पहले नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने और फिर केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानि सीबीएसई की बाहरवीं परीक्षा के नतीजों को लेकर ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) यानि मूल्यांकन प्रणाली ही सवालों के घेरे में आ गई थी। परीक्षा देने वाले छात्रों और अभिभावकों में आक्रोश बढ़ रहा था। सीबीएसई ने छात्रों को री-इवैल्यूएशन का विकल्प दिया था लेकिन देशभर में सीबीएसई का पोर्टल 20 घंटे ठप्प रहने के बाद जब खुला तब भी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, इससे छात्रों में गुस्से को और बढ़ा दिया। इन सारे घटनाक्रमों ने सीबीएसई की साख को जमीन पर ला दिया और छात्रों और प्रतियोगी परीक्षा देने वाले युवाओं का परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा ही उठ गया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए हस्ताक्षेप किया और केन्द्र सरकार ने बड़ा प्रशासनिक कदम उठाते हुए सीबीएसई के चेयरमैन राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता का तबादला कर उनकी जगह लोखंडे प्रशांत सीताराम को अध्यक्ष और वरुण भारद्वाज को सचिव नियुक्त किया। इसके साथ ही पूरे मामले की जांच के लिए एस. राधा चौहान के नेतृत्व में एक सदस्यीय जांच समिति का गठन किया जो ओएसएम सर्विस खरीद की टैंडर प्रक्रिया और इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करेगी।
भारत में शिक्षा व्यवस्था ऐसी है जिसमें विद्यार्थियों की योग्यता का पैमाना परीक्षाओं में हासिल किए अंक ही होते हैं। 3 घंटे का प्रश्नपत्र कोई छात्र कैसे हल करता है और कितने अंक हासिल करता है, वही उसका भविष्य तय करते हैं। अंकों की दौड़ में बारहवीं कक्षा के परिणाम किसी भी छात्र के जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ होते हैं। अगर परीक्षा की मूल्यांकन प्रणाली में ही गड़बड़ हो तो फिर यह छात्रों के भविष्य से सीधा खिलवाड़ है। एनसीईआरटी से जुड़े रहे कई शिक्षाविदों ने ओएसएम प्रणाली को बिना जांचे-परखे और जल्दबाजी में अपनाने का आरोप लगाया था लेकिन जब परिणाम आए तो ओएसएम प्रणाली की पोल खुल गई।
जेनरेशन जैड के तीन छात्रों सार्थक सिद्धांत, वेदांत श्रीवास्तव और निसर्ग अधिकारी ने न सिर्फ कक्षा बारहवीं की परीक्षाओं के लिए सीबीएसई की ऑन स्क्रीन मार्किंग प्रणाली की पोल खोली बल्कि देशभर में नई बहस छेड़ दी। सार्थक सिद्धांत ने शिक्षा से जुड़ी संसदीय समिति के सामने पेश होकर प्रेजेंटेशन दी और माननीय सांसदों के सामने सीबीएसई की गड़बड़ियों को उजागर किया। छात्र वेदांत श्रीवास्तव का मामला तो काफी चिंताजनक है। वेदांत को जो उत्तर पुस्तिका मिली वह उसकी थी ही नहीं। दुखद बात यह रही कि जब वेदांत ने सवाल उठाए तो सोशल मीडिया पर उसे पाकिस्तानी करार दिया गया। उसे देशद्रोही और न जाने क्या-क्या कहा गया।
भारतीय समाज के कुछ लोगों ने एक बच्चे को पाकिस्तानी और देशद्रोही करार देकर अपनी बीमार मानसिकता का ही परिचय दिया। यद्यपि सीबीएसई ने गलत उत्तर पुस्तिका अपलोड किए जाने पर माफी मांग ली, तब वेदांत को बुरा-भला कहने वाले भी शर्मसार हुए। सार्थक सिद्धांत ने ओएसएम अनुबंध से जुड़ी टैंडर प्रक्रिया की खामियों को उजागर किया तो वहीं निसर्ग अधिकारी ने पोर्टल की गड़बड़ियों का भांडा फोड़ा। तीनों ही छात्र इस मामले में व्हिसल ब्लोअर साबित हुए। प्याज के छिलकों की तरह परत-दर-परत गड़बड़ियां सामने आने के बाद देशभर में सवाल उठने लगे। यह मामला महज एक तकनीकी समस्या से कहीं अधिक देश में परीक्षा प्रणाली की विफलताओं को उजागर करता है। सवाल उठा कि क्या सीबीएसई में कोई गिरोह हावी है जो बच्चों का भविष्य दांव पर लगाकर पैसा कमा रहा है।
अब लाखों बच्चे री-इवैल्यूएशन के लिए आवेदन कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें उम्मीदों से कम अंक मिले हैं। सीबीएसई जैसी परीक्षा नियामक संस्था अभी तक खामियों को दूर करने के लिए कोई ठोस तंत्र विकसित नहीं कर पाई। हैरानी की बात यह है कि जिस कम्पनी को ओएसएम का अनुबंध दिया गया उसका ट्रैक रिकॉर्ड भी अच्छा नहीं था। तेलंगाना में भी ऐसा ही प्रयोग किया गया था जहां एसएम प्रणाली सही नहीं कर पाई थी। भारत में नम्बरों की दौड़ लगी हुई है। नवम्बर कम आने पर छात्र आत्महत्याएं कर रहे हैं। अभिभावक भी बच्चों को पैसे उगलने वाला एटीएम बनाना चाहते हैं और बच्चों पर बहुत मानसिक दबाव बनाते हैं। कई बार बच्चे भावनात्मक रूप से अपमानित और प्रताड़ित महसूस करते हैं और मौत को गले लगा लेते हैं।
देशभर से अब बच्चों के समर्थन में आवाजें उठ रही हैं और मामला ऊपरी अदालत में भी पहुंच चुका है लेकिन समाज को इस बात से सबक लेना होगा कि वे किसी और मासूम को ट्रोल न करें। सम्पन्न परिवारों के लोग तो पुनर्मूल्यांकन के लिए फीस देने की स्थिति में हैं लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवार क्या करेंगे। क्या सीबीएसई समूचा मूल्यांकन फिर से करवाने का साहस दिखाएगा या सालभर के प्रदर्शन के आधार पर सभी बच्चों को अंक दिए जाएंगे। धोखाधड़ी या गड़बड़ी का शिकार हुए छात्रों को न्याय कैसे मिलेगा, यह बहुत गम्भीर सवाल है। सीबीएसई का माफीनामा या प्रशासनिक फेरबदल सुधार का विकल्प नहीं हो सकता। ओएसएम प्रणाली और स्कैनिंग प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच होनी ही चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सीबीएसई की विश्वसनीयता कैसे कायम हो। अगर परीक्षा प्रणाली पर ही भरोसा नहीं तो फिर शिक्षा व्यवस्था में बचेगा क्या?


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