परिसीमन बिल पर बदले सुर? मॉनसून सत्र से पहले शरद पवार की पार्टी के संकेतों ने बढ़ाई सियासी हलचल

Summary :

मॉनसून सत्र शुरू होने से पहले देश की राजनीति में परिसीमन विधेयक को लेकर नई हलचल तेज हो गई है। विपक्षी INDIA गठबंधन की एकता पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि शरद पवार के नेतृत्व वाले एनसीपी (शरद गुट) की ओर से ऐसे संकेत मिले हैं कि पार्टी नए परिसीमन बिल का समर्थन कर सकती है। यदि ऐसा होता है तो लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के मोदी सरकार के प्रयासों को बड़ी मजबूती मिल सकती है। सुप्रिया सुले के बयान से बढ़ी चर्चा एनसीपी (शरद गुट) की सांसद सुप्रिया सुले ने कहा है कि उनकी पार्टी नए परिसीमन…

परिसीमन बिल पर सियासी हलचल तेज, मोदी सरकार का मिशन 360 अब बेहद करीब

मॉनसून सत्र शुरू होने से पहले देश की राजनीति में परिसीमन विधेयक को लेकर नई हलचल तेज हो गई है। विपक्षी INDIA गठबंधन की एकता पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि शरद पवार के नेतृत्व वाले एनसीपी (शरद गुट) की ओर से ऐसे संकेत मिले हैं कि पार्टी नए परिसीमन बिल का समर्थन कर सकती है। यदि ऐसा होता है तो लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के मोदी सरकार के प्रयासों को बड़ी मजबूती मिल सकती है।

सुप्रिया सुले के बयान से बढ़ी चर्चा

एनसीपी (शरद गुट) की सांसद सुप्रिया सुले ने कहा है कि उनकी पार्टी नए परिसीमन विधेयक के संसद में पेश होने के बाद अंतिम फैसला करेगी। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि सभी राज्यों में लगभग 50 प्रतिशत सीटों की बढ़ोतरी की जाती है तो इस मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक सहमति बन सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह वही प्रस्ताव है जिस पर केंद्र सरकार पहले भी सकारात्मक रुख दिखा चुकी है।

सरकार पहले ही दे चुकी है संकेत

अप्रैल में लोकसभा में हुई चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष की आशंकाओं को दूर करने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा था कि यदि सीटों में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी पर सहमति बनती है तो सरकार इस पर विचार करने के लिए तैयार है। इसी वजह से सुप्रिया सुले के ताजा बयान को सरकार और एनसीपी के बीच संभावित सहमति की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

शरद पवार को लेकर बढ़ी अटकलें

महाराष्ट्र की राजनीति में हाल के घटनाक्रमों ने भी चर्चाओं को हवा दी है। एनसीपी (शरद गुट) के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल की पहले शरद पवार और फिर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नई अटकलों को जन्म दिया है। इसके साथ ही दिल्ली में अमित शाह और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की बैठक भी चर्चा का विषय बनी हुई है। इन घटनाओं के बाद यह सवाल और गहरा गया है कि क्या शरद पवार भविष्य में कोई बड़ा राजनीतिक फैसला लेने की तैयारी में हैं।

DMK पर भी टिकी नजर

परिसीमन बिल के संदर्भ में अब सभी की नजर तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके पर भी है। लोकसभा में डीएमके के 22 सांसद हैं और सरकार के लिए उनका समर्थन बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। माना जा रहा है कि अप्रैल में बिल पारित न हो पाने के बाद से केंद्र सरकार दक्षिण भारत की पार्टियों को साथ लाने की कोशिशों में जुटी हुई है।

अप्रैल में क्यों नहीं पास हो पाया था बिल?

संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को 16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था। इसका उद्देश्य 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करना, लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करना और नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का रास्ता साफ करना था।

17 अप्रैल को हुई वोटिंग में विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। हालांकि उपस्थित सदस्यों की संख्या के आधार पर सरकार को दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 वोटों की आवश्यकता थी, जो उसे नहीं मिल सके। परिणामस्वरूप विधेयक पारित नहीं हो पाया।

दो-तिहाई बहुमत का गणित कैसे बदल सकता है?

राजनीतिक समीकरणों में हालिया बदलाव के बाद सरकार की स्थिति पहले की तुलना में मजबूत मानी जा रही है। यदि एनडीए अपने पुराने 298 समर्थक सांसदों का समर्थन बरकरार रखता है और तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसद, शिवसेना (शिंदे गुट) में शामिल हुए 6 पूर्व यूबीटी सांसद तथा एनसीपी (शरद गुट) के 8 सांसद उसका साथ देते हैं, तो यह संख्या 332 तक पहुंच सकती है।

यदि इसके बाद डीएमके के 22 सांसद भी समर्थन देते हैं तो यह आंकड़ा 354 हो जाएगा। ऐसी स्थिति में दो-तिहाई बहुमत के लिए आवश्यक संख्या से सरकार केवल कुछ सांसद दूर रह जाएगी। यदि कुछ विपक्षी दल मतदान से दूरी बनाते हैं या अनुपस्थित रहते हैं, तो बहुमत का गणित और आसान हो सकता है।

विपक्ष के लिए चुनौती, सरकार के लिए अवसर

हाल के महीनों में विपक्षी दलों के भीतर लगातार हो रही टूट और नेताओं के पाला बदलने की घटनाओं ने INDIA गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े किए हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि विपक्षी दलों के बीच मतभेद बढ़ते हैं और कुछ क्षेत्रीय दल सरकार के साथ मुद्दा-आधारित सहयोग का रास्ता अपनाते हैं, तो मोदी सरकार के लिए बड़े संवैधानिक और राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाना पहले की तुलना में आसान हो सकता है।

मॉनसून सत्र से पहले बने इन नए राजनीतिक समीकरणों ने परिसीमन विधेयक को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि संसद के आगामी सत्र में क्षेत्रीय दल किस रुख के साथ सामने आते हैं।

Shera Rajput