भारत के अंतिम मुगल शहंशाह एवं प्रथम स्वाधीनता संग्राम के प्रथम पुरुष सम्राट बहादुर शाह जफर के वंशज अब एक साधारण जिंदगी जीने पर विवश हैं। अपने समय के इस महान शायर एवं मुगलिया सल्तनत के इस आखिरी चिराग के कुछ वंशज अब रंगून (म्यांमार, तब बर्मा) में रहते हैं और कुछ कोलकाता में एक स्टॉल लगाकर चाय बेचते हैं।
सन् 1857 की क्रांति के मध्य बहादुरशाह जफर को अंग्रेजी सेनाओं ने लालकिला से गिरफ्तार कर लिया था। उन पर मुकदमा भी चला और बाद में उन्हें देश-निर्वासन का दण्ड देकर रंगून (म्यांमार) भेज दिया गया था, जहां दवा-दारू व देखभाल के अभाव में उन्होंने अंतिम सांस ली थी। वहां उनकी उपेक्षित कब्र भी है जहां स्वतंत्र भारत के अनेक नेताओं ने अपने श्रद्धासुमन भी अपनी रंगून-यात्रा के मध्य चढ़ाए हैं। मगर पाकिस्तान या बंगलादेश का कोई नेता कभी वहां नहीं गया।
1847 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बाद उनके दो बेटों को बिना मुकदमा चलाए ही फांसी दे दी गई थी। इनमें वली अहद (युवराज) मिर्जा मुगल भी थे। जफर के साथ उनके बेटे मिर्जा जवान बख्त और उनकी पत्नी जीनत महल और पोते शाह अब्बास भी रंगून गए। शाह अब्बास ने वहीं शादी की और उनके वंशज आज भी म्यांमार में रहते हैं लेकिन वे सामान्य एवं नौकरी पेशा जीवन जीते हैं। कुछ वंशज भारत में भी हैं जो साधारण जीवन यापन करते हैं, जैसे कि टी स्टॉल लगाकर चाय बेचना।
मुगल साम्राज्य भले ही खत्म हो गया लेकिन बहादुर शाह जफर की विरासत, खासकर उनकी उर्दू शायरी एवं गजलों के रूप में आज भी जीवित है। कई लोग उनकी कब्र (जो रंगून में है) पर जाते हैं। उनके वंशज अब राजा या शासक नहीं बल्कि आम लोग हैं लेकिन मुगल इतिहास और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
उनके एक प्रपौत्र बेदार बख्त का परिवार इन दिनों हावड़ा के शिवपुरी इलाके की एक तंग गली में रहता है। हाल ही में परिवार की एक प्रपौत्र वधू का एक वक्तव्य मीडियाई चर्चा में आया है। ‘मेरा नाम रजिया सुल्ताना बेगम है। मैं मुगल सल्तनत के आखिरी बादशाह शाह जफर के पड़पोते मिर्जा बेदार बख्त की पत्नी हूं। 15 अगस्त, 1965 को मेरी शादी हुई थी। आज मेरी जिंदगी हावड़ा के शिवपुरी इलाके की एक तंग गली में सिमटकर रह गई है। शादी के बाद जिम्मेदारियां बढ़ीं लेकिन आमदनी नहीं। पति को शाही शौक थे, मगर जेब खाली रहती थी। मैंने जिल्द बांधने, लाख की चूड़ियां बनाने, निब वाले पेन के सॉकेट लगाने जैसे काम किए। उनके निधन के बाद हालात और बदतर हो गए। कई-कई दिन ऐसे आए जब बच्चों को सिर्फ पानी और सूखी ब्रेड मिली। मैंने कभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया।
आज भी दर्द तब और गहरा हो जाता है जब मैं दिल्ली जाकर अपने ही इतिहास को देखने के लिए टिकट खरीदती हूं। लाल किला जाने के लिए 50 रुपए और हुमायूं का मकबरा देखने के लिए 40 रुपए देने पड़ते हैं जबकि ये सब मेरे ही खानदान की विरासत हैं।
मेरे पति की मौत पर तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया था लेकिन उसके बाद जिंदगी ने कोई इज्जत नहीं दी। बाद में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने पेंशन बढ़ाई थी मगर वह किराए और इलाज में खत्म हो जाती है। मेरा एक ही सवाल है, ‘अगर मुगल शहंशाह जफर गद्दार नहीं थे तो उनके वंशज आज बेघर क्यों हैं? यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं बल्कि उस दर्द की दास्तान है जिसमें शाही अतीत और भूख से भरा वर्तमान आमने-सामने खड़ा है। जफर की आखिरी इच्छा भी अधूरी ही रही। वह चाहते थे कि महरौली में वहां दफन किया जाए जहां कुछ अन्य मुगल बादशाहों की कब्रें थीं। इस खाली कब्र वाले परिसर का नाम जफर-महल रखा गया था। यह स्थान सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काफी की दरगाह के पास है। इस इमारत के दो भाग हैं। एक महल वाला भाग है और दूसरा प्रवेश द्वार जिसे 19वीं सदी में जफर (द्वितीय) ने बनवाया था। रंगून में शेवदागोन पैगोड़ा के पास जफर और उनके बचे-खुचे परिवार को एक लकड़ी के छोटे से घर में रखा गया था। वहीं पर 1862 में 87 वर्ष की उम्र में भारत के इस आखिरी मुगल ने अंतिम सांस ली थी। उनके अंतिम दिनों में एक गजल का यह मिसरा बेहद लोकप्रिय हुआ था-
‘कितना है बदनसीब जफर,
दफन के लिए
दो गज जमीन भी न,
मिली कू-ए-यार में
पूरी गजल इस प्रकार थी-
लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में।
बुलबुल को बागबां से न सैयाद से गिला
किस्मत में कैद लिखी थी फसल-ए-बहार में।
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहां है दिल-ए-दागदार में।
इक शाख गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमान
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लाल-ए-जार में।
उम्र-ए-दराज मांग के लाये थे चार दिन
दो आरजू में कट गये, दो इन्तेजार में।
दिन जिन्दगी के खत्म हुए शाम हो गई
फैला के पांव सोएंगे कुंज-ए-मजार में।
कितना है बदनसीब ‘जफर’ दफन के लिए
दो गज जमीन भी न मिली कू-ए-यार में।।
‘लालकिला’ के वारिस बेचते हैं चाय
Summary :
भारत के अंतिम मुगल शहंशाह एवं प्रथम स्वाधीनता संग्राम के प्रथम पुरुष सम्राट बहादुर शाह जफर के वंशज अब एक साधारण जिंदगी जीने पर विवश हैं। अपने समय के इस महान शायर एवं मुगलिया सल्तनत के इस आखिरी चिराग के कुछ वंशज अब रंगून (म्यांमार, तब बर्मा) में रहते हैं और कुछ कोलकाता में एक स्टॉल लगाकर चाय बेचते हैं। सन् 1857 की क्रांति के मध्य बहादुरशाह जफर को अंग्रेजी सेनाओं ने लालकिला से गिरफ्तार कर लिया था। उन पर मुकदमा भी चला और बाद में उन्हें देश-निर्वासन का दण्ड देकर रंगून (म्यांमार) भेज दिया गया था, जहां दवा-दारू व…


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