गुरुद्वारों का लंगर कभी बंद नहीं हुआ

Summary :

दुनिया आज कई तरह की चुनौतियों से गुजर रही है। कहीं युद्ध का संकट है तो कहीं महंगाई और कहीं ईंधन की किल्लत लोगों के जीवन को प्रभावित कर रही है। हाल के समय में ईरान-इजराइल संघर्ष के कारण मध्य-पूर्व क्षेत्र में तनाव बढ़ा है, जिसका असर वैश्विक स्तर पर ईंधन आपूर्ति और कीमतों पर भी पड़ रहा है। भारत के कई हिस्सों में भी रसोई गैस सिलैंडर की कमी देखी जा रही है जिसका असर सीधा लोगों की दिनचर्या पर पड़ता दिख रहा है। रसोई गैस की सप्लाई ना मिलने के कारण कई शहरों में होटल, रेस्टोंरेट भी इससे…

दुनिया आज कई तरह की चुनौतियों से गुजर रही है। कहीं युद्ध का संकट है तो कहीं महंगाई और कहीं ईंधन की किल्लत लोगों के जीवन को प्रभावित कर रही है। हाल के समय में ईरान-इजराइल संघर्ष के कारण मध्य-पूर्व क्षेत्र में तनाव बढ़ा है, जिसका असर वैश्विक स्तर पर ईंधन आपूर्ति और कीमतों पर भी पड़ रहा है। भारत के कई हिस्सों में भी रसोई गैस सिलैंडर की कमी देखी जा रही है जिसका असर सीधा लोगों की दिनचर्या पर पड़ता दिख रहा है। रसोई गैस की सप्लाई ना मिलने के कारण कई शहरों में होटल, रेस्टोंरेट भी इससे प्रभावित हुए हैं तो वहीं गरीब वर्ग जिसके पास वैध गैस कनैक्शन नहीं होते और वह बाजार से रोज की जरुरत के हिसाब से सिलैंडर भरवा कर अपना जीवन बसर करते हैं उन्हें मौजूदा समय में काफी दिक्कत पेश आ रही है। वैसे तो बड़े सभी गुरुद्वारों में आजकल पी एन जी गैस पाईपलाईन लगी है पर फिर भी कई छोटे गुरुद्वारों में अभी भी लंगर के लिए गैस सिलैंडर का इस्तेमाल किया जाता है वहां लंगर के अन्य विक्लप अपनाए जा रहें हैंै। दिल्ली गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका, महासचिव जगदीप सिंह काहलो ने साफ किया है कि परिस्थितियां भले ही कैसी भी बन जाएं पर लंगर सेवा निरन्तर जारी रहेगी। इसी प्रकार तख्त पटना साहिब कमेटी ने भी लंगर सेवा में किसी तरह की रुकावट न आने की बात कही है। कमेटी के अध्यक्ष जगजोत सिंह सोही ने साफ किया कि इन परिस्थितियों के बावजूद एक बात पूरी तरह स्पष्ट है, गुरुद्वारों में चलने वाली लंगर सेवा पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। उल्टा लंगर खाने वालों की गिनती में बढ़ौतरी देखी जा रही है क्योंकि जिन लोगों को गैस सिलैंडर नहीं मिल पा रहा वह भी गुरुद्वारों का रुख किए हुए हैं। सिख परंपरा में लंगर केवल भोजन नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का ऐसा मिशन है जो हर हाल में जारी रहता है। सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी ने 550 वर्ष पूर्व लंगर सेवा की शुरुआत 20 रुपये के लंगर से की थी जो सदियों से उसी प्रकार चलता आ रहा है और रहती दुनिया तक चलता रहेगा। उन्होंने यह संदेश दिया था कि समाज में कोई ऊंच-नीच नहीं है और सभी मनुष्य एक समान हैं। इसी विचार को मजबूत करने के लिए उन्होंने “लंगर” की व्यवस्था शुरू की, जहां हर व्यक्ति एक पंक्ति में बैठकर समान भोजन ग्रहण करता है। लंगर की यह व्यवस्था केवल किसी संस्था या सरकार पर निर्भर नहीं होती, बल्कि संगत की सेवा और समर्पण पर आधारित होती है। कोई व्यक्ति अनाज दान करता है, कोई सब्जियां लाता है, कोई बर्तन साफ करता है और कोई भोजन बनाकर लोगों को परोसता है। यही कारण है कि इस सेवा को रोक पाना लगभग असंभव है। जब पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी के दौरान ठहर सी गई थी, तब भी गुरुद्वारों की लंगर सेवा लगातार चलती रही। लॉकडाउन के समय लाखों मजदूर, जरूरतमंद और बेसहारा लोग गुरुद्वारों से भोजन प्राप्त करते रहे।
सरकार की सिख गुरुओं के प्रति सोच में बदलाव
देश की कमान उन लोगों के हाथों में है जो गुरु तेग बहादुर जी की शहादत को ना सिर्फ नमन करते हैं बल्कि इस बात से भलि भान्ति वाकिफ भी हैं कि सिख गुरुओं की बदौलत ही उनका धर्म कायम है जिसका पुख्ता प्रमाण पंजाब में बदलाव रैली को सम्बोधन करते हुए गृह मंत्री अमित शाह के सम्बोधन में देखने को मिला। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सिख गुरु साहिबान की महान परंपराए उनके अद्वितीय बलिदान और मानवता के प्रति उनके योगदान को भावपूर्ण शब्दों में नमन किया। गृहमंत्री ने कहा कि सिख गुरु साहिबान ने केवल सिख समाज ही नहीं, बल्कि पूरे देश और मानवता को साहस, सेवाएं त्याग और धार्मिक स्वतंत्रता का मार्ग दिखाया है। उनके विचारों और शिक्षाओं ने भारत की आत्मा को मजबूत करने का कार्य किया है। वह मानते हैं कि गुरु साहिबान ने समाज को यह संदेश दिया कि सत्य, धर्म और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए हर कठिनाई का सामना किया जा सकता है। गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान भारत के इतिहास का ऐसा स्वर्णिम अध्याय है। जिसने धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत किया। पंजाब की धरती को गुरुओं, पीरों और वीरों की धरती बताते हुए साफ किया कि यह देशभक्ति, परिश्रम और बलिदान की पहचान रही है। गृह मंत्री ने साफ कर दिया है कि पंजाब में उनकी पार्टी की सरकार ही पंजाब को नशा मुक्ति कर सकती है। इससे पहले धर्म परिवर्तन पर भी उन्होंने सख्त रुख अपनाया था और अब भी सरकार बनते ही सबसे पहले जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून बनाने के स्पष्ट संकेत दिए। इसका लाभ यह मिलता है कि जब सरकार की सोच सिख गुरुओं और सिखों के प्रति ऐसी सोच बनने से समाज में सिखों के सम्मान में बढ़़ौतरी होना स्वभाविक ही है।
गृहमंत्री के बयान ने अकालियों की उम्मीदों पर पानी फेरा
पंजाब की राजनीति में बयान अक्सर सिर्फ शब्द नहीं होते। वह भविष्य की दिशा तय करते हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का यह कहना कि भारतीय जनता पार्टी पंजाब में अपने दम पर चुनाव लड़ेगी, महज एक रणनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश माना जा रहा है कि अब सहारे की राजनीति नहीं, विस्तार की राजनीति होगी। उनके इस बयान ने अकालियांे की उम्मीदों पर पूरी तरह से पानी फेर दिया है जो कि भाजपा से गठबंधन की उम्मीद लगाए बैठे थे। अकाली दल भलि भान्ति इस बात को समझता है कि बिना भाजपा के उसकी सरकार पंजाब में किसी सूरत मंे नहीं बन सकती। हिन्दू वोट अकाली दल को भाजपा के साथ गठबंधन के चलते ही मिला करते थे और अब तो सिख वोट भी बंटने की संभावना बनी हुई है। ज्यादातर सिख पंजाब में बेदबी के लिए अकाली दल को ही जिम्मेवार मानते हैं। वहीं जिस प्रकार सुखबीर सिंह बादल ने श्री अकाल तख्त साहिब के सामने पेश होकर अपने गुनाहों को कबूल किया और बाद मेें उनसे पलट गए उससे भी सिख समाज की सोच अकाली दल के प्रति बदलती दिखाई दे रही है। इसके साथ ही ज्ञानी हरप्रीत सिंह द्वारा बनाया गया अकाली दल पुनः सुरजीत भी बादल अकाली दल को टक्कर देगा जिससे सिख वोट का बंटवारा होना तय है। शायद इसी के चलते भाजपा ने अकाली दल की बैसाखी बनने से किनारा कर लिया है।
शिरोमणि अकाली दल आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां चुनौती सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि अपनी खोती हुई पहचान को वापस पाने की है। एक समय जो पार्टी पंथक राजनीति की धुरी मानी जाती थी, आज वह अपने ही पारंपरिक वोट बैंक में सेंध से जूझ रही है। ग्रामीण इलाकों में पकड़ कमजोर हुई है और शहरी मतदाता पहले ही दूर जा चुका है। भाजपा के “अकेले चुनाव” वाले रुख ने अकाली दल से वह सहारा भी छीन लिया, जिस पर वह वापसी की उम्मीद टिका रहा था। भाजपा अब पंजाब में “लंबी दौड़” की राजनीति खेलना चाहती है, जहां वह धीरे-धीरे अपना संगठन मजबूत करे, नए चेहरे तैयार करे और सिख समाज में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाए। ऐसे में 2027 में भले ही भाजपा अपने दम पर सरकार ना बना पाए मगर भविष्य में उसे इसका लाभ अवश्य मिलेगा।

Shera Rajput