सरकार ने वस्तु व सेवा कर (जीएसटी) नियमन अधिकारियों से व्यापारियों को नियमों के उल्लंघन या शुल्क वंचना के चलते गिरफ्तार कर जेल भेजने का अधिकार निरस्त करते हुए शुल्क वापसी (रिफंड) के दावों की अवधि भी 15 दिन से घटा कर दस दिन कर दी है, जिससे सामान्य कारोबारियों में शुल्क जमा कराने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल सके और देश में व्यापारियों के लिए सहृदयता का माहौल बन सके। किसी भी देश की आर्थिक तरक्की में कारोबारियों की निर्णयात्मक भूमिका होती है और उनके प्रति सकारात्मक माहौल बनाना सरकारों का कर्त्तव्य भी होता है। परन्तु भारत में सामान्य तौर पर व्यापारी वर्ग को शक की दृष्टि से देखा जाता है और उसकी ईमानदारी पर सवाल खड़ा किया जाता है जबकि 2017 से जो वस्तु एवं सेवा शुल्क प्रणाली शुरू की गई थी उसका मुख्य ध्येय व्यापारी वर्ग को कर या शुल्क चुकाने की स्वतःस्फूर्त बाध्यता थी। इस कार्य में सरकार को अपेक्षित सफलता भी मिली है जिसकी वजह से हर वर्ष जीएसटी शुल्क उगाही में वृद्धि हो रही है। मगर इस व्यवस्था में नौकरशाही की अकड़बाजी व्यवधान पैदा कर रही थी और व्यापारियों पर शुल्क विवाद होने पर जेल जाने का खतरा मंडराता रहता था।
सरकार ने अब इस पर लगाम लगाने का काम किया है हालांकि पांच राज्यों की सरकारों ने इस पर एतराज किया है परन्तु अधिसंख्य राज्य केन्द्र के इस फैसले से सहमत हैं। नये नियमों के अनुसार पांच करोड़ रुपये से कम के गड़बड़ी के मामलों को जुर्माना भरकर निपटाया जा सकेगा। जिससे एेसे मामलों में मुकदमा चलाने की सीमा भी एक करोड़ से बढ़ा कर पांच करोड़ रुपए कर दी गई है। व्यापारियों को अब रिफंड भी 15 दिन के स्थान पर दस दिन में ही वापस मिलने लगेगा। ये महत्पूर्ण फैसले गुरूवार को वस्तु एवं सेवा कर परिषद की बैठक में लिए गये जो कि केन्द्रीय वित्तमन्त्री श्रीमती निर्मला सीता रमण की अध्यक्षता में हुई थी। बैठक में फैसला किया गया कि दस हजार रुपए की कर-चोरी तक अब कारोबारियों को नोटिस जारी नहीं किया जायेगा तथा अभी तक जारी एेसे करीब 12 लाख नोटिसों को वापस लिया जायेगा। साथ ही जिन मामलों में कोई विशेष जुर्माना तय नहीं था उनमें लगने वाले 25 हजार रुपए के सामान्य जुर्माने को घटाकर दस हजार रुपए किया जायेगा। ये सभी बदलाव अगले वित्त वर्ष से लागू होंगे। इसका अर्थ यह निकलता है कि कर वंचना करने वाले व्यापारियों को सरकार संभलने का मौका दे रही है। मगर इसका मतलब यह भी नहीं है कि अपराध करने वाले व्यापारी भय मुक्त हो जायेंगे। एेसा करने वाले व्यापारियों पर मुकदमा चलाने का विकल्प खुला रहेगा जिसका फैसला न्यायालयों से होगा।
परिषद ने एक और महत्वपूर्ण फैसला यह भी किया है कि एक स्थान से दूसरे स्थान को माल ले जा रहे वाहनों को रास्ते में रोक कर जांच करने का अधिकार केवल जीएसटी अधिकारियों के पास ही होगा। यह जांच भी शुल्क विभाग को मिली किसी विशिष्ट गुप्तचर सूचना के आधार पर की जायेगी। सबसे बड़ी राहत व्यापारियों को यह मिली है कि शुल्क वंचना को सामान्यतः फौजदारी कानूनों से अलग कर दिया गया है परन्तु जिन लोगों ने आपराधिक नीयत से एेसा काम किया है उन्हें इससे छूट नहीं मिलेगी लेकिन साथ ही कोई भी अधिकारी इस तरह की नीयत होने का दावा करके किसी व्यापारी को गिरफ्तार नहीं कर सकेगा। इसके लिए बाकायदा मुकदमा चलाना पड़ेगा।
सभी जानते हैं कि पूरे देश के सभी राज्यों में सभी वस्तुओं पर एक समान शुल्क वसूली के उद्देश्य से 2017 में जीएसटी प्रणाली शुरू की गई थी। इसके लिए भारतीय संविधान में संशोधन किया गया था जिसके तहत राज्यों ने अपने राजस्व वसूली के अधिकार परिषद को समर्पित कर दिये थे। यह व्यवस्था भारत की संसद से बाहर परिषद स्थापित करके की गई थी। जिसमें राज्यों को दो-तिहाई अधिकार व केन्द्र को एक-तिहाई अधिकार दिये गये थे। परिषद की स्थापना करना एक बहुत टेढ़ा काम था जिसके लिए मनमोहन सरकार के समय से ही काम शुरू हो गया था। सबसे टेढ़ा काम यह था कि इसके लिए देश के सभी राज्यों की सहमति जरूरी थी क्योंकि राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों में प्रत्यक्ष बिक्रीकर लगाने से वंचित हो रही थीं। सभी राज्यों को इस मुद्दे पर एक मेज पर लाने के लिए मनमोहन सरकार में 2008 से 2012 तक वित्त मन्त्री रहे भारत रत्न स्व. प्रणाव मुखर्जी ने भगीरथ प्रयत्न किये थे। परन्तु 2012 में उनके राष्ट्रपति बन जाने के बाद इस पर काम 2014 तक आगे नहीं बढ़ सका और इसी वर्ष केन्द्र में मोदी सरकार के सत्ता पर काबिज होने के बाद वित्तमन्त्री बने स्व. अरुण जेतली ने इसे आगे बढ़ाया और बामुश्किल राज्यों की सहमति उत्पादन बहुल राज्यों की कुछ शर्तों के साथ प्राप्त की। जिसके तहत केन्द्र सरकार आगे कुछ वर्षों तक एेसे राज्यों की शुल्क कमी की आपूर्ति करती। मगर एक देश-एक शुल्क के दायरे में 2017 में भी राज्यों ने पेट्रोलियम पदार्थों व मदिरा को लाने से मना कर दिया और इन वस्तुओं पर अपने हिसाब से बिक्री कर लगाने का विकल्प खुला रखा। 2017 में जब जीएसटी लागू किया गया तो इसमें कई अनियमतताएं भी पाई गईं जिन्हे कालान्तर में केन्द्र सरकार ने कई चरणों में दुरुस्त किया। परन्तु इस सबके बावजूद देश के व्यापारियों पर शुल्क अधिकारियों की लाल फीताशाही का शिकंजा भी कसता रहा, जिससे निजात दिलाने का काम सरकार ने अब 2026 में जाकर किया है। इसकी असली वजह यह है कि जीएसटी निजाम के तहत अब हर छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा व्यापारी आता है। कोई भी कारोबार शुरू करने से पहले ही जीएसटी नम्बर लेना पड़ता है।
व्यापारियों को सहूलियतें
Summary :
सरकार ने वस्तु व सेवा कर (जीएसटी) नियमन अधिकारियों से व्यापारियों को नियमों के उल्लंघन या शुल्क वंचना के चलते गिरफ्तार कर जेल भेजने का अधिकार निरस्त करते हुए शुल्क वापसी (रिफंड) के दावों की अवधि भी 15 दिन से घटा कर दस दिन कर दी है, जिससे सामान्य कारोबारियों में शुल्क जमा कराने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल सके और देश में व्यापारियों के लिए सहृदयता का माहौल बन सके। किसी भी देश की आर्थिक तरक्की में कारोबारियों की निर्णयात्मक भूमिका होती है और उनके प्रति सकारात्मक माहौल बनाना सरकारों का कर्त्तव्य भी होता है। परन्तु भारत में सामान्य…


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