महासागरों में बढ़ते बदलाव के बीच मछलियों की निगरानी के लिए वैज्ञानिक अब उपग्रह तकनीक की लेंगे मदद

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कोच्चि, 2 नवंबर (आईएएनएस)। उपग्रह वैज्ञानिकों को यह पता लगाने में मदद कर सकते हैं कि समुद्र में बदलाव के साथ मछलियां कहां जा रही हैं। इससे मछली पकड़ने वाले समुदायों को महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है और समुद्री संसाधनों की रक्षा करने में मदद मिल सकती है। बुधवार से यहां शुरू होने वाले एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी (सिम्पोजियम) में यह मुख्य विषयों में से एक होगा। 30 से अधिक देशों के वैज्ञानिक इस बात पर चर्चा करेंगे कि कैसे सैटेलाइट तकनीक और जलवायु अनुसंधान, महासागरों में होने वाले बदलावों और मत्स्य पालन (फिशरीज) पर उनके प्रभाव को समझने में मदद…

कोच्चि, 2 नवंबर (आईएएनएस)। उपग्रह वैज्ञानिकों को यह पता लगाने में मदद कर सकते हैं कि समुद्र में बदलाव के साथ मछलियां कहां जा रही हैं। इससे मछली पकड़ने वाले समुदायों को महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है और समुद्री संसाधनों की रक्षा करने में मदद मिल सकती है।

बुधवार से यहां शुरू होने वाले एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी (सिम्पोजियम) में यह मुख्य विषयों में से एक होगा।

30 से अधिक देशों के वैज्ञानिक इस बात पर चर्चा करेंगे कि कैसे सैटेलाइट तकनीक और जलवायु अनुसंधान, महासागरों में होने वाले बदलावों और मत्स्य पालन (फिशरीज) पर उनके प्रभाव को समझने में मदद कर सकते हैं।

आईसीएआर-सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएमएफआरआई) में आयोजित होने वाली तीन दिवसीय ‘ट्रेवर-सफारी’ संगोष्ठी, मरीन इकोसिस्टम (समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र) की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक के उपयोग पर केंद्रित होगी।

सैटेलाइट डेटा समुद्र के तापमान, महासागर की उत्पादकता और मछलियों के वितरण में होने वाले बदलावों को ट्रैक करने में मदद कर सकता है। इस जानकारी से संभावित मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों (फिशिंग जोन) की पहचान करने में मदद मिल सकती है, जिससे मछुआरे अपनी यात्राओं की बेहतर योजना बना सकेंगे।

इस बैठक में यह भी देखा जाएगा कि जलवायु परिवर्तन, मानसून के बदलते पैटर्न और चरम मौसम की घटनाएं मछलियों की आबादी और समुद्री जीवन को कैसे प्रभावित करती हैं।

महासागर की स्थितियों और पानी की गुणवत्ता में बदलाव, मछलियों की उपलब्धता को प्रभावित कर सकते हैं और तटीय समुदायों की आजीविका के लिए खतरा बन सकते हैं।

वैज्ञानिक मत्स्य पालन को अधिक टिकाऊ (सस्टेनेबल) बनाने और समुद्री जैव विविधता की रक्षा करने के तरीकों पर चर्चा करेंगे।

वे इस बात पर भी विचार करेंगे कि मछली पकड़ने वाले समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है।

मत्स्य पालन क्षेत्र में महिलाओं और हाशिए पर रहने वाले समुदायों की भूमिका पर भी चर्चा की जाएगी।

बायोटेक्नोलॉजी विभाग के सहयोग से आयोजित एक विशेष सत्र में यह देखा जाएगा कि ‘रिमोट सेंसिंग’ जलीय इकोसिस्टम के स्वास्थ्य की निगरानी में कैसे मदद कर सकती है।

यह ‘वन हेल्थ’ (एक स्वास्थ्य) दृष्टिकोण का पालन करेगा, जो पर्यावरणीय स्वास्थ्य को मानव और पशु स्वास्थ्य से जोड़ता है।

सीएमएफआरआई के निदेशक डॉ. ग्रिनसन जॉर्ज ने कहा, “इन चर्चाओं का मुख्य उद्देश्य महासागर की स्थितियों को बेहतर ढंग से समझना और पर्यावरणीय निगरानी में सुधार करना है, ताकि सुरक्षित मत्स्य पालन, टिकाऊ संसाधन, सीफूड सुरक्षा और तटीय समुदायों की आजीविका की दीर्घकालिक भलाई सुनिश्चित की जा सके।”

इस तीन दिवसीय संगोष्ठी में 80 से अधिक विदेशी प्रतिनिधियों के शामिल होने की उम्मीद है। इसका आयोजन संयुक्त रूप से कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के केमिकल ओशनोग्राफी विभाग, ट्रेवर प्लैट साइंस फाउंडेशन, सीएमएफआरआई और मरीन बायोलॉजिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा किया जा रहा है।

इस कार्यक्रम में ‘बे ऑफ बंगाल नेटवर्क ऑफ ओशन रिसर्चर्स फॉर फिशरीज’ की भी शुरुआत की जाएगी, जिसका उद्देश्य इस क्षेत्र के वैज्ञानिकों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है।

–आईएएनएस

एससीएच

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IANS Agency

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