पड़ोसी देश नेपाल में हुए आम चुनावों में वहां की राजनीति में बड़ा उल्टफेर हो चुका है। चुनाव में काठमांडौ के पूर्व मेयर बालेन्द्र शाह की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी प्रचंड बहुमत की ओर अग्रसर है। जबकि दशकों से सत्ता में रहे पारम्परिक दल बुरी तरह से पिछड़ गए हैं। भारत विरोधी पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को अपने निर्वाचन क्षेत्र में ही बालेन्द्र शाह से हार का मुंह देखना पड़ा है। के.पी. शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल), पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प दहल प्रचंड की सीपीएम (माओइस्ट सैंटर) और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देऊबा की नेपाली कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। बालेन्द्र शाह जिन्हें बालेन शाह भी कहा जाता है, का प्रधानमंत्री बनना तय है। वह भारत के बेलगांव (कर्नाटक) से इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त कर नेपाल की राजनीति में कूदे थे। वे एक लोकप्रिय रैपर अैर यूट्यूबर बने और फिर काठमांडौ के मेयर बने। उन्होंने नेपाल की राजनीति की तस्वीर बदल कर रख दी है। बालेन्द्र उन प्रदर्शनकारियों में से थे जो सितम्बर 2025 में सड़कों पर उतरे थे और जेन-जी आंदोलन के कारण उस समय की के.पी. शर्मा ओली सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था। नेपाल का जनादेश नेतृत्व में पीढ़ीगत बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। नेपाल की जनता को जेन-जी की नई सरकार से बहुत उम्मीदें हैं।
नेपाल में 19 मिलियन पंजीकृत मतदाताओं में से 60 प्रतिशत ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। जिन मुद्दों पर चुनाव लड़े गए वे वही थे जो पिछले साल के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान उठाए गए थे। चुनावी मुद्दों में घोटाले, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, पलायन, असमानता और कमजोर आर्थिक हालत शामिल रहे। हमारे आस-पड़ोस श्रीलंका और बांग्लादेश में भी किशोरों, नौजवानों ने अपने-अपने निजाम की चूलें हिसा दी थीं और इन देशों में लोकप्रिय सरकारों का गठन हो चुका है। नेपाल तीसरा देश है जहां जेन-जेड की सरकार बन रही है। नेपाल की राजनीति में 2008 में राजशाही के खात्मे के बाद लोकतंत्र का सूर्य जरूर निकला मगर राजनीतिक स्थिरता मृगतृष्णा ही बनी रही। इस छोटे से देश ने 17 साल में 14 प्रधानमंत्रियों को आते-जाते देखा और सत्ता की बंदरबांट को लगातार देखा। माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड हों या शेर बहादुर देऊबा, मधेसी आंदोलन से उपजे नए नेता हों या फिर के.पी. शर्मा ओली कभी विश्वासघात ने, कभी गठबंधन की जंग ने और कभी जनता के गुस्से ने प्रधानमंत्रियों को कुर्सी छोड़ने पर मजबूर किया। हर चेहरा सत्ता में आया लेकिन स्थिरता लाने में नाकाम रहा। औसतन हर 14, 15 महीने में नेपाल के लोगों को नया प्रधानमंत्री मिला। जनता ने सोचा था कि अब देश नई दिशा में आगे बढ़ेगा। गरीबी हटेगी, रोजगार मिलेगा, बुनियादी ढांचा सुधरेगा और पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंध बनेंगे लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल उल्ट निकली। नेपाल में नया संविधान बनाने और उसको लागू करने में उथल-पुथल मची रही। आंदोलनों का दौर चला। शासन में नेपाल के भारत से संबंध काफी तनावपूर्ण रहे और उन्होंने नेपाल को पूरी तरह चीन के हाथों गिरवी रख दिया था। भारत और नेपाल के संबंध रोटी और बेटी के रहे हैं। हालांकि संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव भी आता रहा है। भारत न केवल नेपाल का निकटतम बाजार है, बल्कि व्यापार, ऊर्जा, आपूर्ति और मौद्रिक स्थिरता का प्रमुख केन्द्र भी है। नेपाल के कुल व्यापार में नई दिल्ली के साथ व्यापार का हिस्सा लगभग 63 फीसदी है। जिसमें भारत उसके निर्यात का 68 प्रतिशत हिस्सा ग्रहण करता है। भारत ने हर संकट में नेपाल की सहायता ही की है। काफी हद तक नेपाल भारत पर निर्भर रहा है। नेपाल की सियासत में चीन का हस्ताक्षेप बढ़ने से संबंधों पर काफी प्रभाव पड़ा है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नेपाल की नई सरकार के भारत के साथ संबंध कैसे रहेंगे। बालेन्द्र शाह के कुछ पुराने बयानों ने भारत को चिंता में डाला था। 2023 में उन्होंने बालीवुड फिल्म में सीता को ‘भारत की बेटी’ कहने पर भारतीय फिल्मों पर बैन की मांग की थी, क्योंकि नेपाली परंपरा में सीता का जन्म नेपाल या नेपाल-बिहार बॉर्डर पर माना जाता है। उसी साल उन्होंने अपने ऑफिस में ‘ग्रेटर नेपाल’ का मैप लगाया था, जिसमें कुछ भारतीय क्षेत्र शामिल थे और इसे भारत के संसद में ‘अखंड भारत’ म्यूरल का जवाब बताया। वर्ष 2025 में एक पोस्ट में भारत, अमेरिका और चीन के खिलाफ गाली-गलौज वाली भाषा इस्तेमाल की, जिसे बाद में डिलीट कर दिया लेकिन हाल के महीनों में उनके रुख में बदलाव दिखा है। आरएसपी के मेनिफेस्टो से चीन की बीआरआर से जुड़े दमक इंडस्ट्रियल पार्क प्रोजेक्ट को हटा दिया गया, जो ओली के गढ़ झापा-5 में था। यह भारत के लिए राहत की बात है, खासकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा के लिहाज से आरएसपी बैलेंस्ड विदेश नीति पर जोर दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि शासन का सीमित अनुभव होने के कारण बालेन्द्र शाह की विदेश नीति कभी-कभी अप्रत्याशित हो सकती है। जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए नई सरकार को भारत और चीन के साथ संतुलन बनाकर चलना होगा। नई सरकार के घरेलू रोजगार सृजन, अर्थव्यवस्था में सुधार, महंगाई नियंत्रण पर अत्याधिक ध्यान देना होगा। लोगों की चिंता का मूल कारण गहरी आर्थिक कमजोरी है। नेपाल की नाजुक अर्थव्यवस्था को नई सरकार किस तरह से सम्भालती है यह अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती है। भारत और नेपाल में कई संधियां हैं। पुरानी संधियों को लेकर भी कुछ मतभेद बने हुए हैं। नेपाल की नई सरकार को भारत के साथ संधियों को चाहे वह जल-विद्युत परियोजना हो या अन्य संबंध उन्हें विश्वसनीय अनुबंधों में बदलना होगा और भारत के साथ संबंधों को दिखावे की बजाय पेशेवर तरीके से प्रबंधित करना होगा। नेपाल की नई सरकार को चीन से भी सतर्क रहना होगा, क्योंकि चीन पहले सहायता करता है फिर छोटे देशों को ऋण के जाल में फंसाता है, फिर उनकी भूमि हड़प लेता है। चीन ने श्रीलंका और अन्य देशों में ऐसा ही किया है। नए नेतृत्व को स्वच्छ शासन की छवि बनानी होगी। वैश्विक और क्षेत्रीय परिस्थितियां भी नई सरकार के लिए एक चुनौती है। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए नई पीढ़ी को धैर्य और प्रतिबद्धता की जरूरत होगी। नेपाल में एक ही पार्टी को बहुमत मिलना नेपाली जनता की राजनीतिक स्थिरता की इच्छा को भी दर्शाते हैं। नेपाल में स्थिर एवं मजबूत सरकार का बनना भारत के लिए बेहतर होगा। इसकी उम्मीद की जा सकती है।



















