प्रयागराज, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। सनातन धर्म में जीवित्पुत्रिका व्रत यानी जितिया व्रत का विशेष महत्व है। यह तीन दिनों का अत्यंत कठिन और पवित्र उपवास है, जिसे माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और विघ्नों से रक्षा के लिए रखती हैं। इस साल यह व्रत 2 अक्टूबर से शुरू होकर 4 अक्टूबर को समाप्त होगा।
प्रयागराज की प्रसिद्ध पंडित शिप्रा सचदेव ने आईएएनएस से बातचीत में इस व्रत के महत्व, मुहूर्त और विधि के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
शिप्रा सचदेव ने बताया कि जितिया व्रत माताएं अपने पुत्र की लंबी आयु के लिए रखती हैं। यह व्रत संतान के जीवन में आने वाले विघ्नों को हरने, उनके अच्छे स्वास्थ्य और उनकी समग्र वृद्धि के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करने पर संतान पर आने वाले सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
उन्होंने बताया कि यह पर्व तीन दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस साल 2 अक्टूबर को नहाय-खाय है। इस दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान करती हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इस दिन नहाय-खाय का पूजन किया जाता है और अगले दिन के कठिन व्रत के लिए मन को तैयार किया जाता है।
व्रत का मुख्य दिन 3 अक्टूबर को है। इस दिन माताएं पूरे 24 घंटे से भी अधिक समय तक निर्जला उपवास रखती हैं। शिप्रा सचदेव के अनुसार, इस दिन सुबह उठकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। उसके बाद संपूर्ण दिन अन्न और जल का पूरी तरह से त्याग किया जाता है। यह व्रत बेहद कठोर माना जाता है। प्रदोष काल में इस व्रत की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। महिलाएं समूह में कथा सुनती हैं और अपने बच्चों के मंगल की कामना करती हैं।
व्रत का समापन और पारण 4 अक्टूबर, नवमी तिथि को होगा। पंडित शिप्रा सचदेव ने मुहूर्त के बारे में बताते हुए कहा कि 4 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद पारण किया जाएगा। इस दिन सुबह 7 बजकर 32 मिनट के बाद ही व्रत का पारण शुभ माना गया है। इसके बाद ही महिलाएं अन्न-जल ग्रहण करके अपना व्रत खोलेंगी।
–आईएएनएस
पीआईएम/एबीएम
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