नगर कीर्तनों पर फिजूल खर्च बन्द होना चाहिए

सिख कौम के द्वारा गुरुपर्व के मौके पर नगर कीर्तन निकाले जाने की प्रथा सदियों से चलती आ रही है पर आज उसका प्रारुप बदलकर धार्मिक कम और दिखावा ज्यादा लगने लगा है। असल में होना यह चाहिए कि समूची संगत एकजुट होकर एक शहर में एक नगर कीर्तन निकालती जिसमें सारी संगत श्रद्धापूर्वक भाग लेकर सेवा करती। शहरों का दायरा बड़ा होने पर इसे जिला स्तर पर किया जा सकता था। मगर ऐसा नहीं होना चाहिए कि हर सिंह सभा अपने इलाके में अलग नगर कीर्तन निकाले, पश्चिमी दिल्ली में विष्णु गार्डन एरिया में तो एक ही दिन एक साथ कई नगर कीर्तन निकाले जाते हैं। इसमें जहां पैसे की बर्बादी होती है वहीं यह नगर कीर्तन मजाक बनकर रह गये हैं। सिंह सभाओं के प्रबन्धक अपनी चौधर के लिए नगर कीर्तन का आयोजन तो कर लेते हैं मगर उसकी शुरुआत के बाद वह केवल इलाके की संगत से अपना स्वागत कराने में ही लगे दिखाई देते हैं, पीछे नगर कीर्तन तो भगवान भरोसे ही बिना किसी अनुशासन के चल रहा होता है। नगर कीर्तन के रास्ते में संगतों के द्वारा जो स्टाल लगाए जाते हैं उनमें प्रशादि के साथ साथ स्वयं को दूसरों से अलग दिखाने के लिए ऊंचे ऊंचे स्वर में डीजे बजाए जाते हैं जिससे ध्वनि प्रदूषण भी बहुत अधिक होता है। अनुशासन का पालन ना होने के चलते राहगीरों को भी काफी दिक्कत पेश आती है। गुरु गोबिन्द सिंह जी के प्रकाश पर्व पर दिल्ली गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी के द्वारा जो नगर कीर्तन गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब से फतेह नगर को जाता है, उसमें ही अगर देखा जाए तो प्रशादि के बेतहाशा स्टाल लगाये जाते हैं जिसमें पैसे के साथ साथ अन्न की भी काफी बर्बादी होती है।
कौम वही तरक्की करती है जिसके बच्चे शिक्षित हों। एक शिक्षित बच्चा, अपने साथ-साथ ना जाने कितने अन्य लोगों का भी भविष्य उज्जवल बना सकता है। सिख कौम की प्राथमिकता बच्चों को एजुकेशन देने की होनी चाहिए मगर अफसोस कि कौम इसके पूर्णतः विपरीत चलती दिखाई देती है। सिख कौम में आज की तारीख में अनेक ऐसे लोग हैं जिनके पास गुरु साहिब की बख्शिश सदका बेतहाशा धन दौलत है, उसमें से अगर वह चुटकी भर भी बच्चों की एजुकेशन पर खर्च करने पर आए तो शायद ही कौम का कोई बच्चा बिना शिक्षा के रह जाये। ऐसे बच्चे जिनमें पढ़कर आईपीएस, आईएएस, डाक्टर, वकील आदि बनने की क्षमता तो है पर उनके माता पिता उनकी पढ़ाई पर होने वाले खर्च को वहन करने में असमर्थ हैं उन बच्चों को गोद लेकर धनवान सिखों को उन्हें पढ़ाना चाहिए। फरीदाबाद के बलविन्दर सिंह इस सेवा को निभा रहे हैं जो कि स्वयं भी इंजीनियर के पद से रिटायर्ड हुए और उनका पुत्र आईपीएस अधिकारी है, बच्ची डाक्टर है पूरा परिवार अपनी दसवंद को केवल जरुरतमंद बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करता है। अभी तक 10 के करीब बच्चों की यूपीएसई परीक्षा की तैयारी वह अपनी दसवंद से करवा रहे हैं। इसी तरह से भाजपा से जुड़े सिख नेता गुरमीत सिंह सूरा परिवार के द्वारा भी हर साल दो बच्चों को गोद लेकर पढ़ाया जाता है। कुछ एक संस्थाएं और परिवार ऐसे और भी हांेगे मगर यह तब तक संभव नहीं हो सकता जब तक समूची कौम की सोच में बदलाव नहीं आता।
गतका को खेलां में मान्यता
सिख कौम का पारंपरिक खेल गतका जिसे सिख मार्शल आर्ट भी कहा जाता है। गुरु गोबिन्द सिंह जी के समय से ही इस खेल की शुरुआत हुई थी और गुरु जी स्वयं टीमें बनवाकर गतका की प्रतियोगिताएं भी करवाया करते थे। अभी भी आनंदपुर साहिब और तख्त सचखण्ड हजूर साहिब में महल्ला करवाकर गतका करवाया जाता है। इसके इलावा अभी तक गतका का प्रदर्शन केवल नगर कीर्तन के दौरान ही देखने को मिलता था। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से गतका को ओलंपिक में शामिल कर लिया गया है। लेकिन राष्ट्रीय खेलों में शामिल करते समय खिलाड़ियों की वेशभूषा को लेकर जो मापदण्ड तय किये गये हैं उस पर सिख समाज को आपत्ति है और उनकी मांग है कि निहंग वेशभूषा में खिलाड़ियों को गतका खेलने की मान्यता मिलनी चाहिए। कई टीवी शौ में भी गतका का प्रदर्शन किया जा चुका है जिसके बाद से इसे खेलने में युवाओं की दिलचस्पी बढ़ने लगी है। लड़कियां भी आगे आकर अब इसकी सिखलाई लेने लगी है क्यांकि इसे सीखने के बाद वह अपनी आत्मरक्षा भी करने में सक्षम हो जाती हैं। गतका को अब तो फिल्मों में भी लिया जाने लगा है, हाल ही में गतका पर बनी फिल्म ‘‘जट्टा डोली ना’’ रिलीज हुई है जिसमें दिखाया गया है कि फिल्म का हीरो किरनदीप सिंह रयात एक बिगड़ा हुआ शख्स होता है पर एक लड़की के प्यार में आकर उसे पाने हेतु वह गतका की सिखलाई लेता है और गतका सीखकर वह विजय तो होता ही है पर उसका जीवन पूरी तरह से धार्मिक हो जाता है। गुरुद्वारा सिंह सभा राजौरी गार्डन के प्रधान हरमनजीत सिंह का मानना है कि सिख युवाओं और खासकर लड़कियों को गतका की सिखलाई अवश्य लेनी चाहिए, जो कि आजकल तकरीबन सभी गुरुद्वारा साहिब में दी भी जाती है। उनके अधीन चल रहे गुरु नानक पब्लिक स्कूल राजौरी गार्डन में बुड़डा दल गतका अकादमी के साथ मिलकर बच्चों को गतका सिखाया जाता है। आल इन्डिया रामगढ़िया विश्वकर्मा फैडरेशन के मुखी सुखदेव सिंह रयात का कहना है कि हमें अपने बच्चों को गतका पर बनी फिल्म अवश्य दिखानी चाहिए ताकि बच्चों में गतका के प्रति रुचि बन सके। हिम्मत सिंह की माने तो फिल्म बनाने वालों ने अच्छा प्रयास किया है पर और बेहतर होता अगर फिल्म में हीरो के किरदार को पूर्ण सिखी स्वरूप में रहकर निभाया जाता।
अखिल भारतीय दंगा पीड़ित राहत कमेटी का बढ़ने लगा दायरा
नवम्बर 1984 में देश की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद समूचे देश में सिखों का कत्लेआम हुआ। 3 दिन तक दिल्ली, कानपुर, बोकारो सहित देश के अन्य राज्यों में हैवानियत का नंगा नाच खेला गया मगर अफसोस कि कत्लेआम होता सभी ने देखा पर गवाही देने के लिए कोई आगे नहीं आया। उस समय सरकार ने सी​िनयर सिख लीडरशिप को जेलों मे डाल दिया ताकि वह इन्साफ की गुहार ही ना लगा सकें। मगर फिर भी जत्थेदार अवतार सिंह हित, जत्थेदार कुलदीप सिंह भोगल ने आगे आकर जस्टिस आर एस सोढी और राम जेठ मलानी के साथ मिलकर अखिल भारतीय दंगा पीड़ित राहत कमेटी का गठन किया। तब से लेकर आज तक कमेटी पीड़ितों को इन्साफ और कातिलों को सजा दिलाने के लिए संघर्ष करती आ रही है। शिरोम​िण अकाली दल के तत्कालीन अध्यक्ष प्रकाश सिंह बादल के द्वारा दोनों अकाली नेताओं को विश्वास दिलाया गया था कि उनकी सरकार आने के बाद कमेटी की हर संभव मदद करते हुए काबिल वकील भी मुहैया करवाए जायेंगे मगर अफसोस कि ऐसा हुआ नहीं। शिरोमणी कमेटी पर निरन्तर अकाली दल के पास है, दिल्ली कमेटी में भी कई साल तक अकाली दल की कमेटी रही मगर अखिल भारतीय दंगा पीड़ित राहत कमेटी की कोई मदद उनके द्वारा नहीं की गई। जत्थेदार अवतार सिंह हित तो अब इस संसार में रहे नहीं मगर कुलदीप सिंह भोगल दिल्ली, कानपुर और बोकारो में जाकर अपने दम पर हर संभव प्रयास करते आ रहे हैं कि किसी भी तरह से कातिलों को सजाएं मिल सके। जत्थेदार कुलदीप सिंह भोगल के द्वारा संस्था का दायरा बढ़ाने हेतु कानपुर के मोहकम सिंह, बोकारो के जसविन्दर सिंह, दिल्ली के अजीत सिंह रोशनारारोड आदि को संस्था में शामिल किया जा रहा है ताकि भविष्य में उनके साथ मिलकर इस मुहिम को जारी रखा जाए।

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