“आपका न होना सिर्फ एक इंसान की कमी नहीं,
बल्कि एक पूरे ब्रह्मांड की कमी है मेरे लिए।”
“कभी-कभी जब थक जाता हूं,
तो आपकी हंसी की याद आ जाती है
और मैं फिर से उठ खड़ा होता हूं।”
“दुनिया कहती है वह सब कुछ बदल देता है,
पर पापा, आपकी यादें अब भी वहीं हैं — ज्यों की त्यों।”
पिता का रिश्ता वो छाया है जो धूप में भी राहत देती है, वो आवाज़ है जो डांटती कम, संभालती ज़्यादा है लेकिन जब वही आवाज़ खामोश हो जाए, तो सन्नाटा दिल तक उतर आता है। लोग कहते हैं वक्त सब कुछ ठीक कर देता है,लेकिन आपका ना होना आज भी उतना ही चुभता है। आपका जाना एक खालीपन दे गया जिसे कोई नहीं भर सकता। आपकी तस्वीर से बात कर लेना अब आदत सी हो गई है।
आज का दिन हमारे परिवार के लिए बहुत भावुक होता है। आज मेरे पिताजी अश्विनी कुमार की छठीं पुण्यतिथि है। मेरी मां किरण चोपड़ा और अनुज अर्जुन तथा आकाश सभी भावुक हैं। पिता के िबना छह वर्ष किस तरह से बीते इसका अहसास सभी को है। इन वर्षों के दौरान कई तरह की चुनौतियां भी सामने आईं, पिछले वर्ष अर्जुन और आकाश के घर में दो नन्हे बच्चों का आगमन हुआ। अर्जुन के घर अभीर अश्विनी और आकाश के घर बेटी अमानत किरण का जन्म हुआ। परिवार के लिए खुशी का मौका आया। घर के आंगन में नन्हे शिशुआें की किलकारियां गूंजी। मुझे ताऊ बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बच्चों की पहली लोहड़ी पर उत्सव मनाया गया। यद्यपि हम सबके हृदय में खुशी की लहर थी। पिताजी अश्विनी कुमार के चित्र के समक्ष हमने नतमस्तक होकर आशीर्वाद लेकर पर्व मनाया। परिवार से जुड़े सभी सदस्य और शुभचिंतकों ने बच्चों को आशीर्वाद दिया लेकिन भीतर से मेरी मां और हम सभी को एक बात खटकती रही और इसका बात का दर्द होता रहा िक काश! पापा आज हमारे बीच होते तो पर्व का आनंद ही कुछ और होता।
उनके बिना कभी-कभी हमारा आत्मविश्वास डोलने लगता है तो मेरी मां श्रीमती किरण चोपड़ा हमारा मनोबल बढ़ाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़तीं। मैं स्वयं पिताजी की तस्वीर के समक्ष खड़ा हो जाता हूं और उनका मार्गदर्शन प्राप्त करने का प्रयास करता हूं। कुछ ही क्षण बाद मेरा आत्मबल बढ़ जाता है और मैं सूर्य की पहली किरण के धरती पर पड़ते ही मजबूत इरादों के साथ काम में जुट जाता हूं। कई बार मैं उनके पुराने सम्पादकीय बार-बार पढ़ता हूं।
मुझे याद है िक बतौर सांसद उन्होंने लोकसभा में खड़े होकर चीन आैर पाकिस्तान की साजिशों के बारे में सरकार को आगाह किया था तो एक बड़े नेता ने उनके भाषण के बीच टोकाटाकी शुरू की तो उन्होंने अपनी वाणी से उस नेता को बैठने काे विवश कर दिया था। वे दूरदृष्टा थे और कई बार भविष्य में होने वाली घटनाओं पर अपना स्पष्ट आकलन प्रस्तुत कर देते थे। जो आज सत्य साबित हो रहा है। उनकी लेखनी दलगत राजनीति से कहीं ऊपर थी। यद्यपि वे भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर सांसद निर्वािचत हुए थे लेकिन उन्होंने बतौर सम्पादक अपने विचारों की व्यक्त करने में किसी दबाव को स्वीकार ही नहीं किया उनकी लेखनी के आलोचक भी कोई कम न थे लेकिन उनके विरोधी भी यह स्वीकार करते थे और अक्सर कहते थे ‘‘लिखने में तो अश्विनी को कोई जवाब नहीं।’’ जिस बात को कहने में बड़े-बड़े हिम्मत नहीं दिखाते, वह उन्हें शब्दों की चाश्नी में भिगोकर आसानी से कह देते थे। उनकी स्पष्टवादी और तीखी कलम के चलते ही पंजाब केसरी दिल्ली ने बहुत जल्द ही प्रतिष्ठा हासिल कर ली है।
मैं यह सोचकर आज भी सिहर उठता हूं कि मेरे पिता अश्विनी कुमार पहले आतंकियों की गोलियों से छलनी पड़दादा लाला जी का शरीर अपनी गोद में रखकर घर तक लाए, फिर आतंकवादियों की गोली से छलनी दादा रमेश चन्द्र जी का शरीर अपनी गोद में रखकर आवास पर लाए थे। घर के वट वृक्ष गिर गए थे। कोई और होता तो कब का टूट गया होता। चुनौतियों ने उन्हें निर्भीक और साहसी बना दिया था। उन्होंने मुझे हमेशा यही समझाया कि,
‘‘लेखनी सत्य के मार्ग पर चले, लेखनी कभी रुके नहीं,
लेखन कभी झुके नहीं और यह अनैतिक समझौता भी न करे,
यह राष्ट्र की अस्मिता की संवाहक है और राष्ट्र को समर्पित हो।’’
पिताजी भयावह परिस्थितियों में भी कभी टूटने का शिकार नहीं हुए। कैंसर से जूझते हुए भी अपनी आत्मकथा िलखते रहे। उन्होंने मुझे और मेरे भाइयों को कुम्हार की तरह तराशा। मेरी मां श्रीमती किरण चोपड़ा उन्हीं की प्रेरणा से सामाजिक कार्य और लेखन में निरंतर जुटी हुई हैं। आज उनकी पुण्यतिथि पर मैं अपना दायित्व कितना िनभा पाया इसका फैसला तो पंजाब केसरी के पाठक ही करेंगे। जिन्दगी धूप है तो पिता छाया थे। मेरी कलम ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है।


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