नई दिल्ली, 2 मई (आईएएनएस)। कलम का सिपाही कहें, सच का पहरेदार कहें या फिर वो योद्धा जो बिना हथियार के सत्ता को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दे, वह पत्रकार ही है। पत्रकार सिर्फ खबरें नहीं लिखता, वह समाज की धड़कन को शब्द देता है। जो दिखता नहीं, उसे सामने लाता है और जो छुपाया जाता है, उसे उजागर करता है। यही वजह है कि प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है।
किसी भी देश की तरक्की में मीडिया की भूमिका बेहद अहम होती है। भारत की आजादी की लड़ाई इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उस दौर में अखबार और पत्र-पत्रिकाएं सिर्फ सूचना का माध्यम नहीं थे, बल्कि लोगों को जागरूक करने और उन्हें एकजुट करने का जरिया थे। पत्रकारों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई, जनता को सच्चाई से रूबरू कराया और आजादी की लौ जलाए रखी। उस समय की पत्रकारिता ने यह साबित कर दिया था कि कलम की ताकत किसी भी हथियार से कम नहीं होती।
आज के दौर में भी पत्रकार समाज को जोड़ने का काम करते हैं। जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर बनी खाइयों को पाटने में मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। जब कहीं नफरत फैलती है, तो जिम्मेदार पत्रकारिता सच दिखाकर संतुलन बनाने की कोशिश करती है, लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है। कई बार पत्रकारों को दबाव, धमकी और सेंसरशिप का सामना करना पड़ता है। कुछ ताकतें ऐसी भी होती हैं जो नहीं चाहतीं कि सच सामने आए। ऐसे में प्रेस की आजादी पर खतरा मंडराने लगता है।
यही कारण है कि प्रेस की स्वतंत्रता की मांग समय-समय पर उठती रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए हर साल 3 मई को अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 1993 में हुई थी, जब दुनियाभर में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता को समर्थन देने की जरूरत महसूस की गई। यह दिन सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि सरकारों और समाज को याद दिलाने वाला अवसर है कि प्रेस की आजादी का सम्मान करना कितना जरूरी है।
प्रेस किसी भी समाज का आईना होता है। अगर आईना साफ है, तो तस्वीर भी साफ दिखेगी, लेकिन अगर उस पर धुंध या पर्दा डाल दिया जाए तो सच्चाई धुंधली हो जाती है। इसी तरह अगर प्रेस आजाद नहीं होगी तो जनता तक सही जानकारी नहीं पहुंचेगी। जब जानकारी ही अधूरी या गलत होगी, तो फैसले भी गलत हो सकते हैं। इसलिए प्रेस की आजादी सीधे-सीधे आम नागरिक की आजादी से जुड़ी हुई है।
आज के डिजिटल दौर में पत्रकारिता का स्वरूप बदल रहा है। सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने हर किसी को अपनी बात रखने का मौका दिया है। यह एक सकारात्मक बदलाव है, लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी आई हैं। फेक न्यूज़, अफवाहें और आधी-अधूरी जानकारी तेजी से फैलती हैं। ऐसे में जिम्मेदार और स्वतंत्र पत्रकारिता की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। असली पत्रकार वही है जो तथ्यों की जांच करे, निष्पक्ष रहे और सच को बिना किसी दबाव के सामने लाए।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रेस की आजादी को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों ने इस दिशा में कई पहल की हैं। नामीबिया के विंडहोक में हुए सम्मेलन में यह बात सामने आई थी कि प्रेस की आजादी सिर्फ एक अधिकार नहीं, बल्कि बहुवाद और जनसंचार की स्वतंत्रता की बुनियादी जरूरत है। यही सोच आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस की नींव बनी।
यह दिन मीडिया पेशेवरों के लिए आत्ममंथन का भी अवसर होता है। उन्हें यह सोचने का मौका मिलता है कि वे अपनी जिम्मेदारियों को किस हद तक निभा रहे हैं। साथ ही यह उन पत्रकारों को याद करने का भी दिन है, जिन्होंने सच की तलाश में अपनी जान गंवा दी।
आज जब पत्रकारिता, तकनीक और समाज के बीच की सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं, तब प्रेस की आजादी का मुद्दा और भी अहम हो गया है। 2026 का वैश्विक थीम (शांतिपूर्ण भविष्य को आकार देना: मानवाधिकारों, विकास और सुरक्षा के लिए प्रेस स्वतंत्रता को बढ़ावा देना) भी इसी बात पर जोर देता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भविष्य के सूचना समाज को दिशा देने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
–आईएएनएस
पीआईएम/वीसी
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