नई दिल्ली, 26 जनवरी (आईएएनएस)। थायराइड और शुगर आज की युवा पीढ़ी में बढ़ती बीमारियों में से एक है। युवाओं से लेकर बच्चों तक में थायराइड और शुगर के लक्षण देखे जा रहे हैं, लेकिन आज हम थायराइड से जुड़े मिथकों के बारे में जानेंगे।
दशकों से हमें सिखाया गया है कि थायराइड से बचने के लिए ‘आयोडीन युक्त नमक’ ही एकमात्र उपाय है, लेकिन ये आधा सच है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और प्राचीन आयुर्वेद ने आयोडीन को महत्व दिया है, लेकिन ये भी माना है कि सिर्फ आयोडीन काफी नहीं है।
चिकित्सा विज्ञान और प्राचीन आयुर्वेद ने थायराइड ग्रंथि को सुचारू रूप से चलाने के लिए सिर्फ आयोडीन को जरूरी नहीं माना है। थायराइड ग्रंथि के लिए सेलेनियम और जिंक भी जरूरी हैं। इन दोनों के बिना थायराइड ग्रंथि को सही तरीके से काम करने में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। आयुर्वेद में थायराइड ग्रंथि के रोग को कफ और मेद धातु दूषित से जोड़कर देखा गया है, जिसमें गले में कई विषाक्त पदार्थ जमा होने लगते हैं, जो लंबे समय तक रहने पर गले में संक्रमण और बीमारी का कारण बनते हैं। इससे गले में सूजन होने लगती है, निगलने में परेशानी होती है और तेज बोलने में भी दिक्कत होने लगती है।
आयुर्वेद थायराइड को केवल एक हॉर्मोनल समस्या नहीं, बल्कि हमारे शरीर की ‘अग्नि’ (मेटाबॉलिज्म) का मंद होना मानता है। थायराइड ग्रंथि को सुचारु रूप से चलाने के लिए आयोडीन के साथ सेलेनियम और जिंक दोनों बहुत जरूरी हैं, क्योंकि ये टी-3 और टी-4 को सक्रिय तरीके से काम करने में मदद करते हैं।
थायराइड ग्रंथि मुख्य रूप से दो हार्मोन टी-3 और टी-4 (निष्क्रिय) बनाती है। सेलेनियम निष्क्रिय T4 को सक्रिय T3 में बदलने में मदद करता है और सक्रिय बनाता है। अगर शरीर में आयोडीन और सेलेनियम दोनों हैं, तो शरीर हार्मोन का उत्पाद और उपयोग दोनों ही सही तरीके से कर पाएगा। शरीर में सेलेनियम के साथ जिंक भी होना जरूरी है। जिंक रिसेप्टर्स को सक्रिय करता है, जिससे कोशिकाएं थायराइड हॉर्मोन को पहचान कर उन्हें ग्रहण कर सकें।
आयुर्वेद में थायराइड के लिए ऐसे घरेलू उपाय बताए गए हैं, जिनसे थायराइड को नियंत्रित किया जा सकता है, जैसे मेथी का पानी पीना, हरा धनिया का सेवन करना और कद्दू के बीज को आहार में शामिल करना। कद्दू के बीज में जिंक और सेलेनियम दोनों पाए जाते हैं।
–आईएएनएस
पीएस/वीसी
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