Bhishma Pitamah Iccha Mrityu Boon: महाभारत के सबसे शक्तिशाली योद्धाओं में भीष्म पितामह का नाम सबसे ऊपर आता है। पितामह के जीवन की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्हें ‘इच्छामृत्यु’ का वरदान मिला था, यानी वे जब चाहें, तब अपने प्राण त्याग सकते थे। कुरुक्षेत्र के युद्ध में वे कौरवों की सेना के सेनापति थे और पांडवों के लिए उन्हें हराना बहुत बड़ी चुनौती थी। युद्ध के दौरान जब अर्जुन के बाणों से घायल होकर वे तीरों की शय्या (बिस्तर) पर गिरे, तब भी उनकी मृत्यु नहीं हुई, क्योंकि वे अपनी इच्छा से सही समय का इंतजार कर रहे थे।
भीष्म पितामह ने तुरंत प्राण नहीं त्यागे, बल्कि वे कई दिनों तक तीरों पर लेटे रहे। इसका कारण यह था कि वे सूर्य के ‘उत्तरायण’ होने का इंतजार कर रहे थे। ऐसी मान्यता है कि उत्तरायण के समय शरीर छोड़ने से आत्मा को मोक्ष मिलता है। इसी वजह से वे कष्ट सहते हुए भी सही समय का इंतजार करते रहे और जब सही समय आया, तभी उन्होंने अपने प्राण त्यागे। चलिए जानते हैं भीष्म पितामह कौन थे, और उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान किसने और क्यों दिया था।
Who was Bhishma Pitamah: भीष्म पितामह कौन थे?
भीष्म पितामह हस्तिनापुर के राजा शांतनु और माता गंगा के आठवें पुत्र थे। उनका असली नाम ‘देवव्रत’ था। वे बचपन से ही बहुत बहादुर और विद्वान थे। उन्होंने महान योद्धा परशुराम जी से युद्ध की शिक्षा ली थी। राजा शांतनु ने उन्हें हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी भी बना दिया था।
बाद में, जब राजा शांतनु को सत्यवती नाम की एक कन्या से प्रेम हुआ, तो सत्यवती के पिता ने एक शर्त रखी कि हस्तिनापुर का अगला राजा केवल उनकी बेटी का पुत्र ही बनेगा। इस शर्त के कारण राजा शांतनु दुखी हो गए, क्योंकि वे देवव्रत को ही राजा बनाना चाहते थे।
Bhishma Pitamah Iccha Mrityu Boon: भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान कैसे मिला?
अपने पिता की खुशी के लिए देवव्रत ने एक बहुत बड़ा त्याग किया। उन्होंने न केवल राजा बनने का अपना हक छोड़ दिया, बल्कि यह भी प्रतिज्ञा ली कि वे जीवनभर शादी नहीं करेंगे। उनकी इस कठिन प्रतिज्ञा के कारण ही उन्हें ‘भीष्म’ कहा जाने लगा। पुत्र के इस महान त्याग से खुश होकर राजा शांतनु ने उन्हें यह वरदान दिया कि वे अपनी इच्छा से ही मृत्यु का चुनाव कर सकेंगे।
राजा शांतनु के बाद भीष्म पितामह हमेशा हस्तिनापुर के सिंहासन के प्रति वफादार रहे। इसीलिए वे महाभारत के युद्ध में कौरवों की तरफ से लड़े, भले ही वे जानते थे कि कौरव गलत रास्ते पर हैं। युद्ध में घायल होने के बाद, वे लगभग 58 दिनों तक तीरों पर लेटे रहे और सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की। अंत में, भगवान श्रीकृष्ण को याद करते हुए उन्होंने खुशी-खुशी अपने प्राण त्याग दिए।
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