नई दिल्ली, 26 जून (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर के लिए मिले दान में कथित गड़बड़ी की जांच के बीच शुक्रवार को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
राम मंदिर के लिए मिले दान में 7 करोड़ रुपए से ज्यादा की हेराफेरी के आरोप के बाद मंदिर प्रशासन में हो रहे बदलावों के तहत इन इस्तीफों को एक अहम कदम माना जा रहा है। हालांकि वे सीधे तौर पर इसमें शामिल नहीं थे, लेकिन बढ़ती जांच के बीच उनके फैसलों को नैतिक जिम्मेदारी लेने के तौर पर देखा जा रहा है।
राम मंदिर के चंदा चोरी मामले ने पूरे देश में एक बहस छेड़ दी है, जिससे मंदिर प्रशासन में लोगों का भरोसा डगमगा गया है।
एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम को दान के लेन-देन में गड़बड़ी मिली, जिसके बाद आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया।
हालांकि चंपत राय और अनिल मिश्रा पर सीधे तौर पर कोई आरोप नहीं था, लेकिन अपनी लीडरशिप भूमिकाओं के कारण वे इस विवाद के केंद्र में आ गए।
दोनों ने मंदिर ट्रस्ट से इस्तीफा दे दिया, ताकि निष्पक्ष जांच हो सके और राम मंदिर की पवित्रता बनी रहे।
80 साल के चंपत राय उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में पैदा हुए थे और सार्वजनिक जीवन में आने से पहले केमिस्ट्री के प्रोफेसर थे। वह कम उम्र में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (संघ) से जुड़ गए थे और बाद में 1980 में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) में शामिल हो गए। राम मंदिर के लिए दशकों तक चले संघर्ष में वे एक अहम चेहरा थे। इमरजेंसी के दौरान उन्होंने 18 महीने जेल में बिताए, जिससे उस मकसद के लिए काम करने का उनका संकल्प और मजबूत हुआ जिसमें वे यकीन रखते थे।
अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद फरवरी 2020 में ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ बनाया गया और चंपत राय को इसका जनरल सेक्रेटरी नियुक्त किया गया। कहा जाता है कि वे मंदिर के निर्माण, प्रशासन और दान के मैनेजमेंट की देखरेख कर रहे थे।
वहीं अनिल मिश्रा ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के ट्रस्टी थे, जिनका काम अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण और मैनेजमेंट की देखरेख करना था। उनकी भूमिका मुख्य रूप से प्रशासनिक थी। वे दान के लेन-देन और संगठन से जुड़े कामों समेत मंदिर के कामकाज की देखरेख के लिए दूसरे ट्रस्टियों के साथ मिलकर काम करते थे।
मंदिर ट्रस्ट में शामिल होने से पहले अनिल मिश्रा अयोध्या के नागरिक और सामाजिक हलकों में एक स्थानीय हस्ती के तौर पर जाने जाते थे और प्रशासनिक व सामुदायिक गतिविधियों में शामिल रहते थे। उनका बैकग्राउंड राष्ट्रीय स्तर की सक्रियता के बजाय स्थानीय प्रशासन और संगठन से जुड़े कामों में ज्यादा रहा था। ट्रस्टी के तौर पर उनकी नियुक्ति से पता चलता है कि ट्रस्ट अयोध्या के मंदिर और वहां के समुदाय से मजबूत जुड़ाव रखने वाले लोगों को शामिल करना चाहता था।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रस्टी के तौर पर मिश्रा मंदिर में मिलने वाले दान और चढ़ावे की देखरेख के लिए जिम्मेदार थे। इस भूमिका की वजह से वे आर्थिक कामकाज के काफी करीब थे, इसलिए इस विवाद में उनकी जवाबदेही अहम मानी जा रही है।
कहा जाता है कि 60 साल से ज्यादा उम्र के अनिल मिश्रा ने यह फैसला पारदर्शिता बनाए रखने और स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम को बिना किसी पक्षपात या हितों के टकराव के शक के जांच करने देने के मकसद से लिया।
–आईएएनएस
डीकेएम/वीसी
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