लाल आतंक से मुक्त भारत

Summary :

31 मार्च, मंगलवार 2026 की तारीख भारत के इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने इस तारीख तक भारत को नक्सलमुक्त बनाने का लक्ष्य रखा था। जम्मू-कश्मीर के अनुच्छेद 370 को खत्म करने, आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस नीति अपनाने, तीन तलाक की प्रथा खत्म करने के बड़े वादों के साथ 2014 में केन्द्र की सत्ता में आई भाजपा ने एक-एक करके अपने सभी वादे पूरे कर दिखाये हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में नक्सलवाद पर चर्चा का उत्तर देते हुए ऐलान किया कि भारत में लाल आतंक लगभग खत्म हो चुका है।…

31 मार्च, मंगलवार 2026 की तारीख भारत के इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने इस तारीख तक भारत को नक्सलमुक्त बनाने का लक्ष्य रखा था। जम्मू-कश्मीर के अनुच्छेद 370 को खत्म करने, आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस नीति अपनाने, तीन तलाक की प्रथा खत्म करने के बड़े वादों के साथ 2014 में केन्द्र की सत्ता में आई भाजपा ने एक-एक करके अपने सभी वादे पूरे कर दिखाये हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में नक्सलवाद पर चर्चा का उत्तर देते हुए ऐलान किया कि भारत में लाल आतंक लगभग खत्म हो चुका है। नक्सलवादी हिंसा ने देश को बहुत बड़े घाव दिए हैं। हर साल कोई न कोई लाल स्याही से लिखा गया खूनी अध्याय जुड़ता रहा जिससे पशुपतिनाथ (नेपाल) से तिरुपति तक खूनी लाल गलियारा स्थापित हो गया। नक्सली हिंसा का मुकाबला करते सैंकड़ों वीर जवानों ने अपने प्राण न्यौछावर किए वहीं शीर्ष राजनेता और आम जनता भी इनकी गोलियों और बारूदी सुरंगों का निशाना बने। कितनी मांओं ने अपने लाल खोये और हजारों युवाओं ने इनके जाल में फंसकर हथियार उठाए। नक्सलवाद मुक्त भारत का संघर्ष कोई साधारण नहीं रहा, बल्कि यह सुरक्षा जवानों की शहादत आैर आम जनता के खून से लिखी गई एक दास्तान है। नक्सलवाद की पृष्ठभूमि तैयार होती है 1946 कि तेभागा आंदोलन से जो जमींदारों के विरुद्ध हुआ था। इस आंदोलन में चारू मजूमदार ने कार्यकर्ता के रूप बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। आगे चलकर चारू ने नक्सली हिंसा को विचारधारा से जोड़ दिया।
देशवासियों को याद होगा कि 2010 में दंतेवाड़ा में घातक नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों की जान चली गई थी तब देशवासियों को गहरा आघात लगा था। तिरंगे झंडे में लिपटे जवानों के शव देखकर पूरा देश झकझोर उठा था। मई 2013 में बस्तर जिले के झीरम घाटी में नक्सलियों ने बड़ा हमला कर 29 लोगों की हत्या कर दी थी,​ जिसमें कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा और कांग्रेस के ​िदग्ग्ज नेता ​िवद्याचरण शुक्ल भी शामिल थे। पूर्व की सरकारें नक्सली हिंसा को खत्म करने को लेकर दुविधा में उलझी रहीं। बार-बार यह सवाल उठा कि क्या अपने ही देश के भटके हुए लोगों के विरुद्ध सुरक्षा बलों का इस्तेमाल सही है या गलत है। राज्य सरकारों में भी नीतियों को लेकर समन्वय की कमी रही। नक्सली आंदोलन पूरी तरह से भटक गया। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद मजबूत इच्छाशक्ति, सुरक्षा बलों को दी गई खुली छूट और मजबूत निगरानी तंत्र स्थापित कर नक्सलवाद मुक्त भारत का वादा ​िकया गया जो अब पूरा हो चुका है। केन्द्र की मोदी सरकार के मूल उद्देश्यों में तीन बातें प्रमुख रहीं। देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद आैर भारतीय संस्कृति के सभी अंगों का पुनरुत्थान।
मोदी सरकार ने ​िसर्फ संवाद, सुरक्षा और समन्वय से काम किया और बड़ा नीतिगत बदलाव किया। सरकार की नीति यह रही कि जो हथियार छोड़कर आत्मसमर्पण करना चाहते हैं उनका स्वागत है लेकिन अगर कोई हथियार लेकर निर्दोषों की हत्या करेगा तो उसे बख्शा नहीं जाएगा। राज्यों की पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बलों को पूरी छूट दी गई, सूचना आदान-प्रदान तथा अभियान समन्वय के लिए केंद्र और राज्यों के बीच एक व्यावहारिक सेतु बनाया गया। हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति पर प्रशासन ने सख्ती की। 2019 के बाद उनकी आपूर्ति को लगभग 90 प्रतिशत तक रोकने में सफलता हासिल हुई। आर्थिक स्रोतों पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी और प्रवर्तन निदेशालय ने सख्ती की है, साथ ही शहरी नक्सल समर्थन, कानूनी सहायता और मीडिया में अनुकूल कथानक बनाने वाले तत्वों पर भी कड़ी कार्रवाई की गई। नक्सलियों से निपटने के लिए डीआरजी, एसटीएफ, सीआरपीएफ और कोबरा बलों का संयुक्त प्रशिक्षण शुरू किया गया। जिसके काफी अच्छे परिणाम रहे।
सुरक्षा बलों के दम पर ही नहीं बल्कि विकास की गंगा बहाकर भी नक्सलियों को आत्मसपर्मण के लिए मजबूर किया है। विकास, रोजगार, शिक्षा की बयार बही तो उनकी मदद करने वाले ग्रामीण भी न सिर्फ कदम पीछे खींचने लगे बल्कि परिवार वालों पर दबाव डालकर नक्सलियों को आत्मसमर्पण के लिए तैयार भी किया। अगर प्रभावित इलाकों में विकास की बात करें तो जनवरी 2026 तक 15 हजार किलोमीटर सड़कें बनाई गईं। मोबाइल कनेक्टिविटी के लिए 9,233 टॉवर लगाए गए और युवाओं, महिलाओं को दक्ष बनाकर रोजगार दिलाने के लिए 46 आईटीआई और 49 स्किल डेवलपमेंट सेंटर की स्थापना की गई। 179 एकलव्य मॉडल स्कूल, 6,025 पोस्ट ऑफिस, विभिन्न बैंकों की 1,804 शाखाएं और और 1,321 एटीएम स्थापित किए गए। जो नक्सली आत्मसपर्मण कर रहे हैं उनके पुनर्वास के लिए भी सरकार खूब धन खर्च कर रही है।
धीरे-धीरे अनेक नक्सली कमांडर मारे गए और सैंकड़ों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर ​िदया। हिंसा का रास्ता छोड़ नक्सलियों ने राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होना स्वीकार किया, ​िजनके पुनर्वास की व्यवस्था सरकार कर रही है। अब पूरे देश में कुछ ही नक्सली कैडर बचा है। गृहमंत्री ​अमित शाह ने सीधी चेतावनी दी है कि जो कोई हथियार बंदूक उठाएगा उसे उसकी कीमत चुकानी होगी। उम्मीद है कि बचे-खुचे नक्सली भी हथियार डाल देंगे। नक्सलमुक्त भारत मोदी सरकार की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।

Aditya Chopra

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