बीरभूम का सियासी गणित: विधानसभा में टीएमसी का एकतरफा राज, भाजपा के लिए सफर कितना मुश्किल?

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कोलकाता, 17 मार्च (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल का बीरभूम संसदीय क्षेत्र कभी वामपंथियों का अभेद्य किला हुआ करता था, जो अब टीएमसी का गढ़ है, जहां भाजपा अपनी बढ़त बनाने की लगातार कोशिश कर रही है। यह एक ग्रामीण जिला है। जिले का उत्तरी हिस्सा (मुर्शिदाबाद सीमा के पास) मुस्लिम बहुल है। वहीं, दक्षिणी और पश्चिमी बीरभूम में हिंदू बहुसंख्यक हैं, जिनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (मुख्य रूप से संथाल) का एक बड़ा और निर्णायक हिस्सा है। बीरभूम लोकसभा क्षेत्र संख्या 42 के अंतर्गत सात विधानसभा सीटें आती हैं। 2021 के भयंकर ध्रुवीकरण वाले चुनावों में टीएमसी ने यहां एकतरफा…

कोलकाता, 17 मार्च (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल का बीरभूम संसदीय क्षेत्र कभी वामपंथियों का अभेद्य किला हुआ करता था, जो अब टीएमसी का गढ़ है, जहां भाजपा अपनी बढ़त बनाने की लगातार कोशिश कर रही है। यह एक ग्रामीण जिला है। जिले का उत्तरी हिस्सा (मुर्शिदाबाद सीमा के पास) मुस्लिम बहुल है। वहीं, दक्षिणी और पश्चिमी बीरभूम में हिंदू बहुसंख्यक हैं, जिनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (मुख्य रूप से संथाल) का एक बड़ा और निर्णायक हिस्सा है।

बीरभूम लोकसभा क्षेत्र संख्या 42 के अंतर्गत सात विधानसभा सीटें आती हैं। 2021 के भयंकर ध्रुवीकरण वाले चुनावों में टीएमसी ने यहां एकतरफा दबदबा बनाया था।

मुरारई : यह सीट टीएमसी का सबसे मजबूत अभेद्य किला है। यह अत्यधिक मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। 2021 में यहां से टीएमसी के मोशर्रफ होसैन ने 45 प्रतिशत से अधिक के विशाल अंतर से जीत दर्ज की थी।

नलहाटी : यह भी अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र है। टीएमसी के राजेंद्र नारायण दास यहां से मौजूदा विधायक हैं। बंगाली मुस्लिम मतदाताओं के रणनीतिक मतदान के कारण 2021 में उन्होंने लगभग 28 प्रतिशत के भारी अंतर से जीत हासिल की थी।

हंसन : ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर आधारित इस सीट पर भी अल्पसंख्यकों का अच्छा प्रभाव है। टीएमसी के दिग्गज नेता अशोक कुमार चट्टोपाध्याय यहां से विधायक हैं, जिन्होंने 2021 में आसानी से जीत दर्ज की थी।

रामपुरहाट : यह एक मिश्रित आबादी वाली सामान्य सीट है। यहां से टीएमसी के वरिष्ठ नेता और राज्य विधानसभा के उपाध्यक्ष आशीष बनर्जी विधायक हैं। 2021 में यहां मुकाबला कड़ा था और जीत का अंतर केवल 4 प्रतिशत रहा था।

सिउड़ी : यह जिला मुख्यालय है। हिंदू बहुल और उच्च दलित आबादी वाली इस सीट पर शहरी प्रभाव भी है। टीएमसी के बिकाश रॉय चौधरी यहां से विधायक हैं, लेकिन 2021 में उनकी जीत का अंतर महज 3.4 प्रतिशत था।

सैंथिया (एससी) : यह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। राज्य सरकार की ‘लक्ष्मीर भंडार’ जैसी कल्याणकारी योजनाओं का यहां भारी असर है। टीएमसी की नीलाबती साहा यहां से मौजूदा विधायक हैं और उन्होंने 2021 में शानदार जीत दर्ज की थी।

दुबराजपुर (एससी) : पूरे जिले में यह एकमात्र सीट है जो भाजपा के पास है। 2021 की टीएमसी लहर में भी भाजपा के अनूप कुमार साहा ने करीब 1.9 प्रतिशत के मामूली अंतर से जीत हासिल की।

बीरभूम की करीब 80 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। इस संसदीय क्षेत्र का नेतृत्व टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय करती हैं।

2024 के लोकसभा चुनावों में शताब्दी रॉय ने भले ही 47 प्रतिशत वोट लेकर बंपर जीत दर्ज की, लेकिन असली कहानी कांग्रेस के प्रदर्शन में छिपी थी। कांग्रेस उम्मीदवार मिल्टन रशीद का वोट शेयर लगभग 10 प्रतिशत उछलकर 14.81 प्रतिशत हो गया, वहीं भाजपा का वोट शेयर 5 प्रतिशत गिर गया।

15 मार्च को चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी है। पश्चिम बंगाल में इस बार दो चरणों में चुनाव होने हैं, जिसके लिए 23 और 29 अप्रैल की तारीख निर्धारित की गई है। वहीं, वोटों की गिनती 4 मई को की जाएगी।

दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव से पहले ही बड़ा दांव चल दिया। चुनाव आयोग की घोषणा से पहले ही राज्य कर्मचारियों-पेंशनरों को बकाया महंगाई भत्ता देने का ऐलान कर दिया और इसके साथ ही राज्य के पुजारी-मुअज्जिनों के मानदेय में 500 रुपए की बढ़ोतरी करने की घोषणा की।

–आईएएनएस

वीकेयू/वीसी

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