प्रातःकाल में जब यह समाचार पत्र पाठकों के हाथ में होगा तो पांच राज्यों (पुडुचेरी केन्द्र प्रशासित क्षेत्र समेत) असम, तमिलनाडु, केरल व प. बंगाल के चुनाव परिणाम आ रहे होंगे और मतगणना जारी होगी। अतः चुनाव परिणामों के बारे में किसी भी प्रकार की भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा परन्तु इन चुनावों में भारत के लोकतन्त्र की ही अन्तिम विजय हो एेसी कामना हर भारतवासी करेगा। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि प. बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों को लेकर दो प्रमुख पार्टियों भाजपा व तृणमूल कांग्रेस के बीच जिस प्रकार रंजिश चली है उसने कहीं न कहीं लोकतन्त्र के इस सिद्धान्त को कमतर करके आंकने की कोशिश की है कि इस प्रणाली में राजनीतिक दलों के बीच हुई चुनावी लड़ाई किसी भी तौर पर दुश्मनी का इजहार नहीं करती है, बल्कि यह एेसी स्वस्थ प्रतियोगिता होती है जिसमें मर्यादित शब्द बाणों से ही आपस में एक-दूसरे को चित्त किया जाता है।
राज्य में इस मोर्चे पर मर्यादा का ध्यान नहीं रखा गया है और दोनों ही ओर से भाषा पर नियन्त्रण खोया गया है। इसके अलावा पूरी चुनावी लड़ाई में देश का चुनाव आयोग और उसकी कार्रवाइयां जिस तरह मुद्दा बनी रही हैं उनसे भी कहीं न कहीं लोकतान्त्रिक प्रतिष्ठा आहत हुई है। पूरे मामले में जिस तरह तृणमूल कांग्रेस व चुनाव आयोग के बीच उठा विवाद देश के सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा है उससे भी चुनाव आयोग के इकबाल को धक्का पहुंचा है, क्योंकि यह एक निष्पक्ष व स्वतन्त्र संवैधानिक संस्था मानी जाती है। हमारे देश की चुनाव प्रणाली में चुनाव आयोग का किसी भी सन्देह से ऊपर रहना संविधान में समाहित है क्योंकि आयोग संविधान से शक्ति लेकर ही अपने कार्य का निष्पादन करता है अतः उसकी बार-बार सर्वोच्च न्यायालय में जवाब तलबी जनता के मन में कई प्रकार के सवाल पैदा करती है परन्तु इसके लिए राजनीतिक दल भी जिम्मेदार हैं जिनके लिए चुनावों के समय उनके अपने दल हित सर्वोच्च हो जाते हैं और वे लोकतन्त्र के हितों के बारे में अपनी आंखें मूंद लेते हैं।
लोकतन्त्र की प. बंगाल में विजय हर हालत में सुनिश्चित हो इसे देखना भी राजनीतिक दलों का ही काम होता है क्योंकि इस व्यवस्था में आम आदमी के बाद वे ही सबसे बड़े भागीदार होते हैं। मगर हम देख रहे हैं कि जहां शेष राज्यों तमिलनाडु, पुडुचेरी, केरल व असम में चुनाव आयोग की भूमिका पर किसी प्रकार का विवाद नहीं खड़ा किया गया वहीं प. बंगाल में हर रोज आयोग को विवादों में घसीटा गया। इससे आम लोगों में लोकतन्त्र के प्रति आस्था में कमजोरी पैदा होती है। अतः बहुत जरूरी होता है कि केवल उन्हीं विवादों को सर्वोच्च न्यायालय में ले जाया जाये जो संवैधानिक रूप से अपरिहार्य होते हैं लेकिन इस राज्य में मुख्यमन्त्री ममता दीदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस एेसे विवादों को भी न्यायालय में ले गई जिनका सम्बन्ध चुनाव आयोग के चुनावी प्रबन्धों के दिशा-निर्देशों से था। ममता दीदी की सरकार आयोग के उस विगत 13 अप्रैल के निर्देशों को न्यायालय में ले गई जिसमें कहा गया था कि मतगणना के दिन गणना सुपरवाइजरों और गणना सहायकों की नियुक्ति में केन्द्र व राज्य सरकार दोनों के कर्मचारियों को शामिल किया जायेगा। यह विवाद अनावश्यक था क्योंकि चुनाव आयोग चुनावों के दौरान इस शपथ से बन्धा होता है कि वह संविधान के निर्देशों के अनुसार पूरी तरह भयमुक्त माहौल में साफ-सुथरे चुनाव करायेगा। उसके इस काम में राज्य व केन्द्र सरकार दोनों के ही कर्मचारी सहयोग करेंगे।
जरा सोचिये हर जिले का जिलाधीश या कलेक्टर ही चुनाव अधिकारी (रिटर्निंग आॅिफसर ) होता है और उसके हाथ में चुनाव परिणामों से सम्बन्धित सभी प्रकार के अख्तियारात होते हैं। यह कलेक्टर राज्य सरकार का मातहत ही काम करता है हालांकि उसकी सेवा शर्तें केन्द्र सरकार के अधीन ही होती हैं मगर व्यावहारिक रूप से राज्य का मुख्यमन्त्री ही उसका सबसे बड़ा अधिकारी होता है। अतः 13 अप्रैल के दिशा-निर्देशों के अनुरूप चुनाव आयोग अपना काम करता और राज्य सरकार के कर्मचारियों को भी गणना सुपरवाइजर या गणना सहायक नियुक्त करता। सर्वोच्च न्यायालय ने कल ममता सरकार की याचिका पर यही आदेश दिया कि 13 अप्रैल की निर्देशिका पर अमल किया जाये जिसे भाजपा ने भी अपनी जीत बताया और तृणमूल कांग्रेस ने भी।
तृणमूल के नेताओं का कहना है कि अब चुनाव आयोग के वकील द्वारा न्यायालय में दिये गये इस तर्क के बाद कि गणना सहायकों की नियुक्ति में राज्य सरकार के कर्मचारी रखे जायेंगे, स्थिति साफ हो गई है। कहने का मतलब यह है कि यह विवाद नाहक था क्योंकि कोलकाता उच्च न्यायालय ने पहले ही ममता दी सरकार की अपील खारिज कर दी थी। राज्य में इस बार चुनाव छिटपुट हिंसा व गड़बड़ी के ही सम्पन्न हुए जिसमें किसी व्यक्ति के मरने की खबर नहीं आयी क्योंकि इससे पहले इस राज्य के चुनावों में हिंसा जमकर होती थी और दर्जनों की संख्या तक में लोग मारे जाते थे। हालांकि चुनावों को हम लोकतन्त्र का उत्सव मानते हैं जिसमें लोग अपने मन-मुताबिक की राजनीतिक सरकार चुनते हैं। इसकी पवित्रता बनाये रखने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की ही होती है। अतः आयोग ने इक्का-दुक्का गड़बड़ियों की वजह से कल दो चुनाव क्षेत्रों के 14 मतदान केन्द्रों पर पुनर्मतदान कराया और कल ही यह फैसला किया कि फाल्टा विधानसभा क्षेत्र के सभी मतदान केन्द्रों पर आगामी 21 मई को पुनः मतदान कराया जायेगा जिससे यह स्पष्ट हो सके कि प. बंगाल में चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष व साफ- सुथरे हुए हैं।
लोकतन्त्र में एेसे फैसलों का अपना एक अलग विशिष्ट सन्देश होता है जिसमें लोकमत की सरकार का भाव छिपा रहता है लेकिन इसके साथ चुनाव आयोग को यह भी सोचना होगा कि राज्य में जिन 27 लाख लोगों को जरूरी कागजात होने के बावजूद मतदान से वंचित रखा गया है उनके लोकतान्त्रिक अधिकारों का क्या होगा? बाबा साहेब भारत के वयस्क नागरिक को स्वयंभू बना कर गये हैं कि वह जिसे चाहे उसे वोट दे। मगर आज जनगणना पूरे शान्तिपूर्ण तरीके से हो यह देखना भी चुनाव आयोग का ही काम है।
बंगाल के चुनाव व न्यायालय
Summary :
प्रातःकाल में जब यह समाचार पत्र पाठकों के हाथ में होगा तो पांच राज्यों (पुडुचेरी केन्द्र प्रशासित क्षेत्र समेत) असम, तमिलनाडु, केरल व प. बंगाल के चुनाव परिणाम आ रहे होंगे और मतगणना जारी होगी। अतः चुनाव परिणामों के बारे में किसी भी प्रकार की भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा परन्तु इन चुनावों में भारत के लोकतन्त्र की ही अन्तिम विजय हो एेसी कामना हर भारतवासी करेगा। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि प. बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों को लेकर दो प्रमुख पार्टियों भाजपा व तृणमूल कांग्रेस के बीच जिस प्रकार रंजिश चली है उसने कहीं न कहीं…


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