देश के गृहमन्त्री श्री अमित शाह की गिनती एेसे राजनीतिज्ञों में होती है जिनकी कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता। श्री शाह की छवि एक दृढ़ प्रतिज्ञ राजनेता होने के साथ-साथ कुशल व चतुर राजनीतिक रणनीतिकार की भी है। वह सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा की चुनावी रणनीति के रचयिता भी समझे जाते हैं। इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने जो रणनीति भाजपा के लिए बनाई उसे ही आगे बढ़ाने में पार्टी के नये अध्यक्ष श्री जगत प्रकाश नड्डा लगे रहे, परिणामस्वरूप भाजपा को चुनावों में प्रचंड विजय मिलती रही। बेशक कुछ राज्यों में भाजपा को सफलता हासिल नहीं हुई मगर एेसे राज्यों मंे भी पार्टी का प्रभाव जरूर बढ़ा। गृहमन्त्री का लक्ष्य है कि 31 मार्च, 2026 तक देश से नक्सलवाद की समस्या समाप्त कर दी जाये। इस दिशा में उनके नेतृत्व में पुलिस व अर्ध सुरक्षा बल तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और हर महीने नक्सलवादी नेतृत्व का सफाया करने में सफल हो रहे हैं।
इसी क्रम में विगत दिन पुलिस ने ओडिशा में कुख्यात नक्सलवादी सरगना पाका हनुमन्थु उर्फ गणेश उर्फ चामू को मौत की नींद सुला दिया और उसके साथ पांच अन्य नक्सलवादियों का भी सफाया कर दिया। हनुमन्थु के सिर पर सरकार ने एक करोड़ का इनाम रखा हुआ था। वह प्रतिबन्धित माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के शिखर नेतृत्व में शुमार होता था तथा उसके और भी कई नाम थे। 67 वर्षीय गणेश तेलंगाना के नलगौंडा जिले का रहने वाला था और बीएससी परीक्षा पास नहीं कर सका था तभी वह नक्सलवादियों के सम्पर्क में आ गया था। 67 वर्षीय गणेश रूपा व राजेश तिवारी के नाम से भी अलग-अलग नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जाना जाता था। श्री शाह ने अप्रैल 2026 तक जिस ‘नक्सल मुक्त भारत’ को बनाने की घोषणा की है उस दिशा में गणेश की मृत्यु मील का पत्थर मानी जा रही है। इसके साथ ही साठ के दशक से भारत में चली आ रही नक्सलवाद की समस्या का अन्त अब बहुत नजदीक माना जा रहा है। वास्तव में भारत में नक्सलवाद की समस्या आदिवासी मूलक राज्यों में भयावह रही है जिनमें छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना आदि प्रमुख रूप से आते हैं। केन्द्र में जब मोदी सरकार से पहले डाॅ. मनमोहन सिंह की सरकार थी तो यह समस्या बहुत गंभीर रूप में सामने आयी थी क्योंकि नक्सलवादी आये दिन पुलिस बलों पर हमला करते रहते थे। उस समय डाॅ. मनमोहन सिंह ने नक्सलवाद को आतंकवाद से भी ज्यादा बड़ी समस्या कहा था मगर उन्हीं की सरकार के गृहमन्त्रियों स्व. शिवराज पाटिल व श्री पी. चिदम्बरम का नजरिया इस बारे में भिन्न माना जाता था। जबकि मनमोहन सरकार से पहले की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के गृहमन्त्री श्री लालकृष्ण अडवानी भी नक्सलवाद के मुद्दे पर बहुत सख्त माने जाते थे। परन्तु कांग्रेस पार्टी मानती थी कि नक्सलवाद देश के ही भटके हुए नौजवानों की समस्या है जिन्हें बातचीत के माध्यम से सही रास्ते पर लाया जा सकता है।
अतः इसी के अनुरूप श्री पाटिल व चिदम्बरम की नक्सली नीतियां भी रहीं। परन्तु इस मामले में श्री शाह का नजरिया बहुत साफ है और वह कहते हैं कि नक्सलवाद सीधे भारत के संविधान को चुनौती देता है क्योंकि नक्सली मानते हैं कि देश में सत्ता एक वोट के अधिकार के जरिये नहीं बल्कि बन्दूक की गोली के जरिये बदली जा सकती है। अतः एेसे राष्ट्रद्रोहियों से बातचीत करने का क्या औचित्य हो सकता है? एेसे लोगों को भटका हुआ बताकर उनके साथ किसी प्रकार की रियायत नहीं की जा सकती है अतः जरूरी है कि हथियार फेंक कर आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों से ही सरकार नरमी का व्यवहार करे और उन्हें हिंसा का रास्ता छोड़ कर शान्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करे। इसके लिए बहुत जरूरी है कि सरकार सख्ती के साथ अपनी ‘नो टोलरेंस’ नीति का परिचय दे। गांधी के देश में हिंसा को राजनीति का माध्यम किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि नक्सलवादियों का उद्देश्य राजनीतिक ही होता है और वे संविधानेत्तर अपना शासन अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में चलाना चाहते हैं।
नक्सली जिन क्षेत्रों में भी प्रभावी हो जाते हैं वहां सबसे पहले सरकारी विकास कार्यों को ठप्प कर देते हैं और लोगों में सरकार के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह करने की भावनाएं भड़काते हैं। जबकि भारत कानून व संविधान से चलने वाला देश है अतः एेसे लोगों के साथ बातचीत करने का भी कोई लाभ नहीं हो सकता। सरकार की इसी नीति के चलते देश में नक्सलवादियों का खात्मा अब अपने अन्तिम कगार पर पहुंचता प्रतीत हो रहा है। जहां तक गणेश का प्रश्न है तो यह बचे-खुचे कुछ नक्सली सरगनाओं में से ही था। अभी तक सुरक्षा बलों ने आन्ध्र व तेलंगाना से उपजे अधिकतम सरगनाओं को मार गिराने में सफलता हासिल कर ली है जिससे नक्सल प्रभावित अन्य राज्यों में भी लोगों को राहत की सांस मिल रही है। गणेश युवावस्था में ही नक्सली आन्दोलन में शामिल हो गया था। यह वही कुख्यात नक्सली था जिसने मई 2013 में छत्तीसगढ़ के सुकमा इलाके की झिरहम घाटी आक्रमण में हिस्सा लेकर कांग्रेस पार्टी के कई शीर्ष नेताओं को मौत के घाट उतार दिया था। जिनमें पूर्व केन्द्रीय मन्त्री श्री विद्याचरण शुक्ल व छत्तीसगढ़ के पूर्व मन्त्री महेन्द्र कर्मा व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल भी शामिल थे। एेसे दुर्दान्त नक्सली को ओडिशा में मार गिरा कर पुलिस ने प्रशंसनीय कार्य किया है गणेश ने अपनी नक्सली गतिविधियों की शुरूआत नलगौंडा जिले से ही 1981 में की थी जबकि वह एक छात्र नेता था और क्रान्तिकारी छात्र संगठन का सदस्य था तब उसने अखिल विद्यार्थी परिषद के नेता अचूरी श्रीनिवास पर हिंसक हमला किया था। बाद में इसी छात्र संगठन द्वारा अचूरी श्रीनिवास की हत्या केवल इसलिए कर दी गई थी कि वह माओवाद का सैद्धान्तिक विरोध करते थे।
शाह का ‘नक्सल मुक्त भारत’
Summary :
देश के गृहमन्त्री श्री अमित शाह की गिनती एेसे राजनीतिज्ञों में होती है जिनकी कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता। श्री शाह की छवि एक दृढ़ प्रतिज्ञ राजनेता होने के साथ-साथ कुशल व चतुर राजनीतिक रणनीतिकार की भी है। वह सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा की चुनावी रणनीति के रचयिता भी समझे जाते हैं। इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने जो रणनीति भाजपा के लिए बनाई उसे ही आगे बढ़ाने में पार्टी के नये अध्यक्ष श्री जगत प्रकाश नड्डा लगे रहे, परिणामस्वरूप भाजपा को चुनावों में प्रचंड विजय मिलती रही। बेशक कुछ राज्यों में भाजपा को सफलता हासिल…



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