माता-पिता का सम्मान हमारी संस्कृति

हम सभी जानते हैं कि भारतीय संस्कृति में माता-पिता को भगवान के सम्मान माना गया है।
”मातृ देवो भव:,
पितृ देवो भव:”
लगभग 23 साल हो गए वरिष्ठ नागरिकों के लिए काम करते हुए, उनमें खुशियां बांटते हुए। अपने अनुभवों से यही जाना कि आज के समय में राम, श्रवण जैसे बेटों की भी कमी नहीं और कपूतों की भी कमी नहीं। इसी कारण वही माता-पिता, जिन्होंने हमें अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया, जिन्होंने अपनी खुशियां त्याग कर हमें आगे बढ़ाया। आज कई जगहों पर उपेक्षा और अकेलेपन का जीवन जीने को मजबूर हैं। कई जगह तो उन्हें अपने ही घर में रहने का अधिकार नहीं। कहीं पर उन्हें आर्थिक और मानसिक कष्ट झेलने पड़ रहे हैं। पहले तो सिर्फ बेटों के बारे में कहा जाता था, आज मेरे पास कई बेटियों के केस भी आ रहे हैं, जो अपने माता-पिता को जायदाद-पैसों के लिए तंग करती हैं। अभी की कई लोग कहते हैं कि बेटियों, लड़कों को ब्याह कर लाए और अपने माता-पिता को साथ रखें तो वृद्ध आश्रमों की जरूरत नहीं पड़ेगी परन्तु वो भी गलत साबित हो रहा है। क्योंकि अगर बेटियां हर क्षेत्र में बेटों के समान काम कर रही हैं तो इस क्षेत्र में भी पीछे नहीं। (अभी नाममात्र ही हैं जो अपने माता-पिता को तंग करती हैं।) जरा सोचने की बात है जिस व्यक्ति या माता-पिता ने सारी उम्र मेहनत करके साम्राज्य खड़ा किया, वह अपने ही जीवन के अंतिम पड़ाव में असहाय हो जाएं, यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह हमारे समाज का आइना है। आज मेरे सामने कई ऐसे मामले आते हैं जहां माता-पिता अपनी पूरी सम्पत्ति बच्चों के नाम कर देते हैं और बाद में उन्हें सम्मान नहीं मिलता। कई बार उन्हें वृद्धाश्रम तक जाना पड़ता है। यह स्थिति बहुत दर्दनाक है। हम सबको मिलकर इसे बदलने की कोशिश करनी होगी।
हमारे सामने सबसे बड़ा उदाहरण विजयपाल सिंघानिया जी का है, जो अब इस दुनिया से विदा ले गए और जाते-जाते सभी मां-बाप बच्चों को संदेश दे गए। वे एक बहुत बड़े उद्योगपति थे। उन्होंने अपनी पूरी सम्पत्ति, अपना व्यवसाय सब कुछ अपने बेटे को सौंप दिया लेकिन समय बदला और हालात ऐसे बने कि उन्हें अपने ही घर में रहने का अधिकार नहीं मिला। उन्हें आर्थिक और मानसिक क्षण झेलने पड़े। यह उनके इंटरव्यू से मालूम पड़ा। उनके बेटे ने ऐसा क्यों किया। यह तो नहीं बता सकता पर जो भी हालात हो मां-बाप बुरे नहीं हो सकते।
उनके साथ कुछ भी गलत करना, उम्र के पड़ाव पर तंग करना बहुत बड़ा पाप है। अंतिम समय विदाई उसी ने दी परन्तु क्या फायदा। परन्तु यह बात हम सबको यह शिक्षा देती है, सिर्फ प्यार में या भरोसे में आकर पूरी सम्पत्ति बच्चों को दे देना कभी-कभी बुजुर्गों के लिए मुश्किल बन सकता है। इसलिए जीवनकाल में पूरी सम्पत्ति ट्रांसफर न करें। वसीयत बनाएं ताकि सम्पत्ति आपके नियंत्रण में रहे। सम्पत्ति देते समय शर्तें रखें अपने लिए आर्थिक सुरक्षा बनाएं, कानूनी अधिकारों की जानकारी रखें।
माता-पिता केवल जन्म देने वाले नहीं होते, वे हमारे जीवन के निर्माता होते हैं। आज अगर हम उनकी सेवा नहीं करेंगे तो कल हमारी संतान भी हमसे यही सीखेगी। आज जो बोओगे वही काटोगे। हाल ही में तेलंगाना विधानसभा में एक बहुत महत्वपूर्ण पहल सामने आई है, जो संतान अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करती उनकी जिम्मेदारी नहीं निभाती तो उनकी सैलरी से कटौती करके माता-पिता को सहायता दी जाएगी। यह कदम हमारे देश के कानून Maintenance and welfare of parents and senior citizens act 2007 की भावना को और मजबूत करता है। परन्तु सवाल फिर वही है कि क्या माता-पिता की सेवा कानून के डर से होनी चाहिए? या हमारे दिल और संस्कार से होनी चाहिए? मेरा मानना है कि कानून डर के लिए जरूरी है परन्तु समाज कानून से नहीं संस्कारों से चलता है। परिवार सम्पत्ति से नहीं प्रेम और सम्मान से चलता है। माता-पिता बोझ नहीं, हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं।
आइये आज महावीर जयंती के अवसर पर व आने वाली हनुमान जयंती के अवसर पर सब मिलकर यह संकल्प लें हम अपने माता-पिता या घर के बुजुर्गों की सेवा करेंगे, उनका सम्मान करेंगे, उन्हें कभी अकेला असहाय महसूस नहीं होने देंगे। history always repeat जो आप करोगे, वो आपके सामने जरूर आएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Make Punjab Kesari Your Trusted News Source

पंजाब केसरी एक हिंदी भाषा का समाचार पत्र है जो भारत में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली के कई केंद्रों से प्रकाशित होता है।