Sukesh Chandrashekhar case : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महाठग सुकेश चंद्रशेखर को बड़ा झटका देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें उसकी सजा और कनविक्शन पर रोक लगाने से मना कर दिया गया था।
सुकेश चंद्रशेखर ने खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज बताकर एक जज/न्यायिक अधिकारी को फोन किया और उन पर दबाव बनाने की कोशिश की, ताकि उनके कोर्ट में चल रहे एक मुकदमे में फैसला सुकेश के पक्ष में आ सके इसी धोखेबाज़ी और कोर्ट के काम में अड़ंगा डालने के आरोप में अदालत ने उसे दोषी ठहराया था।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर सुकेश की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके खिलाफ लंबित अन्य सभी मामलों की सुनवाई स्वतंत्र रूप से और कानून के अनुसार चलेगी।
अदालत का फैसला और वकील की दलीलें
सुकेश की ओर से पेश वरिष्ठ वकील शोएब आलम ने दलील दी कि निचली अदालत ने 31 लंबित मामलों के आधार पर उनके चरित्र पर प्रतिकूल टिप्पणियां की हैं, जबकि किसी भी मामले में दोष सिद्ध नहीं हुआ है।
उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 41 का हवाला देते हुए ऐसी टिप्पणियां अन्य लंबित मुकदमों को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, पीठ को हाईकोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं मिली और उसने याचिका को खारिज कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
वर्ष 2017 के एक भ्रष्टाचार मामले में पुलिस हिरासत में रहने के दौरान सुकेश ने एक कांस्टेबल के मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर एक न्यायिक अधिकारी से संपर्क किया था। आरोप है कि उसने पहले सुप्रीम कोर्ट के एक जज का निजी सचिव बनकर और फिर खुद जज बनकर अधिकारी पर दबाव बनाने का प्रयास किया था।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 20 अगस्त को उसे आईपीसी की धारा 170, 189 और 507 के तहत दोषी ठहराया था और 29 अगस्त को सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद उसने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जहां से भी उसे कोई राहत नहीं मिली।
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