सुप्रीम कोर्ट ने नेताजी को ‘राष्ट्रीय पुत्र’ का दर्जा देने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से किया इनकार

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नई दिल्ली, 20 अप्रैल (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम सुनवाई के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया। इस याचिका में मांग की गई थी कि आजाद हिंद फौज (आईएनए) को भारत की आजादी में निर्णायक भूमिका निभाने वाली संस्था के रूप में घोषित किया जाए। इसके साथ ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ‘राष्ट्रीय पुत्र’ का दर्जा दिया जाए। इसके अलावा उनकी जयंती 23 जनवरी और आईएनए की स्थापना दिवस 21 अक्टूबर को ‘राष्ट्रीय दिवस’ घोषित करने की भी मांग रखी गई थी। यह याचिका पिनाकपानी मोहंती ने दायर…

नई दिल्ली, 20 अप्रैल (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम सुनवाई के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया। इस याचिका में मांग की गई थी कि आजाद हिंद फौज (आईएनए) को भारत की आजादी में निर्णायक भूमिका निभाने वाली संस्था के रूप में घोषित किया जाए। इसके साथ ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ‘राष्ट्रीय पुत्र’ का दर्जा दिया जाए।

इसके अलावा उनकी जयंती 23 जनवरी और आईएनए की स्थापना दिवस 21 अक्टूबर को ‘राष्ट्रीय दिवस’ घोषित करने की भी मांग रखी गई थी।

यह याचिका पिनाकपानी मोहंती ने दायर की थी। लेकिन, मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया।

सुनवाई की शुरुआत में ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि क्या उसने पहले भी इसी तरह की याचिका दाखिल की थी? जब याचिकाकर्ता ने इसे अलग बताने की कोशिश की, तो अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए पूछा कि यह याचिका किसने तैयार की है और इस तरह बार-बार याचिकाएं दाखिल करने पर नाराजगी जताई।

कोर्ट ने कहा कि यह साफ तौर पर दिखता है कि ऐसी याचिकाएं बार-बार दाखिल करना एक तरह की लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश हो सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि इतिहास और तथ्यों से जुड़े ऐसे मुद्दों का फैसला अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। कोर्ट ने कहा, “ऐसे तथ्यात्मक मुद्दों का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के जरिए नहीं किया जा सकता।”

याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामलों में अदालत को बार-बार घसीटना उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पीआईएल का इस्तेमाल निजी या बार-बार दोहराए जाने वाले ऐतिहासिक दावों के लिए नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने आगे यह भी आदेश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा इसी तरह के मुद्दों पर दाखिल की जाने वाली किसी भी भविष्य की रिट याचिका को रजिस्ट्री स्वीकार न करे।

यह पहली बार नहीं था जब इस तरह का मामला सुप्रीम कोर्ट में आया हो। इससे पहले 12 मार्च को भी इसी तरह की एक याचिका पर सुनवाई हुई थी, जिसमें नेताजी के पार्थिव अवशेषों को जापान से भारत लाने की मांग की गई थी। उस समय भी कोर्ट ने मामले को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया था।

नेताजी के पोते आशीष राय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए थे, जिन्होंने मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा इस मुद्दे पर विचार करने से मना करने के बाद याचिका को वापस लेने की अनुमति मांगी थी।

कोर्ट ने तब भी सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था, “यह मुद्दा कितनी बार अदालत में उठाया जाएगा?” कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर किसी को वास्तव में इस मुद्दे को आगे बढ़ाना है, तो नेताजी की कानूनी वारिस अनीता बोस फाफ को खुद अदालत में आकर याचिका दाखिल करनी चाहिए। अदालत ने कहा था, “वे पर्दे के पीछे से मामला नहीं चला सकतीं, अगर उन्हें आगे बढ़ाना है तो सीधे सुप्रीम कोर्ट आएं।”

–आईएएनएस

पीआईएम/एबीएम

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