भारत में क्षेत्रीय दलों का भविष्य ?

Summary :

देश की वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियों के बीच क्षेत्रीय दलों की क्या हालत है और इनका भविष्य क्या है? इस सवाल पर खासी बौद्धिक कवायद चल रही है। इसका व्यापक उत्तर यही है कि स्वतन्त्र भारत में इन सभी दलों ने अपनी राजनैतिक हैसियत कांग्रेस पार्टी की कीमत पर ही बनाई है। अतः जैसे-जैसे कांग्रेस पार्टी कमजोर होती चली गई वैसे-वैसे ही देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों की स्थिति मजबूत होती चली गई। मगर इसका गूढ़ अर्थ यह भी निकलता है कि वैचारिक स्तर पर कांग्रेस पार्टी देश की राजनीति में कभी भी ‘असंगत’ होने वाली नहीं है मगर…

देश की वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियों के बीच क्षेत्रीय दलों की क्या हालत है और इनका भविष्य क्या है? इस सवाल पर खासी बौद्धिक कवायद चल रही है। इसका व्यापक उत्तर यही है कि स्वतन्त्र भारत में इन सभी दलों ने अपनी राजनैतिक हैसियत कांग्रेस पार्टी की कीमत पर ही बनाई है। अतः जैसे-जैसे कांग्रेस पार्टी कमजोर होती चली गई वैसे-वैसे ही देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों की स्थिति मजबूत होती चली गई। मगर इसका गूढ़ अर्थ यह भी निकलता है कि वैचारिक स्तर पर कांग्रेस पार्टी देश की राजनीति में कभी भी ‘असंगत’ होने वाली नहीं है मगर 1991 से भारत में शुरू हुए अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के दौर ने इसमें अचानक अवरोध पैदा कर दिया है और कांग्रेस की मूल विचार धारा को हाशिये पर धकेल दिया है।
दरअसल बाजार मूलक अर्थव्यवस्था का विचार गांधीवाद और कांग्रेसी समाजवाद के विचार के पूरी तरह विपरीत है जिसकी वजह से भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद व जातिवाद का तेजी से उदय भी हुआ है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश है जहां बहुजन समाज पार्टी व समाजवादी पार्टी जैसे सरीखों दलों ने पूरी राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव डाला। बेशक यह कहा जा सकता है कि इस राज्य में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू होने से पहले ही इन पार्टियों का उदय हो गया था जो कि अयोध्या में भाजपा के राम मन्दिर निर्माण आन्दोलन के उग्र होने का प्रतिफल था। मगर हमें देश की तत्कालीन आर्थिक परिस्थितियों पर भी ध्यान देना होगा।
1984 से लेकर 1989 तक देश में कांग्रेस की स्व. राजीव गांधी के नेतृत्व में सरकार काबिज थी। इस सरकार ने उस समय राजनीति में कार्पोरेटीकरण की शुरुआत इस विमर्श के साथ की कि इस धारा में प्रबुद्ध व्यावासायिक लोग आने चाहिए। स्व. राजीव गांधी के उस समय सबसे बड़े सलाहकार स्व. अरुण नेहरू व अरुण सिंह थे जो कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की अपनी शानदार नौकरी छोड़ कर राजनैतिक सलाहकार बने थे। इन लोगों की सलाह पर स्व. राजीव गांधी ने भारत की अर्थव्यवस्था के द्वार धीरे-धीरे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खोलने शुरू किये और राजनीति में पश्चिमी देशों की भांति व्यावसायिक विज्ञापन एजेंसियों की घुसपैठ करानी शुरू की। लेकिन इसके दूसरी तरफ भाजपा ने अपने हिन्दू मूलक राष्ट्रवाद के विचार को आगे बढ़ाना शुरू किया और राम मन्दिर आन्दोलन को इसका केन्द्र बिन्दु बनाया जिसकी वजह से कांग्रेस का वह विमर्श धराशायी होता चला गया जिसके चलते इस देश के हिन्दू समाज के गरीब-गुरबे व ग्रामीण जातियों के सूत्रधार इससे गांधी के समय से जुड़े हुए थे। मगर 1990 में मंडल कमीशन के लागू होने के बाद सामाजिक व राजनैतिक रूप से बड़ा प्रभाव पड़ा।
मंडल के प्रभाव से पिछड़ा वर्ग के अलग छिटक जाने की वजह से उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्यों में जाति आधारित राजनैतिक दलों व तात्कालिक क्षेत्रीय भावुकता भड़काने की वजह से क्षेत्रीय दलों के गठन को विस्तार मिला जो कि भाजपा के हिन्दू मूलक राष्ट्रवाद के विचार के भी विरुद्ध था। इन जातिवादी व क्षेत्रीय दलों ने सबसे पहले अपना लक्ष्य अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज को बनाया और कांग्रेस से कई हाथ आगे निकलकर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीतियों को सार्वजनिक रूप से बढ़ावा दिया जिसके कारण हिन्दू समाज के जातिवादी व क्षेत्रीय दलों का मुस्लिम गठजोड़ कांग्रेस को भीतर से खोखला करता चला गया।
दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा ने सम्पूर्ण हिन्दू समाज की एकता का आह्वान करते हुए मुस्लिम तुष्टीकरण के विरुद्ध सांस्कृतिक पहचान की मार्फत अलख जगाई जिसकी वजह से ग्रामीण भारत की आत्मगौरव की लालसा से भरी जातियों के लोग इसकी तरफ आकृष्ट हुए। लेकिन 2012 के अन्त में जब भाजपा ने श्री नरेन्द्र मोदी को अपना अगला प्रधानमन्त्री पद का प्रत्याशी घोषित किया तो उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति के आधारभूत मानकों को ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आगे रखते हुए बदल दिया जिससे भारत में हिन्दू राजनीति का पुनर्जागरण शुरू हुआ। वास्तव में इस पुनर्जागरण की जड़ें 1947 में हुए धर्म के आधार पर भारत के विभाजन से जुड़ी हुई थीं जिसमें कांग्रेस की तभी तक की मुस्लिम तुष्टीकरण नीतियों की प्रमुख भूमिका थी। कांग्रेस के लिए मुस्लिम तुष्टीकरण शब्द का प्रयोग सबसे पहली बार संविधान निर्माता डा. बाबा साहेब अम्बेडकर ने आजादी से भी पूर्व किया था। उनका यह मत पाकिस्तान निर्माण पर उनकी लिखी पुस्तक में उजागर होता है। उनका मानना था कि कांग्रेस के नेता मुस्लिम धर्मानुयायियों के कट्टरपन को जस का तस रूप में स्वीकार करने की मुद्रा में रहते हैं जिन्होंने अपनी वेषभूषा व लिबास तक को धर्म का अंग बना डाला है। श्री मोदी ने भारत की उस सोयी हुई चेतना को जगाने का काम किया जिसे आजादी के बाद बहुराजनैतिक व सामाजिक उपायों से सत्ताधारियों ने सुप्त रखने का यत्न किया था।
1931 में कराची में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन सरदार वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में हुआ था। यह सम्मेलन कांग्रेस के इतिहास और आजादी के आन्दोलन का एक मील का पत्थर माना जाता है क्योंकि इस सम्मेलन में कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित किया था भारत को पूर्ण आजादी मिलने के बाद इसके नागरिकों को विकसित देशों के नागरिकों के भांति ही मूलभूत मानवीय अधिकार दिये जायेंगे और प्रत्येक वयस्क को मताधिकार मिलेगा जिसके आधार पर सरकारों का गठन होगा। इस सम्मेलन में मुसलमानों को आश्वस्त किया गया था कि उहें भी अन्य नागरिकों के समान ही सभी अधिकार बराबरी के आधार पर दिये जायेंगे मगर उनके निजी घऱेलू कानूनों में सरकार हस्तक्षेप नहीं करेगी बेशक फौजदारी कानून उन पर भी अन्य नागरिकों के समान ही लागू होगा। दिक्कत यहां पैदा हुई कि जब 1947 में भारत के मुसलमानों के लिए अलग से पाकिस्तान देश का निर्माण हो गया तो उसके बाद भी पं. जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने कांग्रेस के 1931 के कराची प्रस्ताव को नहीं छोड़ा जिसके चलते स्वतन्त्र भारत में मुसलमानों को विशेष अनुग्रह का पात्र समझा जाने लगा और सरकार सर्वदा उनके धार्मिक अधिकारों को विशेष प्रश्रय देती रही।
जाहिर है इसकी कभी न कभी तीव्र सामूहिक प्रतिक्रिया तो होनी ही थी। अतः 2014 से हम देश की जो राजनीति देख रहे हैं वह आजाद भारत में बने नये सियासी मानकों की है और इसके प्रणेता श्री नरेन्द्र मोदी हैं। परन्तु भाजपा की इस राजनीति के चलते क्षेत्रीय दल स्वयं ही अपनी आभा खोते जा रहे हैं क्योंकि भाजपा ने सामाजिक से लेकर राजनैतिक स्तर तक क्षेत्रीय व जातिगत विमर्श को सकल हिन्दू समन्वीकरण में विलीन कर दिया है। चूंकि जातिगत व क्षेत्रीय दलों की पूरी राजनीति अवसरवाद व परिवारवाद तथा अधिनायकवाद पर टिकी हुई है तो उसके बिखरने की संभावनाएं भी ज्यादा बनी हुई हैं।
इस सिलसिले में हम प. बंगाल को देख सकते हैं जहां भाजपा विधानसभा चुनाव सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को बहुत धूम-धड़ाके के साथ हरा कर जीती है। इस पार्टी की हालत अभी से यह हो गई है कि इसके विधायकों व सांसदों ने टूटना शुरू कर दिया है। इसके बहुत से कारण और भी है जिनका खुलासा फिर कभी करूंगा, मगर इतना निश्चित है कि तृणमूल की टूट-फूट से इस पार्टी की सर्वेसर्वा सुश्री ममता बनर्जी का राजनैतिक भविष्य हाशिये पर जाने के अलावा और कुछ नहीं है। वैसे भी तृणमूल कांग्रेस मूल रूप से कांग्रेस के उधारी नेताओं से ही बनी थी।
अगर हम पूरे देश पर नजर दौड़ायें तो सभी जातिवादी व क्षेत्रीय दल भाजपा की शक्ति के आगे मात खाते जा रहे हैं। इसका एकमात्र कारण भाजपा का वह विमर्श है जो दक्षिण भारत को छोड़ कर शेष भारत के लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। लोकतन्त्र में इसकी अन्तिम व स्वाभविक परिणीति यही हो सकती है कि अन्त में जाकर राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस व भाजपा के बीच जमकर वैचारिक युद्ध हो मगर इसमें दिक्कत सिर्फ एक ही है कि आर्थिक नीतियों के मोर्चे पर कांग्रेस ही भारत की राजनैतिक धारा मोड़ने के लिए जिम्मेदार है।

Shera Rajput