SC on Sports Mandatory Subject: आज के समय में बच्चों का डेली रूटीन तेजी से बदल रही है। पढ़ाई के बाद जो समय कभी मैदान में बीतता था, उसका बड़ा हिस्सा अब मोबाइल, टीवी और दूसरी स्क्रीन पर गुजर रहा है। इसी बदलते लाइफस्टाइल के बीच स्कूल और कॉलेजों में खेलों को अनिवार्य करने की मांग सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची है। मामले की सुनवाई कर रही कोर्ट ने भी इस मुद्दे को महत्वपूर्ण माना है। सुप्रीम कोर्ट अब 22 सितंबर को इस मामले पर विस्तार से सुनवाई करेगा।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में दलील दी गई है कि बच्चों की शिक्षा केवल किताबों और परीक्षाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए। पढ़ाई के साथ शारीरिक गतिविधियों को भी उतनी ही अहमियत मिलनी चाहिए। खेल बच्चों को फिट रखने के साथ उनके मानसिक विकास में भी मदद करते हैं। मैदान पर खेलने से उनमें अनुशासन, टीम भावना और कॉम्पिटिशन की समझ विकसित होती है। इसी वजह से याचिका में स्कूल और कॉलेजों में खेल तथा फिजिकल एजुकेशन को अनिवार्य करने की मांग की गई है।
2021 से कोर्ट में चल रहा मामला
बता दें कि कनिष्क पांडे ने इस संबंध में साल 2021 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में खेल और शारीरिक शिक्षा को संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत शिक्षा के अधिकार से जोड़ने की मांग की गई है। मामला सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों के साथ NCERT और UGC से भी जवाब मांगा था। अब इस मुद्दे पर आगे की सुनवाई के लिए 22 सितंबर की तारीख तय की गई है।
20 अगस्त को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बैंच ने मामले की सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने बच्चों की मौजूदा लाइफस्टाइल का जिक्र किया। कोर्ट ने माना कि डिजिटल दौर में बच्चे मोबाइल और स्क्रीन पर काफी समय बिता रहे हैं। ऐसे में खेलों को पढ़ाई का हिस्सा बनाने से बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास को फायदा मिल सकता है। कोर्ट ने खेलों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग को सराहनीय और जरूरी बताया।
रोज डेढ़ घंटे खेल की सिफारिश
मामले में सुप्रीम कोर्ट की सहायता के लिए सीनियर वकील गोपाल शंकरनारायण को एमिकस क्यूरी बनाया गया है। उन्होंने कोर्ट के सामने अपनी रिपोर्ट भी रखी है। रिपोर्ट में स्कूलों में रोजाना करीब डेढ़ घंटे खेल और दूसरी शारीरिक गतिविधियों के लिए रखने का सुझाव दिया गया है। इसका मकसद बच्चों को नियमित रूप से शारीरिक गतिविधियों से जोड़ना है, ताकि पढ़ाई के साथ उनका स्वास्थ्य भी बेहतर रहे।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वकील राजीव कुमार दुबे ने खेल सुविधाओं की कमी का मुद्दा भी उठाया।उन्होंने बताया कि देश के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के बीच खेलों में भागीदारी बेहद कम है। कई जगहों पर स्कूलों के पास पूरे मैदान नहीं हैं। खेल सामग्री और दूसरी सुविधाओं का भी कमी है। इसके अलावा राज्यों की ओर से खेलों के लिए दिए जाने वाले बजट को लेकर भी सवाल उठाए गए।
अब नजर 22 सितंबर की सुनवाई पर
इस पूरे मामले में अब अगली नजर सुप्रीम कोर्ट की 22 सितंबर को होने वाली सुनवाई पर है। अदालत के सामने यह सवाल है कि क्या खेलों और शारीरिक शिक्षा को बच्चों की शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
अगर इस दिशा में कोई बड़ा फैसला आता है, तो इसका असर देश के स्कूलों और कॉलेजों में खेलों की व्यवस्था पर पड़ सकता है।
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