काशी के सुरों की दुनिया का बड़ा नाम थे छन्नूलाल मिश्र, पीएम मोदी के प्रस्तावक बनने की कहानी भी है दिलचस्प

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वाराणसी, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में पंडित छन्नूलाल मिश्र का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। खयाल से लेकर ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी और भजन तक उन्होंने संगीत की कई विधाओं को अपनी आवाज से समृद्ध किया। बनारस की संगीत परंपरा को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाले पंडित छन्नूलाल मिश्र को पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे बड़े सम्मानों से नवाजा गया। 2 अक्टूबर 2025 को उनके निधन के बाद संगीत जगत में एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ, जिसे भर पाना आसान नहीं है। पंडित छन्नूलाल मिश्र का जन्म 3 अगस्त 1936 को उत्तर प्रदेश…

वाराणसी, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में पंडित छन्नूलाल मिश्र का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। खयाल से लेकर ठुमरी, दादरा, चैती, कजरी और भजन तक उन्होंने संगीत की कई विधाओं को अपनी आवाज से समृद्ध किया। बनारस की संगीत परंपरा को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाले पंडित छन्नूलाल मिश्र को पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे बड़े सम्मानों से नवाजा गया। 2 अक्टूबर 2025 को उनके निधन के बाद संगीत जगत में एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ, जिसे भर पाना आसान नहीं है।

पंडित छन्नूलाल मिश्र का जन्म 3 अगस्त 1936 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के हरिहरपुर में हुआ था। संगीत उन्हें विरासत में मिला था। उनके दादा गुदई महाराज और शांता प्रसाद प्रसिद्ध तबला वादक रहे। ऐसे माहौल में पले-बढ़े छन्नूलाल मिश्र ने महज छह साल की उम्र में अपने पिता बद्री प्रसाद मिश्र से संगीत की शुरुआती शिक्षा लेना शुरू कर दिया था।

कहते हैं कि जिस उम्र में बच्चे खेल-कूद में व्यस्त रहते हैं, उस उम्र में छन्नूलाल मिश्र सुरों की दुनिया में रम गए थे। करीब नौ साल की उम्र में उन्हें उस्ताद गनी अली साहब से खयाल की शिक्षा मिली। आगे चलकर उन्होंने किराना घराने के उस्ताद अब्दुल गनी खान और ठाकुर जयदेव सिंह से भी संगीत की बारीकियां सीखीं। आगे चलकर उन्होंने संगीत को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया।

उनकी संगीत साधना का एक महत्वपूर्ण पड़ाव मुजफ्फरपुर भी रहा। बताया जाता है कि चतुर्भुज स्थान की एक कोठरी में रहकर उन्होंने लंबे समय तक संगीत की साधना की। यही निरंतर अभ्यास आगे चलकर उनकी गायकी की पहचान बना। बाद में बनारस उनकी कर्मभूमि बनी और उन्होंने बनारस घराने की समृद्ध परंपरा को अपनी आवाज में आगे बढ़ाया।

छन्नूलाल मिश्र की खासियत यह थी कि वे सिर्फ शास्त्रीय संगीत के मंच तक सीमित नहीं रहे। उनकी आवाज में खयाल की गंभीरता थी तो ठुमरी में बनारस की मिठास भी। दादरा, चैती, कजरी और भजन जैसी विधाओं को भी उन्होंने बेहद लोकप्रिय बनाया। यही वजह रही कि शास्त्रीय संगीत के जानकारों के साथ-साथ आम लोग भी उनकी गायकी से जुड़ते चले गए।

उनके जीवन का एक दिलचस्प अध्याय साल 2014 से भी जुड़ा है। उस समय नरेंद्र मोदी वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। नामांकन के दौरान उनका प्रस्तावक बनाने के लिए पंडित छन्नूलाल मिश्र से संपर्क किया गया। बताया जाता है कि शुरुआत में उन्होंने इसमें खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके बाद अमित शाह ने उनसे मुलाकात की और उन्हें नरेंद्र मोदी का प्रस्तावक बनने के लिए राजी किया।

प्रस्ताव स्वीकार करते समय पंडित छन्नूलाल मिश्र ने यह भी स्पष्ट किया था कि वे किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए नहीं हैं। उनकी अपनी प्राथमिकताएं काशी, गंगा और संगीत परंपरा से जुड़ी थीं। उन्होंने उम्मीद जताई थी कि नई सरकार काशी में गंगा की स्वच्छता और यहां की समृद्ध संगीत परंपरा के विकास के लिए काम करेगी।

उनके लिए काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि संगीत, संस्कृति और आध्यात्मिकता की एक पूरी दुनिया थी। उनकी गायकी में भी इसी काशी की मिट्टी, गंगा की रवानी और बनारस की ठेठ मिठास सुनाई देती थी।

पंडित छन्नूलाल मिश्र को साल 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2010 में पद्म भूषण और 2020 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपनी लंबी संगीत यात्रा में कई पीढ़ियों को प्रभावित किया और शास्त्रीय संगीत को आम लोगों के करीब लाने में अहम भूमिका निभाई।

–आईएएनएस

पीआईएम/वीसी

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IANS Agency

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