कि मेहनत, बहादुरी, खुशहाली, सेवा और आत्मसम्मान की रही है। मगर आज पंजाब की युवा पीढ़ी इतनी समृद्ध विरासत, संसाधन होने के बावजूद ना जाने किस दिशा में निकल पड़ी हैं? पंजाब के सामने चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन क्षमता खत्म नहीं हुई है। जरूरत है तो युवाओं को सही दिशा देने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और राज्य की आर्थिक शक्ति को मजबूत करने की ताकि युवा वर्ग…


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