नई दिल्ली, 20 जून (आईएएनएस)। पिछले 12 वर्षों में केंद्र सरकार के लगातार प्रयासों और विशेष नीतिगत समर्थन से पूर्वोत्तर भारत का विकास तेजी से आगे बढ़ा है। कनेक्टिविटी, ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और आजीविका के क्षेत्र में हुए सुधारों ने इस क्षेत्र को पहले से अधिक मजबूत, जुड़ा हुआ और आत्मनिर्भर बनाया है। शनिवार को जारी एक आधिकारिक फैक्ट शीट में यह जानकारी दी गई।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास के लिए विशेष नीति ढांचा तैयार किया गया, जिसके तहत पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय आठों पूर्वोत्तर राज्यों को वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है। यह सहायता पांच केंद्रीय क्षेत्रीय योजनाओं के माध्यम से दी जा रही है।
अब तक कुल 3,746 परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें से 2,730 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं, जिनकी स्वीकृत लागत 27,963 करोड़ रुपए से अधिक है।
सरकार का कहना है कि लगातार निवेश और नीतिगत सहयोग के कारण विकास का प्रभाव लगभग हर क्षेत्र में दिखाई दे रहा है। खास बात यह है कि विकास कार्यों को पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हितों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ाया गया है। इससे विकास न केवल प्रभावी बल्कि दीर्घकालिक और टिकाऊ भी बना है।
प्रधानमंत्री विकास पहल फॉर नॉर्थ ईस्ट रीजन को इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह 100 प्रतिशत केंद्र पोषित योजना है, जिसके लिए वर्ष 2022-23 से 2025-26 तक 6,600 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इस योजना के तहत बुनियादी ढांचे, आजीविका, सामाजिक विकास और विकास संबंधी कमियों को दूर करने वाले 48 प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है। इनमें से तीन परियोजनाएं पहले ही पूरी हो चुकी हैं, जिनमें सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और पैसेंजर रोपवे सिस्टम जैसी परियोजनाएं शामिल हैं।
पूर्वोत्तर में सड़क संपर्क को मजबूत करने पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लंबाई 2014 में 10,905 किलोमीटर थी, जो 1 अप्रैल 2025 तक बढ़कर 16,207 किलोमीटर हो गई है।
रेलवे नेटवर्क में भी बड़ा विस्तार हुआ है। जहां 2009 से 2014 के बीच 333 किलोमीटर नई रेल लाइनें शुरू हुई थीं, वहीं 2014 से 2026 के बीच यह आंकड़ा 1,900 किलोमीटर से अधिक पहुंच गया।
सरकार की एक्ट ईस्ट नीति ने भी पूर्वोत्तर को नई पहचान दी है। 2014 से लागू इस नीति के तहत पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ भारत के संपर्क का केंद्र बनाया गया है। कनेक्टिविटी, व्यापार, सांस्कृतिक संबंधों और सीमा क्षेत्रों के विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है।
आधिकारिक बयान में कहा गया है कि आज पूर्वोत्तर भारत अवसरों, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए प्रवेश द्वार के रूप में उभर रहा है। ‘अष्टलक्ष्मी’ के रूप में पहचाना जाने वाला यह क्षेत्र अब पहले से अधिक जुड़ा हुआ, मजबूत और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार दिखाई देता है।
–आईएएनएस
वीकेयू/पीएम
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