प्लास्टिक कचरे से बन सकेगा 3डी प्रिंटर का फिलामेंट, शोधकर्ताओं को मिला पेटेंट

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नई दिल्ली, 11 अगस्त (आईएएनएस)। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला के शोधकर्ताओं ने सिर्फ करीब 45,000 रुपए की लागत में ऐसी एक्सट्रूडर प्रणाली विकसित की है, जो प्लास्टिक कचरे से 3डी प्रिंटिंग के लिए मजबूत कंपोजिट फिलामेंट बना सकती है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के इस तकनीकी शिक्षण संस्थान ने इस का पेटेंट भी हासिल कर लिया है। दरअसल जहां सामान्य प्रिंटर में ‘स्याही’ का इस्तेमाल होता है वहीं 3डी प्रिंटर में फिलामेंट होता है। आज 3डी प्रिंटिंग का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। चिकित्सा क्षेत्र में फिलामेंट से शरीर के मॉडल और कृत्रिम अंग बनाने से लेकर ड्रोन के पुर्जे,…

नई दिल्ली, 11 अगस्त (आईएएनएस)। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला के शोधकर्ताओं ने सिर्फ करीब 45,000 रुपए की लागत में ऐसी एक्सट्रूडर प्रणाली विकसित की है, जो प्लास्टिक कचरे से 3डी प्रिंटिंग के लिए मजबूत कंपोजिट फिलामेंट बना सकती है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के इस तकनीकी शिक्षण संस्थान ने इस का पेटेंट भी हासिल कर लिया है।

दरअसल जहां सामान्य प्रिंटर में ‘स्याही’ का इस्तेमाल होता है वहीं 3डी प्रिंटर में फिलामेंट होता है। आज 3डी प्रिंटिंग का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। चिकित्सा क्षेत्र में फिलामेंट से शरीर के मॉडल और कृत्रिम अंग बनाने से लेकर ड्रोन के पुर्जे, ब्रैकेट, खिलौने और सजावटी सामान तक बनाए जा रहे हैं। खास बात यह है कि इसमें पुनर्चक्रित प्लास्टिक के साथ दूसरी सुदृढ़ीकरण सामग्री मिलाई जा सकती है। इससे तैयार फिलामेंट ज्यादा मजबूत और टिकाऊ बनता है। इससे नए प्लास्टिक पर निर्भरता घटेगी और प्लास्टिक कचरे का दोबारा उपयोग बढ़ेगा।

संस्थान के मुताबिक, इनमें फ्यूज्ड डिपॉजिशन मॉडलिंग तकनीक सबसे ज्यादा इस्तेमाल होती है। इसमें प्लास्टिक के फिलामेंट को गर्म करके पिघलाया जाता है। फिर उसे एक-एक परत के रूप में जमा किया जाता है। इसी से पूरी वस्तु तैयार होती है। फिलामेंट की मांग बढ़ने के साथ इसकी कीमत भी बड़ी चुनौती है। अच्छी गुणवत्ता वाला फिलामेंट महंगा होता है। वहीं कमजोर गुणवत्ता वाले फिलामेंट से बनी वस्तुओं की मजबूती और सटीकता प्रभावित होती है। पुनर्चक्रित प्लास्टिक से फिलामेंट बनाने की कोशिश पहले भी हुई है। लेकिन ज्यादा प्रसंस्करण लागत, सामग्री की बर्बादी और कम मजबूती जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं।

एनआईटी राउरकेला की नई तकनीक इन समस्याओं को दूर करने की कोशिश करती है। नई एक्सट्रूडर प्रणाली में नियंत्रित शीतलन व्यवस्था और पीआईडी तापमान नियंत्रक समेत कई घटक जुड़े हैं। इससे फिलामेंट बनाने की प्रक्रिया पर बेहतर नियंत्रण मिलता है। प्रयोगशाला परीक्षणों में तैयार फिलामेंट में संतोषजनक यांत्रिक गुण और अपेक्षित आयामी सटीकता पाई गई।

एनआईटी राउरकेला के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर प्रो. संध्यारानी बिस्वास ने कहा कि यह तकनीक फिलामेंट उत्पादन में महत्वपूर्ण प्रगति है। उनके अनुसार, इससे बेहतर यांत्रिक गुणों वाले पुर्जे बनाए जा सकते हैं। साथ ही पुनर्चक्रित प्लास्टिक के इस्तेमाल से पर्यावरण को भी फायदा होगा। केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर प्रो. सुजीत सेन ने कहा कि यह प्रणाली अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक को उपयोगी 3डी प्रिंटर फिलामेंट में बदल सकती है।

इससे ऐसी चक्रीय व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जिसमें प्लास्टिक कचरे को फेंकने के बजाय उसे दोबारा इस्तेमाल कर मूल्यवान उत्पाद तैयार किए जाएं। इस तकनीक से तैयार फिलामेंट का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में हो सकता है। इनमें वाहन और विमान उद्योग में विशेष पुर्जे बनाना, इलेक्ट्रॉनिक्स और उपभोक्ता उत्पाद, शैक्षणिक संस्थानों और शोध प्रयोगशाला शामिल है। इसके अलावा दंत चिकित्सा मॉडल , चिकित्सकीय स्कैफोल्ड और मरीज के अनुसार कृत्रिम अंग, ड्रोन के पुर्जों और अन्य हल्के, मजबूत उत्पादों में इसका उपयोग हो सकता है।

इस पेटेंट को प्रो. संध्यारानी बिस्वास, प्रो. सुजीत सेन, जगदीश उदय खाटू, हिमांशु सिंह और किरण सुना ने हासिल किया है। एनआईटी राउरकेला की यह तकनीक दो समस्याओं प्लास्टिक कचरे और 3डी प्रिंटिंग के लिए सस्ते, मजबूत फिलामेंट का समाधान है।

–आईएएनएस

जीसीबी/एएस

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