पंजाब ऐसा राज्य रहा है जहां कांग्रेस पार्टी ने अपना गौरवशाली इतिहास देश के स्वतन्त्रता संग्राम के कालखंड से ही लिखा है। भारत के बंटवारे से पहले 1930 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में पं. जवाहर लाल नेहरू की सदारत में भारत की पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव पारित किया गया और इसके अगले वर्ष 1931 में सिंध के कराची कांग्रेस अधिवेशन में सरदार वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में स्वतन्त्र भारत में भारत के नागरिकों को मानवाधिकार देने का वचन दिया गया और प्रत्येक वयस्क नागरिक को बिना किसी भेदभाव के एक वोट का अधिकार देने के साथ ही इसी आधार पर चुनाव कराने का संकल्प लिया गया।
1931 का अधिवेशन कई मायनों में ऐतिहासिक था क्योंकि इसमें पारित प्रस्तावों के आधार पर ही 1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद इसके संकल्पों को भारतीय संविधान का हिस्सा बनाया गया परन्तु आजादी मिलने के बाद भारत के हिस्से में जो बचा-खुचा पूर्वी पंजाब आया उसमें देशी रजवाड़ों की रियासतों को जोड़ कर पहले पेप्सू राज्य व पंजाब बनाये गये और बाद में 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों पर संयुक्त पंजाब का गठन किया गया जिसमें आज के हिमाचल प्रदेश व हरियाणा राज्य भी शामिल थे परन्तु इसके बाद अकाली दल ने प्रथक पंजाबी सूबे की मांग की, जिसे तत्कालीन पं. नेहरू की सरकार ने स्वीकृति नहीं दी और इस मांग को अनावश्यक बताया लेकिन भाषाई आधार पर गठित पंजाब राज्य में तब हिन्दी भाषी व पंजाबी भाषी लोगों का विवाद पैदा हुआ और 1966 में स्व. इन्दिरा गांधी की सरकार ने संयुक्त पंजाब से हरियाणा व हिमाचल को अलग कर दिया और पंजाबी सूबे की मांग को मान लिया। इसके तुरन्त बाद 1967 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी विधानसभा में पूर्ण बहुमत लाने में असमर्थ रही और राज्य में अकाली दल व जनसंघ की मिली-जुली सरकार बनी जो बीच में ही धराशायी हो गई और 1969 में जब मध्यावधि चुनाव हुए तो पुनः जनसंघ-अकाली सरकार गठित हुई मगर यह पूरा कार्यकाल नहीं कर सकी और 1972 में हुए चुनावों में कांग्रेस के ज्ञानी जैलसिंह ने पूरे पांच साल सरकार चलाई । इस दौरान इमरजेंसी लगी और केन्द्र में 1977 में जनता पार्टी की सरकार आने के बाद पंजाब में अकाली दल का दबदबा स्व. प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में कायम हुआ परन्तु 1980 में केन्द्र में श्रीमती इन्दिरा गांधी के पुनः सत्ता पर काबिज होने के बाद राज्य में फिर चुनाव हुए और कांग्रेस ने सत्ता की बागडोर अपने प्रख्यात गांधीवादी नेता स्व. दरबारा सिंह के हाथ में साैंपी लेकिन तब पंजाब में आतंकवादी समस्या शुरू हो गई और पूरा पंजाब इसकी चपेट में आ गया। इसके बाद के इतिहास को दोहराने की जरूरत नहीं है क्योंकि 90 के दशक तक पंजाब बामुश्किल इस समस्या से बाहर निकल कर आया। यह पृष्ठभूमि लिखने का मन्तव्य यही है कि आज की पीढ़ी को पंजाब का तथ्य परक मूल्यांकन करने का अवसर मिले जिससे वह जान सके कि राज्य की वर्तमान कांग्रेस, अकाली दल, आम आदमी पार्टी और भाजपा की राजनीति का भीतर का सच क्या है। सच यही है कि कभी देश का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक क्षेत्रीय दल होने का रुतबा रखने वाला अकाली दल आज बादल परिवार की जेबी पार्टी बन चुका है और भाजपा की लोकप्रियता रसातल में जा चुकी है जबकि आम आदमी पार्टी इस बन्दरबांट में अपनी साख को ऊंचा रख कर सत्ता पर काबिज है और कांग्रेस पार्टी अपने भीतर की गृह कलह से पूरी तरह पाताल में धंसती जा रही है। यदि गौर से देखा जाये और परिस्थितियों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाये तो पिछली बार 2022 के चुनाव में कांग्रेस ने राज्य की सत्ता अपनी गृह कलह के चलते ही आम आदमी पार्टी को प्लेट में सजा कर दी। क्योंकि तब चुनावों से पहले कांग्रेस पार्टी ने अपने मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरेन्दर सिंह को बड़ी बेरुखी से गद्दी से उतार कर चरण जीत सिंह चन्नी का राज्याभिषेक किया और प्रदेश अध्यक्ष पद पर नवजोत सिंह सिद्धू जैसे मसखरे को बैठा कर आन्तरिक लोकतन्त्र की डींगे हांकी। श्री चन्नी बेशक कद्दावर और परिपक्व दलित नेता थे मगर कैप्टन और सिद्धू के बीच की लाग-डांट से प्रदेश की जनता आजिज आ गई और उसने एक नये विकल्प आम आदमी पार्टी को तीन-चौथाई बहुमत दे डाला परन्तु लगता है कि 2022 के इस हादसे से भी कांग्रेस पार्टी ने कोई सबक नहीं सीखा है और वर्तमान में पार्टी में वर्चस्व को लेकर प्रदेश अध्यक्ष अमरिन्दर सिंह राजा वडिंग व पूर्व मुख्यमन्त्री चरण जीत सिंह चन्नी के बीच युद्ध जारी है। पार्टी में सुलह-सफाई कराने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस की ओर से जिन श्री भूपेश बघेल को पंजाब का प्रभारी बनाया गया था वह स्वयं इस गुटबाजी में घिर गये और उन पर वडिंग गुट का हिमायती होने के आरोप लगने लगे।
श्री बघेल छत्तीसगढ़ राज्य के पूर्व मुख्यमन्त्री हैं । उन्हें पंजाब इसीलिए भेजा गया था कि वह एक निष्पक्ष व्यक्ति होने की वजह से गुटबादी को समाप्त करेंगे परन्तु वह इसमें कामयाब नहीं हुए। अब पार्टी हाईकमान ने अपने दूसरे महासचिव श्री सचिन पायलट को बघेल की जगह भेजा है। श्री पायलट युवा, ऊर्जा से भरे हुए हैं और पंजाब की राजनैतिक परिस्थितियों से अपेक्षाकृत बाखबर भी हैं। वह इसके पड़ाेसी राज्य राजस्थान के उपमुख्यमन्त्री भी रहे हैं। पायलट के बारे में यह कहा जाता है कि वह नौजवान पीढ़ी की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को पारंपरिक भारतीय सामाजिक संरचना के भीतर आवाज देना जानते हैं। वह पंजाब की सामाजिक संरचना के पेचीदा जोड़ों को खोलने के तरीके से भी अनभिज्ञ नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि पंजाब के लोगों की सोच भौतिकवादी होने के साथ ही वैज्ञानिक भी समझी जाती है। उनमें नयी चीज को पकड़ने की उद्यममशीलता कूट-कूट कर भरी होती है। अतः सचिन पायलट जैसा नई रोशनी का नेता कांग्रेस पार्टी की अन्तर्कलह को वस्तुपरक तरीके से सभी गुटों को मोहते हुए शान्त कर सकता है।
पंजाब में सचिन पायलट
Summary :
पंजाब ऐसा राज्य रहा है जहां कांग्रेस पार्टी ने अपना गौरवशाली इतिहास देश के स्वतन्त्रता संग्राम के कालखंड से ही लिखा है। भारत के बंटवारे से पहले 1930 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में पं. जवाहर लाल नेहरू की सदारत में भारत की पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव पारित किया गया और इसके अगले वर्ष 1931 में सिंध के कराची कांग्रेस अधिवेशन में सरदार वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में स्वतन्त्र भारत में भारत के नागरिकों को मानवाधिकार देने का वचन दिया गया और प्रत्येक वयस्क नागरिक को बिना किसी भेदभाव के एक वोट का अधिकार देने के साथ ही इसी आधार…


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